scorecardresearch
Sunday, 18 January, 2026
होमखेलमैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं पदक जीतूंगा: मणिपुर के दोहरे स्वर्ण पदक विजेता अथौबा

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं पदक जीतूंगा: मणिपुर के दोहरे स्वर्ण पदक विजेता अथौबा

Text Size:

नयी दिल्ली, तीन फरवरी (भाषा) मणिपुर के दोहरे स्वर्ण पदक विजेता ट्रायथलीट 17 वर्षीय सरुंगबाम अथौबा मैतेई ने राष्ट्रीय खेलों में अपनी दोहरी सफलता पर कहा कि ‘यह अप्रत्याशित था’।

इम्फाल के एक छोटे से इलाके सिंगजामेई चिंगमाथक के इस किशोर को यकीन ही नहीं हो रहा है कि उन्होंने उत्तराखंड में चल रहे राष्ट्रीय खेलों में क्या हासिल किया है।

अथौबा ने जज्बे और दृढ़ संकल्प का शानदार नजारा पेश करते हुए पुरुषों की व्यक्तिगत ट्रायथलन में खेलों का पहला स्वर्ण जीता और उसके बाद पुरुषों की व्यक्तिगत डुएथलन में दूसरा स्वर्ण जीता।

अथौबा ने पीटीआई से बात करते हुए कहा, ‘‘मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं पदक जीतूंगा।’’

ठंडे पानी में तैरने, अपने गृहनगर के पहाड़ी इलाकों में साइकिल चलाने और पैरों के सुन्न होने तक दौड़ने में अनगिनत घंटे बिताने वाले व्यक्ति के लिए जीत का क्षण किसी सपने के सच होने से कम नहीं था।

उनके दो खिताब ना केवल उनकी शानदार खेल प्रतिभा का प्रमाण हैं, बल्कि खेल के प्रति पारिवारिक समर्पण और जुनून का भी प्रमाण है जिसने उन्हें आकार दिया है।

एक ठेकेदार और पूर्व कॉलेज फुटबॉल खिलाड़ी सरुंगबाम जितेन मैतेई के घर जन्मे अथौबा को अपने सपनों को पूरा करने में हमेशा अपने परिवार का पूरा समर्थन मिला है। उनकी मां एक गृहिणी है।

अथौबा ने कहा, ‘‘मेरे माता-पिता मेरे खेल करियर के लिए अविश्वसनीय रूप से सहायक रहे हैं। वे मुझे स्कूल से लाते थे, ट्रेनिंग के लिए ले जाते थे और हर कदम पर मुझे प्रेरित करते रहे।’’

उनकी बड़ी बहन सरुंगबाम मार्टिना के प्रभाव ने अथौबा को तैराकी से जुड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरी दीदी एक अंतरराष्ट्रीय तैराक थीं। उनके पास बहुत अनुभव है जिससे मुझे बहुत मदद मिली।’’

अथौबा के पिता की खिलाड़ी के रूप में उनके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पिता ने मेरे से कहा, ‘तुम तैराकी में अच्छे हो। ट्रायथलन तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा। इसलिए साइकिल चलाना शुरू करो।’ उन्होंने मेरी खेल यात्रा में बहुत रुचि ली और मुझे बहुत प्रेरित किया।’’

प्रशिक्षण के सबसे कठिन चरणों के दौरान भी जितेन अपने बेटे के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा का निरंतर स्रोत रहे हैं।

अथौबा ने कहा, ‘‘पापा खेलों के लिए नहीं आए क्योंकि उन्होंने कहा कि अगर कुछ गलत हुआ तो वह इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे, लेकिन वह चाहते थे कि मैं इतिहास रचूं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब मैंने पदक जीता तो मेरी मां रोने लगीं। वह मेरे भाई के साथ यहां आई हैं।’’

भाषा सुधीर पंत

पंत

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

share & View comments