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Wednesday, 25 February, 2026
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छह साल बाद भी नोटबंदी की मार को नहीं भूले हैं लोग

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नयी दिल्ली, दो जनवरी (भाषा) छह साल पहले सरकार द्वारा 500 और एक हजार रुपये के नोट बंद किए जाने से पैदा हुईं परेशानियों को लोग आज भी नहीं भूले हैं। परेशानियों की याद आज एक बार फिर तब ताजा हो गई जब उच्चतम न्यायालय ने आठ नवंबर 2016 के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा।

सरकार ने अपने फैसले को काले धन पर एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करार दिया था, हालांकि इससे देश के अनेक लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा, खासकर ऐसे वर्ग को जो विशेष रूप से नकदी पर निर्भर करता है।

घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली 38 वर्षीय परवेश ‘नोटबंदी’ शब्द के उल्लेख मात्र से ही सिहर उठती हैं।

बीस वर्षीय बेटे की माँ ने कहा कि उन्हें लगभग दो महीने तक बिना वेतन के काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा और लगातार कई दिन तक खाली पेट रहना पड़ा।

परवेश ने कहा, ‘यह मेरे जीवन का सबसे बुरा समय था। कोविड-19 से भी बदतर, क्योंकि कोविड के दौरान सरकार और समाज से कम से कम कुछ मदद मिली। लेकिन नोटबंदी के दौरान, हमें अकेला छोड़ दिया गया।’

उन्हें उच्चतम न्यायालय के सोमवार के फैसले के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘मेरा मतलब है कि मैं अपने नियोक्ता से कैसे मदद की उम्मीद कर सकती थी जब वह खुद ही पैसे के लिए संघर्ष कर रहा था?’

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि 2016 के विमुद्रीकरण के पीछे निर्णय लेने की प्रक्रिया ‘त्रुटिपूर्ण नहीं थी।’

पांच न्यायाधीशों की पीठ में चार न्यायाधीशों ने नोटबंदी के फैसले को बरकरार रखने का पक्ष लिया, जबकि एक न्यायाधीश ने असहमति जताई।

दर्द केवल गरीबों तक ही सीमित नहीं था, और मध्यम वर्ग को भी विमुद्रीकरण के मद्देनजर भारी परेशानी उठानी पड़ी। लोग एटीएम के सामने कभी न खत्म होने वाली कतारों में खड़े होने की पीड़ा को आज तक नहीं भूले हैं। जब तक लोगों का नंबर आता था, तब तक एटीएम में नकदी खत्म हो जाती थी।

कई छोटे-बड़े व्यवसाय आज भी विमुद्रीकरण की मार से नहीं उबरे हैं।

सूरत के व्यवसायी मनीष शाह ने कहा, ‘‘हमारा व्यवसाय नकदी पर निर्भर करता है और इससे हमारे लिए ठीक से काम करना और अपना व्यवसाय चलाना असंभव हो गया। हमारे पास बची हुई नकदी को बदलने के लिए सरकार द्वारा एक सीमित समय दिया गया था, हम लगातार असमंजस में थे कि हमें कारोबार करना चाहिए या अपनी नकदी का आदान-प्रदान करने के लिए घंटों लंबी कतारों में खड़े रहना चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘पूरे देश में पूरा व्यापार चक्र बाधित हो गया था।’

जम्मू के रहने वाले राजेंद्र गुप्ता ने कहा कि नकदी की कमी ने उनकी इकलौती बेटी की शादी के अवसर को दुःस्वप्न में बदल दिया था।

उन्होंने याद किया कि कैसे उन्हें विक्रेताओं को भुगतान करने के लिए अपनी मेहनत की कमाई के लिए भीख माँगनी पड़ी थी ताकि तैयारी बिना किसी रोक-टोक के चल सके।

गुप्ता ने कहा, ‘मेरे पास विक्रेताओं को भुगतान करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था। बैंक से आप कितना पैसा निकाल सकते हैं, इसकी एक सीमा थी।’’

खबरों के मुताबिक, देश के अलग-अलग हिस्सों में पैसे निकालने और चलन से बाहर हुए नोट बदलने के लिए लाइन में खड़े होने के दौरान कई लोगों की मौत हो गई।

यथास्थिति लौटने के महीनों पहले मार्च 2017 में केंद्र सरकार ने कहा कि कतार में कितने लोग मारे गए, इसकी ‘कोई आधिकारिक रिपोर्ट नहीं’ है।

तब वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में कहा था, ‘ऐसी कोई आधिकारिक रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।’

भाषा नेत्रपाल माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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