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Friday, 9 January, 2026
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लेफ्टिनेंट सैमुएल की बर्खास्तगी औपनिवेशिक मानसिकता की मिसाल है. सेना को इसे खत्म करना चाहिए

यह एक ऐसा दुर्लभ मामला था जिसमें एक अधिकारी की निजी धार्मिक आस्था और सेना की धार्मिक परंपराओं के बीच टकराव हो गया. धर्म के राजनीतिकरण के मौजूदा वातावरण, और सेना की अधिकारी जमात द्वारा इसे बढ़ावा देने के मद्देनजर अब समय आ गया है कि आत्म-निरीक्षण और सुधार किए जाएं.

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सुप्रीम कोर्ट ने लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेशन को बर्खास्त करने के दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश को 25 नवंबर को मान्य कर दिया. लेफ्टिनेंट कमलेशन को आर्मी रूल 14 की आर्मी एक्ट धारा 19 के तहत ‘कदाचार के व्यवहारों’ के लिए बर्खास्त किया गया था. औपनिवेशिक काल में जिसे ‘अपराध’ माना जाता था वह काम लेफ्टिनेंट कमलेशन ने यह किया था कि उन्होंने अपनी रेजीमेंट 3 कैवेलरी की एक धार्मिक गतिविधि में भाग लेने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार यह उनकी ईसाई आस्था के विपरीत थी.

उनके नाम 31 जनवरी 2019 को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस में उनके जिस ‘कदाचार के व्यवहार’ का जिक्र किया गया था वह ‘रेजीमेंट के सर्वधर्म स्थल पर जाने से इनकार था जहां मंदिर, चर्च, और गुरुद्वारा बने हैं’; और रेजीमेंट के धार्मिक आयोजनों में उनकी गैरहाजिरी का भी जिक्र था. उसमें यह भी कहा गया था कि “भारतीय सेना के मूल्यों तथा उसके धर्मनिरपेक्ष रुख, और सैनिकों से मेलजोल रखने की जरूरत के बारे में बताए जाने के बावजूद आप उदासीन और अपने रुख पर अड़े रहे’”.

कमलेसन की याचिका के अनुसार, यह यूनिट एक तय क्लास कंपोजिशन की थी जिसमें सिख, राजपूत और जाट सैनिकों की सब-यूनिट्स थीं, और इसमें कोई सर्व धर्म स्थल नहीं था, बल्कि एक अलग मंदिर और एक गुरुद्वारा था. रेजीमेंट को हर सप्ताह जिस धार्मिक परेड के लिए लिखित आदेश जारी किया जाता था उसमें उसे ‘मंदिर गुरुद्वारा परेड’ नाम दिया जाता था; और आम बोलचाल में भी ‘सर्वधर्म स्थल’ शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता था. उन्होंने यह भी लिखा कि वे हर एक धार्मिक परेड/उत्सव में भाग लेते थे, और अपनी एकेश्वरवादी ईसाई आस्था के कारण मंदिर के केवल आंतरिक हिस्से या गर्भगृह में प्रवेश करने से छूट दिए जाने की मांग करते थे. लेकिन ड्यूटी के बाद वे अपने जूते और बेल्ट उतारकर और जरूरत पड़ने पर हाथ धोकर तथा पगड़ी बांधकर मंदिर के प्रांगण में साथी सैनिकों के साथ उपस्थित हुआ करते थे.

हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, दोनों ने मुख्यतः अनुशासन (कानूनसम्मत कमांड की अवज्ञा, एकता और मनोबल के मामले) में अधिकारी की कार्रवाइयों के प्रतिकूल प्रभावों पर ज़ोर दिया और यह फैसला किया कि व्यक्ति की निजी आस्था इन बातों पर हावी नहीं हो सकती.

लेकिन व्यापक सवाल, जो कि समस्या का मूल कारण है उसकी समीक्षा नहीं की गई. वह यह है: संबंधित यूनिट और भारतीय सेना के बड़े हिस्से का गैर-धर्मनिरपेक्ष ढांचा धर्म, क्षेत्र और जाति, और उसकी धार्मिक प्रथाओं पर आधारित है.
यह ढांचा और उसकी वर्तमान धार्मिक प्रथाएं समानता और धर्मनिरपेक्षता के मामले में संविधान से बेमेल हैं. यह एक ऐसा दुर्लभ मामला था जिसमें एक अधिकारी की निजी धार्मिक आस्था और सेना की धार्मिक परंपराओं के बीच टकराव हो गया, ऐसे में धर्म के राजनीतिकरण के मौजूदा वातावरण, और सेना की अधिकारी जमात द्वारा इसे बढ़ावा देने के मद्देनजर अब समय आ गया है कि आत्म-निरीक्षण और सुधार किए जाएं.

