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Wednesday, 4 February, 2026
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पाकिस्तान मूल के व्यवसायी तहव्वुर राणा को भारत को प्रत्यर्पित किया जाए: अमेरिकी अदालत

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(ललित के झा)

वाशिंगटन, 17 अगस्त (भाषा) अमेरिका की एक अदालत ने मुंबई में 2008 हुए भीषण आतंकवादी हमलों में संलिप्तता के आरोपी एवं पाकिस्तानी मूल के कनाडाई व्यवसायी तहव्वुर राणा को बड़ा झटका देते हुए फैसला सुनाया है कि उसे प्रत्यर्पण संधि के तहत भारत को प्रत्यर्पित किया जा सकता है।

अमेरिका की नाइंथ सर्किट संबंधित अपीलीय अदाल ने 15 अगस्त को सुनाए अपने फैसले में कहा, ‘‘(भारत अमेरिका प्रत्यर्पण) संधि राणा के प्रत्यर्पण की अनुमति देती है।’’

राणा (63) ने कैलिफोर्निया में अमेरिकी जिला अदालत के आदेश के खिलाफ इस अपीलीय अदालत में याचिका दायर की थी। कैलिफोर्निया की जिला अदालत ने उसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को अस्वीकार कर दिया था। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में मुंबई में आतंकवादी हमलों में राणा की कथित संलिप्तता के लिए उसे भारत प्रत्यर्पित किए जाने के मजिस्ट्रेट न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दी गई थी।

अपीलीय अदालत के न्यायाधीशों के पैनल ने जिला अदालत के फैसले की पुष्टि की।

राणा फिलहाल लॉस एंजलिस की एक जेल में बंद है और वह 26/11 के मुंबई हमले में अपनी भूमिका को लेकर आरोपों का सामना कर रहा है। बताया जाता है कि उसका संबंध लश्कर-ए-तैयबा में पाकिस्तान मूल के अमेरिकी आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली से है। हेडली 2008 में मुंबई में 26 नवंबर को हुए हमले के मुख्य साजिशकर्ताताओं में एक था।

राणा के पास मौजूदा फैसले के खिलाफ अपील करने का विकल्प है। उसके पास अब भी भारत को प्रत्यर्पित किये जाने से बचने के लिए कानूनी विकल्प बंद नहीं हुए हैं।

प्रत्यर्पण आदेश संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण समीक्षा के सीमित दायरे के तहत, पैनल ने माना कि राणा पर लगाए गए आरोप अमेरिका और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि की शर्तों के अंतर्गत आते हैं।

इस संधि में प्रत्यर्पण के लिए किसी व्यक्ति को एक अपराध के लिए दो बार दंडित नहीं किए जाने का सिद्धांत का अपवाद शामिल है।

पैनल ने संधि की विषय वस्तु, विदेश मंत्रालय के तकनीकी विश्लेषण और अन्य सर्किट अदालतों में इस प्रकार के मामलों पर गौर करते हुए माना कि ‘‘अपराध’’ शब्द अंतर्निहित कृत्यों के बजाय आरोपों को संदर्भित करता है तथा इसके लिए प्रत्येक अपराध के तत्वों का विश्लेषण आवश्यक है।

तीन न्यायाधीशों के पैनल ने निष्कर्ष निकाला कि सह-साजिशकर्ता की दलीलों के आधार पर किया गया समझौता किसी अलग नतीजे पर पहुंचने के लिए बाध्य नहीं करता। पैनल ने माना कि अपवाद इस मामले पर लागू नहीं होता, क्योंकि भारतीय आरोपों में उन आरोपों से भिन्न तत्व शामिल हैं, जिनके लिए राणा को अमेरिका में बरी कर दिया गया था।

पैनल ने अपने फैसले में यह भी माना कि भारत ने मजिस्ट्रेट न्यायाधीश के इस निष्कर्ष का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सक्षम सबूत पेश किए हैं कि राणा ने वे अपराध किए हैं, जिनका उस पर आरोप लगाया गया है। पैनल के तीन न्यायाधीशों में मिलन डी स्मिथ, ब्रिजेट एस बेड और सिडनी ए फिट्जवाटर शामिल थे।

पाकिस्तानी नागरिक राणा पर अमेरिका की एक जिला अदालत में मुंबई में बड़े पैमाने पर आतंकवादी हमले करने वाले एक आतंकवादी संगठन को समर्थन देने के आरोप में मुकदमा चलाया गया था। जूरी ने राणा को एक विदेशी आतंकवादी संगठन को सहायता प्रदान करने और डेनमार्क में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने की नाकाम साजिश में सहायता प्रदान करने की षड्यंत्र रचने का दोषी ठहराया था।

हालांकि, इस जूरी ने भारत में हमलों से संबंधित आतंकवादी कृत्यों में सहायता प्रदान करने की साजिश रचने के आरोप से राणा को बरी कर दिया था। राणा को जिन आरोपों के तहत दोषी ठहराया गया था, उसने उनके लिए सात साल जेल में काटे और उसकी रिहाई के बाद भारत ने मुंबई हमलों में उसकी संलिप्तता के मामले में उस पर मुकदमा चलाने के लिए उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया था।

राणा को प्रत्यर्पित किए जा सकने का सबसे पहले फैसला सुनाने वाले मजिस्ट्रेट न्यायाधीश के समक्ष उसने दलील दी थी कि भारत के साथ अमेरिका की प्रत्यर्पण संधि उसे उपरोक्त अपवाद प्रावधान के कारण प्रत्यर्पण से संरक्षण प्रदान करती है। उसने यह भी दलील दी थी कि भारत ने यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दिए कि अपराध उसने ही किए हैं। अदालत ने राणा की इन दलीलों को खारिज करने के बाद उसे प्रत्यर्पित किए जा सकने का प्रमाणपत्र जारी किया था।

इन आतंकवादी हमलों में छह अमेरिकी नागरिकों समेत कुल 166 लोगों की जान गयी थी।

भाषा

राजकुमार माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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