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Thursday, 15 January, 2026
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ममता के कैबिनेट से बाबरी मस्जिद तक: विवादों में उलझा रहा है हुमायूं कबीर का सफर

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कोलकाता, पांच दिसंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल में कभी ममता बनर्जी की पहली कैबिनेट में मंत्री रहे और वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सबसे विवादास्पद असंतुष्टों में से एक विधायक हुमायूं कबीर एक बार फिर राजनीतिक सुर्खियों में हैं।

हुमायूं कबीर ने इस बार छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर एक और बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखने की योजना की घोषणा करके राज्य की राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया है।

टीएमसी के लिए बृहस्पतिवार को उनका निलंबन अनुशासनात्मक कार्रवाई कम अनिवार्यता अधिक थी। कबीर के लिए, यह कुछ ऐसा था जिसका उन्हें महीनों से आभास रहा होगा।

कबीर (62) मुर्शिदाबाद की अल्पसंख्यक राजनीति में शायद सबसे अप्रत्याशित पहलू बनकर उभरे हैं।

टीएमसी में उनके विरोधी इसे ‘‘हुमायूं समस्या’’ कहते हैं जबकि उनके समर्थकों को उनका यह अंदाज पसंद है। और कबीर खुद इसे नियति कहते हैं।

टीएमसी का कहना है कि मस्जिद योजना से सांप्रदायिक तनाव भड़कने का खतरा है। मस्जिद योजना को लेकर टीएमसी से निलंबित किए जाने के कुछ ही देर बाद कबीर ने घोषणा की कि वह विधायक पद से इस्तीफा दे देंगे, 22 दिसंबर को अपनी पार्टी बनाएंगे और प्रस्तावित कार्यक्रम को आगे बढ़ाएंगे, भले ही इसके लिए उन्हें ‘‘गिरफ्तार’ किया जाए या मार ही क्यों ना दिया जाए।’’

टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने एक दशक से चले आ रहे टकराव को यह कहते हुए एक पंक्ति में सारबद्ध कर दिया , ‘‘वह गरजते ज्यादा हैं, बरसते कम हैं।’

कबीर का संगठनात्मक प्रभाव मुख्यतः उनकी विधानसभा सीट भरतपुर और उसके पड़ोसी रेजिनगर तक ही सीमित है और उनके जाने से पार्टी को ‘अधिक से अधिक एक या दो सीट का नुकसान’ होगा। हालांकि कबीर इस आकलन को पुराना साबित करने पर आमादा दिखते हैं।

तीन जनवरी, 1963 को जन्मे कबीर ने 90 के दशक की शुरुआत में युवा कांग्रेस के जरिए सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था और 2011 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में रेजिनगर से जीत हासिल की। एक साल बाद, वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और उन्हें कैबिनेट में जगह मिली।

तीन साल बाद, ममता बनर्जी पर उनके भतीजे अभिषेक को लेकर आरोप लगाने के बाद कबीर को छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया और इस घटना ने उनकी छवि एक प्रकृति से विरोधी नेता के रूप में स्थापित हुई।

अगर राजनीति को एक मैराथन मान लिया जाए तो कबीर लंबी रेस के घोड़े की तरह दौड़ते हैं। कबीर ने 2016 का विधानसभा चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़ा और हार गए। वर्ष 2018 में वे भाजपा में शामिल हुए, 2019 में उन्होंने मुर्शिदाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और हार गए।

छह साल का निष्कासन समाप्त होने पर, वह 2021 के चुनाव से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस में लौट आए और भरतपुर सीट से जीत दर्ज की।

2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान, 70:30 मुस्लिम-हिंदू अनुपात वाले एक जिले में, उन्होंने दावा किया कि वे ‘‘हिंदुओं को दो घंटे के भीतर भागीरथी में फेंक सकते हैं।’’

इस टिप्पणी के लिए उन्हें प्रधानमंत्री सहित पूरे देश की आलोचना झेलनी पड़ी, और पार्टी की ओर से एक और कारण बताओ नोटिस भी मिला।

महीनों बाद, उन्हें फिर से फटकार लगाई गई और इस बार अभिषेक बनर्जी को उप-मुख्यमंत्री बनाने की बात कहने पर। इसके बाद उन्होंने माफी तो मांगी लेकिन अनचाहे मन से।

तृणमूल से इस निलंबन ने कबीर को भले ही हाशिये पर धकेल दिया हो लेकिन इससे उनके उस मार्ग पर तेजी से बढ़ने की संभावना है जो वह बहुत पहले से तैयार कर चुके थे ।

उनकी हालिया राजनीतिक बयानबाजी से ऐसे नेता की छवि की झलक नहीं मिलती जो अनुशासनात्मक कार्रवाई से अचंभित है, बल्कि ऐसे नेता की ओर इशारा करती है जो अपने अगले कदम की तैयारी कर रहा है।

पिछले एक महीने में, उन्होंने एक नये धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की बात की थी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) तथा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के साथ ‘सकारात्मक बातचीत’ के संकेत दिए हैं। उन्होंने साथ ही मुर्शिदाबाद, मालदा, नदिया और 24 परगना जिलों में हेलीकॉप्टर दौरे की घोषणा की है।

उन्होंने एक वेबकास्ट के दौरान कहा, ‘‘एक हेलीकॉप्टर पर कितना खर्च होता है?चुनाव के दौरान दस दिनों के लिए लगभग 30 लाख रुपये खर्च होंगे। कोई पार्टी अपने नेता में निवेश क्यों नहीं करेगी?’’

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह नाटक जानबूझकर किया जा रहा है, यह उन दो निर्वाचन क्षेत्रों से परे महत्वाकांक्षा का संकेत देने का प्रयास है जहां उन्हें वास्तव में प्रभावशाली माना जाता है।

उनकी बयानबाजी भी तीखी हो गई है। उन्होंने ऐलान किया, ‘‘मैं धर्मनिरपेक्ष राजनीति पर मुख्यमंत्री और टीएमसी के दोहरे मानदंडों का पर्दाफ़ाश करूंगा। उन्होंने अल्पसंख्यकों को मूर्ख बनाया है और आरएसएस-भाजपा के साथ उनकी गुप्त सांठगांठ है।’’

नवीनतम टकराव बिंदु, छह दिसंबर को ‘बाबरी मस्जिद जैसी’ मस्जिद के निर्माण की प्रस्तावित शुरुआत है, जिसको लेकर टीएमसी नेता सबसे अधिक आशंकित हैं।

पश्चिम बंगाल में लंबे समय से अल्पसंख्यक राजनीति का केंद्र माना जाने वाले जिले में, तारीख और आशय जानबूझकर लोगों को भड़काने वाला प्रतीत हो रहा है।

पार्टी उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार ने कबीर के विद्रोह को खारिज करते हुए कहा, ‘‘किसी ऐसे व्यक्ति को महत्व क्यों दिया जाए जिसने दूसरा रास्ता चुन लिया है?’

हालांकि कुछ लोगों ने स्वीकार किया कि मस्जिद की योजना उस लक्ष्मण रेखा को लांघती है जिसे चुनाव-पूर्व वर्ष में पार्टी नेतृत्व पार करने को तैयार नहीं है।

भाषा अमित नरेश

नरेश

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यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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