असंवैधानिक ढांचा और धार्मिक प्रथाएं

आजादी के 78 साल बाद भी भारतीय सेना लड़ाई के मोर्चे पर जाने वाली अधिकतर यूनिटों या सब-यूनिटों में और कुछ हद तक आर्टिलरी और इंजीनियरिंग की यूनिटों में भी ‘फिक्स्ड क्लास कंपोज़ीशन’ वाले योद्धा वर्ग के संदिग्ध सिद्धांत पर आधारित औपनिवेशिक विरासत को ही आगे बढ़ा रही है. सैन्य दृष्टि से ‘क्लास’ का अर्थ है—एक धरण, एक जाती या एक क्षेत्र पर आधारित वर्ग.

‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चलते हुए अंग्रेजों ने ‘फिक्स्ड क्लास’ यूनिटों को सबसे ज्यादा महत्व दिया. किसी एक धर्म के 120 सैनिकों वाली यूनिटों को धार्मिक गुरु रखने का अधिकार दिया गया. धार्मिक परेडों और समारोहों को कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया. कोई भी बड़ा आयोजन या गतिविधि धार्मिक अनुष्ठान के बिना शुरू नहीं की जा सकती थी. सैनिकों की केवल आध्यात्मिक जरूरतों का ख्याल रखने की जगह धर्म को ही हावी बना दिया गया.

इन परंपराओं का आजादी के 78 साल बाद भी पालन किया जा रहा है. तर्क यह दिया जाता है कि धर्म, जाति या क्षेत्र के अभिमान से एकता की भावना बढ़ती है, और आजादी के पहले तथा बाद हुए युद्धों को जीतने में यह भावना कारगर साबित हो चुकी है. लेकिन यह कुतर्कपूर्ण धारणा है, क्योंकि सभी वर्गों को मिलाकर बनी यूनिटों का प्रदर्शन भी कोई कमतर नहीं रहा है.

वास्तव में, एकजुटता या सैनिकों में भावनात्मक लगाव ही युद्ध जिताती है. सैनिकों में लड़ने का जज्बा इसलिए उमड़ता है कि वे अपने साथियों को नीचा नहीं दिखाना चाहते या उनकी नजर में कायर नहीं दिखना चाहते. एकजुटता साथ-साथ रहने, खेलने, प्रशिक्षण लेने, असुविधाओं और खतरों का मिलकर सामना करने से पैदा होती है. धर्म, जाति, या क्षेत्र इसमें शायद ही या कोई भी भूमिका निभाता है. ब्रिगेड्स ऑफ गार्ड्स, आर्टिलरी और सर्विसेज की अधिकतर यूनिटों ने यह साबित कर दिखाया है. भारतीय नौसेना और वायुसेना केवल योग्यता के आधार पर नियुक्तियां करती है और उन्होंने शानदार मिसाल इन दोनों सेनाओं में किसी धार्मिक गुरु को नहीं रखा जाता या उनमें कोई संस्थागत पूजास्थल होता है. वे अनिवार्य धार्मिक परेडों की सख्त प्रथा का पालन नहीं करतीं. धर्म को निजी मामला माना जाता है और सबको इसका पालन करने की छूट है.

ले. सैमुएल कमलेशन के मामले को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए. व्यवस्था में ही आमूल परिवर्तन की जरूरत है, क्योंकि यह व्यवस्था ‘इंडिया के आइडिया’ के खिलाफ है और योग्यता के सार्वभौमिक मानदंड के साथ-साथ समानता और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूलाधारों को भी चोट पहुंचाती है.

