मुंबई, 26 नवंबर (भाषा) प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसीपीएम) के चेयरमैन एस महेंद्र देव ने बुधवार को कहा कि कुरकुरे जैसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ ग्रामीण इलाकों में भी फलों और सब्जियों की तुलना में ज्यादा आसानी से उपलब्ध हैं। उन्होंने लोगों के लिए स्वस्थ खाद्य उत्पादों का बाजार विकल्प सुनिश्चित करने की जरूरत बतायी।
महेंद्र देव ने कहा कि उद्योग को इस पहलू पर गौर करने और यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि देश के लोगों को स्वस्थ उत्पाद उपलब्ध हों।
उन्होंने आगाह किया कि अगर हम इस मुद्दे को नजरअंदाज करते हैं, तो प्रसंस्कृत खाद्य और पेय पदार्थों के अत्यधिक सेवन से हमें मोटापे जैसी समस्याओं से जूझना पड़ेगा।
पीएमईएसी के चेयरमैन ने आधिकारिक सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए कहा कि प्रसंस्कृत खाद्य और पेय पदार्थों का ग्रामीण इलाकों में भी अब खाद्य उपभोग में 21 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं शहरी इलाकों में यह केवल 25 प्रतिशत से ऊपर होगा।
उन्होंने कहा कि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के मुद्दे पर उद्योग के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बाजार में स्वास्थ्यवर्धक स्नैक्स के बेहतर विकल्प उपलब्ध हों।
महेंद्र देव ने कहा, ‘‘ग्रामीण क्षेत्रों में फलों और सब्जियों की तुलना में चिप्स और कुरकुरे आसानी से उपलब्ध हैं।’’
उन्होंने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि खासकर बच्चों के लिए स्वास्थ्यवर्धक विकल्प उपलब्ध हों।
यह पूछे जाने पर कि क्या इस संबंध में कोई नीतिगत हस्तक्षेप की योजना है, देव ने कहा कि ज्यादातर प्रयास लोगों को शिक्षित करने और उद्योग जगत के साथ बातचीत करने पर केंद्रित होंगे।
उन्होंने कहा कि कामकाजी जोड़े प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर निर्भर हैं क्योंकि उनका दैनिक कार्यक्रम उन्हें रोजाना खाना पकाने की अनुमति नहीं देता और यह एक स्वास्थ्य समस्या है।
देव ने सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा आयोजित एक सेमिनार में कहा कि पिछले दस वर्षों में उपभोग के प्रतिरूप में काफी बदलाव आया है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी अनाज और फलों का हिस्सा केवल 10 प्रतिशत है, जो काफी कम है। अंडे और मांस ने अनाज के हिस्से को कम कर दिया है।
पीएमईएसी के चेयरमैन ने कहा कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था नए संरचनात्मक बदलावों की ओर बढ़ रही है, कुछ वर्षों के बाद हर बार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आधार में संशोधन की आवश्यकता होती है और इन बदलावों को शामिल करने के लिए नए सूचकांक बनाए जा रहे हैं।
भाषा रमण अजय
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