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चित्रण: सोहम सेन/ दिप्रिंट
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भारतीय संसद पर जैश-ए-मोहम्मद के हमले के बाद 2002 के शुरू में जब भारत ने ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के तहत सेना की भारी तैनाती का आदेश दिया था तब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ की प्रतिक्रिया कुछ सहमी हुई भी थी और कुछ हेकड़ी भरी भी थी. 12 जनवरी को मुशर्रफ ने सुलह के स्वर में भाषण दिया और वादा किया कि वे किसी दहशतगर्द गुट को अपने मुल्क की ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे. लेकिन भारत ने दबाव में कोई कमी नहीं की. उस समय भी दोनों देशों की सेनाओं, खासकर वायुसेना के मामले, में काफी असुंतलन था. मुशर्रफ उस समय अपने परमाणु हथियारों का बार-बार जिक्र करके अपना डर और अपनी हताशा ही उजागर कर रहे थे.

दहशत फैलाने के लिए वे उस समय एक के बाद एक मिसाइलों के परीक्षण करवा रहे थे. इन मिसाइलों के नाम मध्ययुग में भारत पर हमला करने वाले मुस्लिम आक्रमणकारियों के नाम पर रखे गए थे- गोरी, गजनवी, अब्दाली, बाबर आदि. ऐसी और मिसाइलें थीं या नहीं, आप गूगल पर सर्च कर लीजिए.

निरुपमा राव, जो बाद में बीजिंग, वाशिंगटन में राजदूत रहीं और विदेश सचिव भी बनीं, उस समय विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता थीं. उनकी रोज की ब्रीफिंग के दौरान उनसे सवाल पूछा जाता था कि इन मिसाइलों के परीक्षण के बारे में उनका क्या कहना है. उनका जो जवाब होता था वह एक अमर मिसाल बन चुका है- ‘हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.’ पांच शब्दों के इस एक छोटे-से वाक्य ने पाकिस्तान को परमाणु ब्लैकमेल के लिए दुनिया भर में मखौल का पात्र बना दिया था. राव ने यह विस्तार से बताने की जरूरत नहीं समझी कि भारत पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का किस तरह जवाब देगा. ये बातें हर कोई समझता है. उसकी इस तरह मूर्खतापूर्ण धमकियों की इसी तरह की उपेक्षा जरूरी है जिसकी वे हकदार हैं. ब्रीफिंग में मौजूद पत्रकार उनके उस जवाब पर हंस दिए थे. अगले दिन भारत तथा विदेशी मीडिया ने इस परमाणु मुद्दे से किनारा कर लिया. भारत ने इस बेवकूफी भरे जोश का उसी जोश से जवाब दिए बिना या जवाबी परीक्षण में कोई मिसाइल बरबाद किए बिना अपनी बात साफ कर दी थी.

जाहिर है, मुशर्रफ हताश और खफा होकर रह गए थे. शायद एक औरत से मिले इस अपमान से और भी ज्यादा गुस्से में आकर उन्होंने तुरंत मीडिया के सामने कुछ इस तरह का बयान दे डाला कि ‘क्या वह औरत यह कहना चाहती है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता? वे काफी खतरनाक हथियार हैं.’

सबक साफ और मजबूत है. जाने-पहचाने संदिग्ध, पाकिस्तान ने 2002 में युद्ध के माहौल में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी दी. इसे एक चतुराई भरे कूटनीतिक बयान से बेअसर कर दिया गया. पाकिस्तान को हम ‘जाना-पहचाना संदिग्ध’ इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी 1987 से देता आ रहा है.
अफसोसजनक सच यह है कि उसने भारत से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण कर लिया था. भारत ने 1974 में ही पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण कर लिया था मगर परमाणु हथियारों के निर्माण के कार्यक्रम को वह लटकाता रहा. आज जो फैशन चल पड़ा है, उसमें इसके लिए भी गांधी परिवार को दोष दिया जा सकता है. इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी वगैरह में उलझकर वाकई बहुत समय गंवा दिया. उनके बाद मोरारजी देसाई आए, जिन्हें अपने इतिहास के एकमात्र सच्चे, और सच कहें तो बंटाढारी, शांतिवादी कहा जा सकता है. वे परमाणु हथियारों और खुफियागीरी आदि को घोर अनैतिक मानते थे.


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इंदिरा गांधी का दूसरा कार्यकाल आंतरिक संघर्षों, खासकर असम और पंजाब के संघर्षों में उलझकर रह गया. राजीव गांधी को ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ में जाकर खतरों और असंतुलनों का पता चला, तब उनकी नींद खुली. उन्होंने देश को पूर्ण हथियारों से लैस करने का कार्यक्रम शुरू किया. यह एक के बाद एक आठ प्रधानमंत्रियों के हाथों से गुजरता हुआ किस तरह पूरा हुआ इसकी कहानी मैं विस्तार से लिख चुका हूं. 1987 में जब पाकिस्तान की ओर से पहली बार परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी मिली या इसका आभास मिला, तभी भारत ने अपनी रणनीतिक हिचक त्याग दी थी.