अधूरे सुधार

वर्ग आधारित ढांचे और धर्म को बेवजह महत्व दिए जाने के प्रतिकूल प्रभाव को नियमों, सैन्य क़ानूनों, और योग्यता पर आधारित सर्व-वर्गीय अधिकारी कोर के बूते काबू में रखा गया है. इसका परिणाम यह हुआ है कि सेना के व्यापक मूल्य और व्यवहार धर्मनिरपेक्ष रहे हैं. वैसे, इसकी परीक्षा 1984 में तब हुई थी जब ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद कई सिख यूनिटों ने बगावत कर दी थी. इनमें से अधिकतर बगावत की शुरुआत गुरुद्वारा यूनिटों ने की थी. सेना ने फैसला किया कि धीरे-धीरे सबको सर्व-वर्गीय यूनिटों में बदल दिया जाएगा. इस आधार पर हर रेजीमेंट में ऐसी एक बटालियन तैयार की गई. लेकिन अफसर कोर और पदानुक्रम पहले से मौजूद व्यवस्था की देन थे और उसके रंग में में रंगे थे इसलिए सुधारों को कुछ वर्षों बाद दबा दिया गया और यथास्थिति वापस बहाल कर दी गई.

दूसरा सुधार 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में शुरू किया गया, जब सर्व-वर्गीय यूनिटों और कुछ सैन्य स्टेशनों में सर्वधर्म स्थलों की स्थापना की गई. सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथ और पूजा की दूसरी आवश्यक चीजें एक कमरे में रख दी गईं, सभी सैनिकों को अपनी सुविधा के अनुसार वहां उपासना करने की छूट दी गई. 1984 में, ‘राष्ट्रीय एकता संस्थान’ की स्थापना की गई जिसमें सभी धर्मों के गुरुओं को देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण दिया जाने लगा. उन्हें उनके अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे सभी धर्मों के मूल तत्वों से परिचित कराया जाने लगा. सर्वधर्म स्थलों पर सभी धर्मों के धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है. लेकिन जिन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना है उन्हें संहिताबद्ध करने का काम नहीं किया गया है. आश्चर्य की बात यह है कि पहले से मौजूद व्यवस्था के लिए भी मानदंडों का निर्धारण नहीं किया गया है. ‘रेगुलेशन्स फॉर द आर्मी’ के खंड 1 और 2 में केवल तीन संक्षिप्त पाराग्राफ (332, 1125 और 1385) दर्ज हैं, जो धार्मिक प्रक्रियाओं के प्रबंधन के बारे में बताते हैं. लेकिन यूनिटों ने अपनी-अपनी व्यवस्था तैयार कर ली है, जो आमतौर पर राष्ट्रीय एकता संस्थान में मिली शिक्षा और रेजीमेंट की परंपराओं पर आधारित हैं.

फौरी जरूरत इस बात की है कि सेना सर्वधर्म स्थल वाली अवधारणा को हर यूनिट में लागू करे और धार्मिक उत्सवों और आयोजनों के लिए मानदंडों को संहिताबद्ध करे. किसी एक धर्म के एकल पूजास्थलों की व्यवस्था से छुटकारा पाया जाए. जो अग्निपथ योजना लागू की गई है उसमें पूरे भारत के सभी वर्गों के योग्यता के आधार पर अग्निवीर के रूप में नियुक्त किया जाता है, जिनमें से 75 फीसदी को तय समय के बाद सेना में शामिल कर लिया जाएगा. इसलिए सर्वधर्म स्थल एक जरूरत बन गए हैं. इस मौके को नहीं गंवाया जाना चाहिए. एक धर्म वाले 120 सैनिकों के लिए एक धर्मगुरु के मानक की समीक्षा बेहद जरूरी है ताकि गलती से बहुसंख्यक समुदाय का वर्चस्व न स्थापित हो जाए. सेना के एक व्यूह या स्टेशन के लिए विभिन्न आस्थाओं के गुरुओं का एक समूह रखा जा सकता है ताकि सभी यूनिटों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके.

सेना की यूनिट में एकजुटता कायम करने के लिए धर्म कोई प्रमुख तत्व नहीं है, केवल आध्यात्मिक आवश्यकताओं पर ध्यान देना जरूरी है. इसलिए, धार्मिक परेडों के आयोजन और उनमें शामिल होने को वैधानिक अनिवार्यता की अवधारणा की जरूर समीक्षा की जानी चाहिए. एक खुला मंच जरूर होना चाहिए लेकिन उसमें हाजिरी देना स्वैच्छिक हो.
श्रेणियों से उपजी समस्या

1990 के दशक के बाद से धर्म राष्ट्रीय विमर्श पर हावी रहा है. इसने राजनीति और समाज में ध्रुवीकरण पैदा किया है, और सार्वजनिक दायरे में बहुसंख्यकों के धर्म का बहुत जोरदार और नुमाया उभार हुआ है. अपने वजूद पर हमेशा खतरा महसूस करते अल्पसंख्यक समुदाय इसी नक्शे-कदम पर चल पड़े हैं.

