नयी दिल्ली, चार मार्च (भाषा) पश्चिम बंगाल के एक व्यक्ति को 40 साल पहले हुई उसकी पत्नी की हत्या के आरोप से बरी करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले ने एक बार फिर गलत अभियेाजन के पीड़ित को मुआवजा देने की जरूरत पर बहस छेड़ दी है।
न्यायालय ने कहा कि केवल न्यायेतर इकबालिया बयान के आधार पर उसकी दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह कमजोर साक्ष्य है। हत्या का यह मामला 11 मार्च, 1983 को पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान जिले में सामने आया था। निचली अदालत ने 31 मार्च, 1987 को आरोपी निखिल चंद्र मंडल को उसकी पत्नी की हत्या के बरी कर दिया था।
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय का रुख किया। दिसंबर, 2008 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मंडल को दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा दी। मंडल ने अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ 2010 में शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी, जिस पर शुक्रवार को फैसला आया।
मंडल की वकील रुखसाना चौधरी के अनुसार, लगभग 64 वर्षीय निखिल अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ्तारी के समय 24 वर्ष का था। उन्होंने कहा कि पत्नी की हत्या के बाद मंडल की गिरफ्तारी और 2008 में उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद से उसने 14 साल से अधिक समय सलाखों के पीछे बिताया है।
मंडल का मामला गलत अभियोजन का कोई ऐसा पहला मामला नहीं, जहां पीड़ित को लंबे समय सलाखों के पीछे रहना पड़ा। उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में गलत गिरफ्तारी और फिर जेल में रखने सहित मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजे की आवश्यकता को स्वीकार किया है।
हालांकि, अदालत ने अनुचित अभियोजन के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए केंद्र सरकार को कोई निर्देश जारी नहीं किए हैं।
शीर्ष अदालत ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन को 2018 में 50 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। उन्हें 1994 के जासूसी मामले में झूठा फंसाये जाने के 24 साल बाद इस मुआवजे की घोषणा की गई।
वर्ष 2015 के एक फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने वन अधिकारी राम लखन सिंह को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, जिन्हें भ्रष्टाचार के मामलों में झूठा फंसाया गया था।
लंबा समय जेल में बिताने के बाद मंडल को बरी किए जाने के मामले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वरिष्ठ वकील और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने कहा कि गलत अभियोजन के खिलाफ कानून होना चाहिए।
द्विवेदी ने कहा, ‘‘कानून संसद को बनाना पड़ेगा और संभवत: उच्चतम न्यायालय उस तरह का विधेयक पेश करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकता है। यह (गलत अभियोजन) व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। अगर कुछ मुआवजा दिया जाता है, तो भी यह जेल में बर्बाद हुए मूल्यवान समय के नुकसान की पूरी तरह से भरपायी नहीं कर सकता। लेकिन, फिर भी पीड़ित की पीड़ा कम करने के लिए कुछ कदम उठाया जा सकता है।’’
गलत अभियोजन के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले उच्चतम न्यायालय के वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि यदि गलत और द्वेषपूर्ण अभियोजन साबित होता है, तो राज्य को सच्चाई सामने न लाने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।
भाषा शफीक दिलीप
दिलीप
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