नयी दिल्ली, सात नवंबर (भाषा) भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) ने सोमवार को कहा कि पंजाब में पराली जलाने पर अंकुश लगाने के लिए वह कम अवधि के चावल की किस्मों में अधिक उपज प्राप्त करने को लेकर ‘ब्रीडिंग’ कार्यक्रम की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को लंबी अवधि वाले पूसा-44 किस्म के स्थान पर इस नये कम अवधि वाले धान फसल की ओर आकर्षित करना है।
पंजाब और अन्य हिस्सों में किसानों के पराली जलाने से उत्तर भारत में सर्दियों के मौसम में वायु प्रदूषण होता है।
आईएआरआई के निदेशक ए के सिंह ने पीटीआई-भाषा से कहा कि पंजाब में पराली जलाने का कारण लंबी अवधि की धान किस्म विशेष रूप से पूसा -44 है। इससे प्रदेश में खेती की जाती हैं, जो 155 दिनों में पकती हैं, जिससे फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कम समय मिलता है।
आईएआरआई की कम अवधि वाली किस्में – पीआर 126, पूसा बासमती-1509, पूसा बासमती-1692 पंजाब में जारी किया जा रहा है। ये 120 दिनों में पक जाती हैं। लेकिन प्रदेश के कुल 31 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र में से अल्पावधि वाले धान किस्म की बुवाई केवल 5-6 लाख हेक्टेयर में की गई है।
उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा इसलिए है क्योंकि पूसा-44 किस्म 8 टन प्रति हेक्टेयर की उपज देती है। यदि अवधि एक महीने कम कर दी जाती है, तो उपज की हानि एक टन प्रति हेक्टेयर है, जिसका अर्थ है कि लंबी अवधि धान फसल के मुकाबले किसानों को लगभग 20,000 रुपये प्रति हेक्टेयर का नुकसान।’’
सिंह ने कहा कि लेकिन तमाम लागतों और कामकाज खर्च को ध्यान में रखें तो कम अवधि के धान किस्म उगाने से होने वाले नुकसान के बारे में किसानों की धारणा सही नहीं बैठती हैं।
उन्होंने कहा कि अल्पावधि धान किस्म उगाने से न केवल किसानों को पराली के प्रबंधन के लिए 25 दिन का समय मिलता है, बल्कि सिंचाई के पानी और अन्य लागतों की बचत भी होती है।
कम अवधि वाली धान की किस्में मध्य सितंबर या अक्टूबर के अंत में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं, जिससे गेहूं की बुवाई के लिए खेतों को तैयार करने के लिए एक महीने का समय मिलता है। जबकि धान की लंबी अवधि वाली किस्मों की कटाई अक्टूबर के अंत या नवंबर के पहले सप्ताह में की जाती है।
पंजाब के किसानों को लंबी अवधि की धान की किस्म उगाने से हतोत्साहित करने के लिए आईएआरआई ने तीन साल पहले ही पूसा-44 के ब्रीडर बीज उत्पादन को बंद कर दिया था।
उन्होंने कहा कि एक समय पंजाब में धान के कुल रकबे के 50 प्रतिशत हिस्से में पूसा-44 की खेती होती थी, जो राज्य सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक अब घटकर 10-12 प्रतिशत रह गई है।
उन्होंने कहा, ‘‘अब, यह कम हुआ है, और अगले 2-3 वर्षों में यह और नीचे आ जाएगा।’’
भाषा राजेश राजेश रमण
रमण
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