सेना में जो युवा पीढ़ी आई है वह इसी समाज की देन है, इसके बावजूद सेना के व्यापक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों, नियमों, और सैन्य क़ानूनों ने इसके प्रतिकूल प्रभावों को से बचा रखा है, चाहे सेना की संरचना और उसमें अपनाई जा रहीं धार्मिक प्रथाओं में खामी क्यों न हो.

बहरहाल, इसमें कोई संदेह नहीं है कि सेना के धर्मनिरपेक्ष मूल्य दबाव में हैं, जिसमें सेना के एक वर्ग के अनैतिक आचरण के कारण इजाफा हो रहा है.

सेना के कई वरिष्ठ अधिकारी या तो प्रोमोशन या रिटायरमेंट के बाद की सुविधाओं जैसे निजी लाभों के लिए, या इससे भी चिंताजनक बात यह है कि अपने दृढ़ विश्वास के कारण उस राजनीतिक विचारधारा से खुलकर जुड़ रहे हैं जिसकी जड़ें प्राचीन सभ्यता और धर्म में धंसी हैं. वे खुद धार्मिक स्थलों पर नजर आने, धर्मगुरुओं से मेलजोल करते दिखने की होड़ कर रहे हैं और सैन्य आयोजनों को पौराणिक-धार्मिक अतीत से जोड़ने में जुटे हैं, और संगठनों को धार्मिक नाम दे रहे हैं.
यह प्रवृत्ति उस संगठन के लिए बहुत खतरनाक है जिसमें सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी निजी आस्था और पहचान से मुक्त रहकर अपने संगठन के सामूहिक अ-राजनीतिक तथा धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में रच-बस जाएंगे.

औपनिवेशिक अतीत को दफन करें

लेफ्टिनेंट सैमुएल कमलेशन को मौजूदा औपनिवेशिक व्यवस्था के तहत जारी धार्मिक प्रथाओं के उल्लंघन के दोषी ठहराया गया. अब यह एक विचारणीय प्रश्न है कि एक कर्तव्यनिष्ठ आपत्तिकर्ता ने, जिसने मानदंडों का आंशिक पालन करने की कोशिश की 103 साल पुरानी यूनिट 3 कैवेलरी की एकता और मनोबल को कितनी चोट पहुंचाई. वह भी तब, जबकि मेरे विचार से उसमें कोई सर्वधर्म स्थल नहीं था और ऐसा कोई रेकॉर्ड दर्ज नहीं है कि दूसरे सैनिकों ने कोई आपत्ति की हो.

कमलेशन के मामले की या तो अनदेखी की जा सकती थी या उनका तबादला अखिल भारतीय, सर्व-वर्गीय यूनिट में किया जा सकता था. अब यही कहा जा सकता है कि कमांड शृंखला ने मामले को गलत ढंग से निबटाया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से 10 साल के अंदर मुक्त कराने को प्रतिबद्ध दिखते हैं. उन्होंने अपना यह इरादा 2021 में ही सेनाओं के कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में ही जाहिर कर दिया था. भारतीय सेना को औपनिवेशिक काल वाले अपने ढांचे और धार्मिक प्रथाओं को बदलने की पहल करनी चाहिए. देश का हित इसी में है कि सेनाएं संविधान की सच्ची भावना के अनुरूप अ-राजनीतिक तथा धर्मनिरपेक्ष बनी रहें और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सेना का जो उच्च अधिकारी हैं उन्हें मिसाल पेश करनी चाहिए.

लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग (सेवानिवृत्त), पीवीएसएम, एवीएसएम, ने 40 साल तक भारतीय सेना में सेवा की. वे उत्तरी कमान और केंद्रीय कमान के कमांडर रहे. रिटायरमेंट के बाद, उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में सदस्य के रूप में काम किया. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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