नई दिल्ली: कोविड-19 को फैलने से रोकने की कोशिशों के बीच ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’ को लेकर चर्चा जोर पकड़ रही है और कुछ सरकारें इस तरह के दस्तावेज पर जोर दे रही हैं, जो किसी व्यक्ति को रोग के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखने वाला प्रमाणित करता हो.
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भेदभाव और ‘जानबूझ कर’ संक्रमण के मामलों को बढ़ावा मिलेगा.
कोरोनावायरस के टीके के विकास में अभी कई महीने लग सकते हैं, ऐसे में किसी व्यक्ति के संक्रमित होने और सार्स-सीओवी-2 के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखने का प्रमाण देने के प्रस्ताव पर गहन मंथन चल रहा है.
नोवेल कोरोनावायरस फैलने से रोकने के लिए सामाजिक दूरी बनाकर रखने संबंधी पाबंदियों के बीच चिली, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई देशों की सरकारों ने ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’ के इस्तेमाल का सुझाव दिया है.
जिस व्यक्ति के पास ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’ होगा उसे शारीरिक दूरी की पाबंदियों से छूट दी जा सकती है और वह कामकाज पर लौट सकता है, बच्चे स्कूल जा सकते हैं.
विषाणु विज्ञानी उपासना रे ने कहा, ‘एक इम्युनिटी पासपोर्ट इस बात का प्रमाणपत्र है कि कोई व्यक्ति सार्स-सीओवी-2 संक्रमण को लेकर प्रतिरक्षा क्षमता रखता है.’
सीएसआईआर के कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी की वरिष्ठ वैज्ञानिक उपासना ने बताया कि लोगों को प्रतिरोधक क्षमता रखने वाला प्रमाणित करने के पीछे तर्क है कि ऐसे लोगों में वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडी बने हैं और मौजूद हैं.
हालांकि, इस संबंध में भारत का रुख बहुत सावधानी वाला है.
आईसीएमआर के चेन्नई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी के निदेशक मनोह मुरहेकर ने कहा, ‘इस बात के अभी तक कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति को दोबारा संक्रमण नहीं हो सकता. दक्षिण कोरिया से लोगों को पुन: संक्रमण होने की खबरें हैं, इसलिए खून में सार्स-सीओवी-2 एंटीबॉडी होने के आधार पर ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’ देना व्यवहार्य नहीं है.’
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हालांकि, भारत में उन लोगों को यात्रा की अनुमति है जिनके मोबाइल फोन में आरोग्य सेतु ऐप हरे रंग के साथ उनके सुरक्षित होने का संकेत करता है. यह पूरी तरह खुद की घोषणा पर आधारित है.
दुनियाभर में कोरोनावायरस से संक्रमण के मामले 56 लाख की संख्या को पार कर गये हैं और साढ़े तीन लाख से अधिक मौत हो चुकी हैं, ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोई व्यक्ति कोविड-19 से ठीक हो चुका है और उसके शरीर में एंटीबॉडी हैं, तो वह दूसरी बार संक्रमण से बचा रहेगा.
विशेषज्ञों ने कहा कि तकनीकी जटिलताओं के साथ ही ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’ से नियामक और नैतिकता संबंधी चिंताएं भी हैं.
प्रतिरक्षा विज्ञानी सत्यजीत रथ ने कहा, ‘इम्युनिटी पासपोर्ट का विचार प्रशासनिक क्रियान्वन में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है और इसका कई तरीके से, खासकर गरीबों और वंचित समूहों के लिए व्यापक दुरुपयोग भी होने की आशंकाएं हैं.’
अमेरिका के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के अलेक्जेंड्रा एल फेलान ने लांसेट पत्रिका में लिखा है कि ‘इम्युनिटी पासपोर्ट’ से इस तरह का कृत्रिम प्रतिबंध लग जाएगा कि कौन सामाजिक, नागरिक और आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकता है और कौन नहीं. इससे लोग खुद को संक्रमित दिखाना चाह सकते हैं.
उन्होंने कहा कि इससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी पैदा होंगे.
