इस्लामाबाद, चार अगस्त (भाषा) पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए संसद और प्रांतीय असेंबली में महिलाओं तथा अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों को लेकर शीर्ष अदालत के बहुमत के फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी को ये सीट दिलाने के लिए संविधान के कुछ प्रावधानों से परे जाने की जरूरत है।
उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों-अमीनुद्दीन खान और नईम अख्तर अफगान ने इस वर्ष 12 जुलाई को पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश काजी फैज ईसा के नेतृत्व वाली शीर्ष अदालत की पूर्ण पीठ द्वारा घोषित बहुमत के फैसले में 29 पृष्ठों का असहमति नोट जारी किया है।
खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी द्वारा समर्थित उम्मीदवार पार्टी का चुनाव चिह्न छीन लिए जाने के बाद आठ फरवरी को हुए चुनावों में निर्दलीय के रूप में उतरे थे और जीत हासिल की थी। वे गठबंधन बनाने के लिए सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल (एसआईसी) में शामिल हो गए थे, जो पाकिस्तान में इस्लामी राजनीतिक और बरेलवी धार्मिक दलों का एक राजनीतिक गठबंधन है।
तेरह सदस्यीय पूर्ण न्यायालय के आठ न्यायाधीशों ने 12 जुलाई को सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल (एसआईसी) द्वारा पेशावर उच्च न्यायालय (पीएचसी) के आदेश के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार कर लिया। आदेश में पाकिस्तान के निर्वाचन आयोग के उस निर्णय को बरकरार रखा गया था, जिसमें एसआईसी को विधायिकाओं में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीट नहीं देने का निर्णय लिया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि खान की पार्टी संसद में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित 20 से अधिक सीट के लिए पात्र है। न्यायाधीशों ने बहुमत के फैसले में 80 एसआईसी सांसदों में से 39 को पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के सदस्य के रूप में स्वीकार किया था क्योंकि उन्होंने आम चुनाव से पहले ईसीपी को अपनी पार्टी संबद्धता प्रमाणपत्र जमा किए थे। उन्होंने शेष 41 सांसदों को 15 दिनों के भीतर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ में शामिल होने की अनुमति भी दी थी।
पांच न्यायाधीशों-प्रधान न्यायाधीश काजी फैज ईसा, न्यायमूर्ति जमाल खान मंडोखैल, न्यायमूर्ति याह्या अफरीदी, न्यायमूर्ति अमीनुद्दीन खान और न्यायमूर्ति नईम अख्तर अफगान ने बहुमत के आदेश से असहमति जताई।
‘डॉन’ अखबार के मुताबिक, न्यायमूर्ति अमीनुद्दीन और न्यायमूर्ति अफगान की ओर से असहमति वाला नोट विस्तृत बहुमत का आदेश जारी होने से पहले आया है।
असहमति वाली टिप्पणी में कहा गया कि बहुमत के संक्षिप्त आदेश ने नेशनल असेंबली के साथ-साथ तीन प्रांतीय असेंबली में एक नया संसदीय दल बना दिया, जो स्पष्ट रूप से शीर्ष अदालत के समक्ष कोई मुद्दा नहीं था।
नोट में कहा गया है कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के लिए राहत देने के संबंध में न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 175 और 185 द्वारा प्रदत्त अधिकार क्षेत्र से परे जाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 51, 106 और 63 तथा चुनाव अधिनियम, 2017 की धारा 104 के साथ-साथ संबंधित नियमों को भी दरकिनार करना होगा। इसमें कहा गया, ‘‘हमें अनुच्छेद 51, 106 और धारा 104 के स्थान पर ऐसे अनुच्छेद और धाराएं भी शामिल करनी होंगी, जो बहुमत के निर्णय के माध्यम से दी गई राहत के अनुरूप हों।’’
असहमति वाली टिप्पणी में 15 दिन की अवधि समाप्त होने के बावजूद बहुमत आदेश को जारी करने में हुई देरी पर भी आश्चर्य व्यक्त किया गया। नोट में कहा गया, ‘‘इस देरी के कारण न्यायालय के आदेश के खिलाफ सरकार द्वारा दायर की गई समीक्षा याचिका निरर्थक हो सकती है। इसलिए, संक्षिप्त आदेश के आधार पर हम अपने निष्कर्ष दर्ज करने के लिए बाध्य हुए हैं।’’
भाषा आशीष नेत्रपाल
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