नैनीताल, 24 नवंबर (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में बार-बार लगने वाली वनाग्नि से संबंधित कई स्वत: संज्ञान जनहित याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई के बाद अगली सुनवाई की तारीख 28 नवंबर तय की है।
अदालत ने साथ ही प्रोफेसर अजय रावत को विशेषज्ञ मत देने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कार्यवाही में शामिल होने का निर्देश दिया है।
इससे पहले, न्यायालय ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर एक कार्ययोजना पेश करने के निर्देश दिए थे।
सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य सरकार को वन विभाग में रिक्त पदों को छह महीने के भीतर भरने, ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने और वनों की साल भर निगरानी सुनिश्चित करने सहित कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।
न्यायालय ने यह भी पूछा कि क्या राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए कृत्रिम वर्षा संभव हो सकती है।
न्यायालय ने इस मामले में ‘वन क्षेत्र, वन स्वास्थ्य और वन्यजीव संरक्षण के मामले में’ शीर्षक से स्वतः संज्ञान लिया था। न्यायालय ने इस संबंध में राज्य सरकार को बार-बार निर्देश जारी किए थे।
इससे पहले, अदालत को प्रदेश भर में बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं के बारे में सूचित किया गया और कहा गया कि सरकार स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठा रही है जबकि 2016 में जंगल की आग को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए थे।
वनाग्नि से बचाव और उसके नियंत्रण के लिए अदालत ने ग्राम स्तर पर समितियां गठित करने के निर्देश दिए थे।
याचिका में कहा गया कि हालांकि, सरकार आग बुझाने के लिए हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन इसकी लागत बहुत ज़्यादा है और यह तरीका पूरी तरह कारगर भी नहीं है। इसकी बजाय, प्रभावी अग्नि प्रबंधन के लिए ग्राम-स्तरीय समितियां बनाने का सुझाव दिया गया था।
न्यायालय ने वनाग्नि को उजागर करने वाली विभिन्न खबरों पर चिंता व्यक्त की और सरकार से कहा कि वह जंगल की आग को नियंत्रित करने और बुझाने के लिए अब तक किए गए उपायों के बारे में न्यायालय को सूचित करे।
भाषा
सं, दीप्ति रवि कांत
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
