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Saturday, 30 August, 2025
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विधेयकों को मंजूरी न्यायालय नहीं, बल्कि केवल राज्यपाल व राष्ट्रपति ही दे सकते हैं: महाराष्ट्र सरकार

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नयी दिल्ली, 26 अगस्त (भाषा) महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में दलील दी कि न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंज़ूरी नहीं दे सकते, क्योंकि यह अधिकार केवल राज्यपालों या राष्ट्रपति के पास होता है।

महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष यह दलील दी।

साल्वे राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श पर सुनवाई में महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए। राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श में पूछा गया है कि क्या न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के वास्ते समय-सीमा निर्धारित कर सकता है।

साल्वे ने दलील दी, ‘‘न्यायालय राज्यपालों को विधेयकों पर मंजूरी देने के लिए आदेश-पत्र जारी नहीं कर सकता… किसी कानून पर मंजूरी न्यायालय द्वारा नहीं दी जा सकती। किसी कानून पर मंज़ूरी या तो राज्यपालों द्वारा या राष्ट्रपति द्वारा दी जानी चाहिए।’’

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर भी शामिल हैं।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु के विधेयकों को मंजूरी देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शीर्ष अदालत की शक्ति का इस्तेमाल किया।

साल्वे ने संविधान के अनुच्छेद 361 का हवाला देते हुए कहा, ‘‘राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्तव्यों के इस्तेमाल और पालन के लिए या उन शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और पालन के तहत किये गये या किये जाने की संभावना के उद्देश्य को लेकर किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे।’’

उन्होंने कहा कि न्यायालय केवल राज्यपालों या राष्ट्रपति द्वारा लिये गए निर्णयों की पड़ताल कर सकता है और इनमें प्रस्तावित निर्णय भी शामिल हैं।

साल्वे ने कहा, ‘‘न्यायालय केवल यह पूछ सकता है कि आपका निर्णय क्या है, लेकिन न्यायालय यह नहीं पूछ सकता कि आपने निर्णय क्यों लिया है।’’

उन्होंने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों में अंतर बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति केवल केंद्र सरकार की सहायता और सलाह पर कार्य करते हैं, जबकि राज्यपालों के पास व्यापक शक्तियां हैं, जिनमें मंजूरी रोकने का अधिकार भी शामिल है।

उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय संघवाद की यह विशेषता नहीं है कि किसी प्रस्ताव को स्वीकृति देने से पहले कई दौर की विचार-विमर्श (सलाह-मशविरा) आवश्यक हो। हमारा संघवाद सीमित स्वरूप का है, जिसमें यह आशा की जाती है कि सभी संवैधानिक पदाधिकारी विवेक के साथ कार्य करेंगे।’’

उन्होंने कहा कि राज्यपाल की शक्ति न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आती।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने विधेयकों के संबंध में राज्यपालों की शक्तियों से संबंधित अनुच्छेद 200 का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं करता है।

उन्होंने कहा कि विधेयकों का पारित होना भी राजनीतिक विचार-विमर्श पर आधारित होता है और कभी-कभी इस प्रक्रिया में 15 दिन और कभी-कभी छह महीने लग सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले किसी गुप्त स्थान पर बैठकर नहीं लिये जाते।

साल्वे ने कहा कि एक बार जब संवैधानिक ढांचा शक्तियों का निर्धारण कर देता है तो तो उन अधिकारों का प्रयोग करने वाले उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत नहीं आते।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 361 की भाषा ‘‘बहुत स्पष्ट’’ है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति अपनी शक्तियों और कर्तव्यों के इस्तेमाल के लिए किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे।

साल्वे ने यह भी कहा, ‘‘जब तक राज्यपाल को जवाबदेह नहीं बनाया जाता, तब तक (किसी विधेयक को स्वीकृति न देने के) निर्णय की वैधता की जांच का कोई उपाय नहीं है, और इसका अर्थ है कि न्यायालय के लिए उसकी समीक्षा कर पाना संभव नहीं है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक को मंजूरी रोकने का राज्यपाल का अधिकार संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त है, हालांकि ‘वीटो’ शब्द का प्रयोग भ्रामक होगा।

उन्होंने कहा, ‘‘इसे वीटो कहना एक अनुचित विशेषता है… लेकिन हां, राज्यपाल के पास मंजूरी न देने का अधिकार है। यह अनुच्छेद 200 में निहित है और अनुच्छेद 201 के अनुरूप है, जो केंद्र को विधेयक की मंजूरी देने से रोकने की अनुमति देता है, भले ही विधेयक राज्य सूची में क्यों न हो।’’

जब न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि साल्वे के अनुसार, एक धन विधेयक को भी शुरू में ही रोका जा सकता है।

साल्वे ने कहा, ‘‘हां, क्योंकि एक बार सदन में किसी विधेयक में संशोधन होने के बाद भी राज्यपाल अपनी मंजूरी नहीं दे सकते। मैं केवल इस शक्ति के अस्तित्व पर विचार कर रहा हूं, इस पर नहीं कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है।’’

मध्य प्रदेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन.के. कौल ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत, राज्यपाल के पास तीन स्पष्ट विकल्प हैं: अनुमति देना, अनुमति नहीं देना, या विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रखना।

उन्होंने दलील दी कि राज्यपाल को विधेयक वापस करने की अनुमति देने वाला प्रावधान एक परामर्शी तंत्र है, न कि एक ठोस वीटो।

राजस्थान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने दलीलें दीं।

कार्यवाही जारी है।

इससे पहले पीठ ने पूछा, ‘‘जब सदन ने कोई विधेयक पारित कर दिया है, तो क्या राज्यपाल उस पर अनिश्चितकाल तक रोक लगा सकते हैं? मान लीजिए कि कोई विधेयक 2020 में पारित हो जाता है, तो क्या 2025 में भी कोई निर्णय न होने की स्थिति में न्यायालय कुछ नहीं कर सकता।’’

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए शीर्ष अदालत से मई में यह जानने का प्रयास किया था कि क्या न्यायिक आदेश राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के प्रयोग के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकते हैं।

भाषा

सुरेश पवनेश

पवनेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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