अगला पाकिस्तानी ब्लैकमेल 1990 की गर्मियों में किया गया, जब पलड़ा उसके पक्ष में ही झुका हुआ था. यह कहानी पूरे सबूतों के साथ दर्ज़ हो चुकी है. कश्मीर बग़ावत के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, बेनज़ीर भुट्टो इसके राज्यपाल जगमोहन के टुकड़े-टुकड़े करने की बातें कह रही थीं- ‘उसको हम जग-जग, मो-मो, हन-हन कर देंगे’, सेनाएं जिंदा अस्लहों के साथ खड़ी थीं, हमलोग युद्ध की आशंकाओं पर आवरण कथाएं लिख रहे थे, और पाकिस्तानी विदेश मंत्री साहबज़ादा याक़ूब खान भारत के दौरे पर आए थे.

उन्होंने हमारे विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल से कहा कि अभी लड़ाई शुरू मत कीजिए वरना हमारी नदियां, हमारे जंगल और पहाड़, सब कुछ आग में राख़ हो जाएंगे. गुजराल का जवाब भी उतना ही लाजवाब था जिसकी अपेक्षा आप किसी पुराने किस्म के कूटनीतिक से रख सकते हैं. गुजराल ने कहा था, ‘मैं नहीं जानता आप क्या कह रहे हैं याक़ूब साहब, लेकिन जिन दरियाओं का पानी आपने पीया है उनका ही हमने भी पीया है.’

यह भी पूरी मुलायमियत मगर प्रभावी तरीके से जोरदार जवाब देने की एक और मिसाल थी. इन वाकयों का विस्तृत ब्योरा अमेरिकी खोजी पत्रकार सेमोर हर्श, तत्कालीन डिप्टी एनएसए रॉबर्ट गेट्स की रिपोर्टों, एनबीसी के बॉब विंडरेम तथा एड बरोज़ की एक उल्लेखनीय पुस्तक ‘क्रीटिकल मास : द डैंजरस रेस फॉर सुपरवीपन्स’ में और उस समय के मेरे पत्रकारीय लेखन में दर्ज़ हो चुका है.

करगिल युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु हथियारों की तमाम बातों को अनसुना कर दिया था. लेकिन दबंगई की आदत से मजबूर पाकिस्तानी फौज बालाकोट हमले के दिन एक बार फिर हेकड़ी जताने से बाज नहीं आई. इसके बड़बोले प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफ़ूर ने कहा कि नेशनल कमांड ऑथरिटी की बैठक बुलाई गई. और फिर उन्होंने बनावटी हंसी के साथ कहा, ‘आप जानते हैं कि इसका क्या मतलब होता है.’ मेरा ख्याल है, किसी ने तुरंत उन्हें चेताया होगा, तभी शायद उन्होंने या किसी और ने फिर इसका जिक्र नहीं किया.

26-27 फरवरी का संकट लगभग उसी तरह गुजर गया जिस तरह भारत-पाकिस्तान के बीच की तनातनी प्रायः गुजर जाती है, और दोनों पक्ष अपनी-अपनी जनमत के पूर्वाग्रहों के साथ अपनी-अपनी जीत के दावे करने लगते हैं. किसी ने न तो महायुद्ध की धमकी दी और न किसी ने अपनी मिसाइल चमकाई. मेहरबानी करके 12 मिसाइलों के ‘प्लांड’ हमले की फंतासी पर यकीन मत कीजिए. यह अफीमचियों द्वारा फैलाए गई अफवाह है. दोनों पक्ष को पता है कि महज एक बैलिस्टिक मिसाइल को दागने का अंजाम क्या होगा. जब भी इसे दागा जाएगा, इस पर चाहे जो भी बारूद लगाया गया हो, दूसरा पक्ष यही सोचेगा कि इस पर परमाणु हथियार ही है. यही वजह है कि सभी बैलिस्टिक मिसाइलों को आम सेना से अलग करके उनकी अपनी-अपनी रणनीतिक सेना कमानों के हाथों में सौंप दिया गया है.

हकीकत यह है कि इस उपमहाद्वीप में परमाणु अस्त्रों के प्रयोग के खिलाफ बनाई गई व्यवस्था ने फिर अपना काम किया. जब आप रणनीतिक हिसाब-किताब करेंगे तो पाएंगे कि भारत ने स्थायी महत्व का पर्याप्त लाभ हासिल किया है. उसने परमाणु अस्त्रों के प्रयोग की शर्तों को और कड़ा करने में सफलता हासिल की है. पाकिस्तान द्वारा पहले परमाणु हमले की कल्पना को ज़मींदोज़ किया जा चुका है. भारत को इससे खुश होना चाहिए और अपनी आगे की रणनीति और चालें इसी आधार पर तय करनी चाहिए.


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बेशक इसका मतलब यह नहीं है कि परमाणु अस्त्रों को लेकर पाकिस्तान पहले जिस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें करता था, वैसी बातें भारत भी करने लगे. परमाणु हथियार गंभीर मसले हैं. आप उनका कभी भी इस्तेमाल करने की सोच नहीं सकते, तमाम रणनीतियां इसी को ध्यान में रखकर बनती हैं. इसीलिए इन्हें अपने चुनावी अभियान की लफ्फाजियों में शामिल करने, अपने खुशनुमा त्योहारों को इनकी चपेट में लाने- नरेंद्र मोदी द्वारा दिवाली के या इससे पहले मुशर्रफ द्वारा शबे-बारात के जिक्र— के मतलब को समझना जरूरी है. परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों से कथनी और करनी, दोनों में जिम्मेदार होने की उम्मीद की जाती है.

ज़िम्मेदारी के एहसास और रणनीतिक परिपक्वता ने भारत का बहुत बढ़िया साथ दिया है, चाहे यह बालाकोट का मामला ही क्यों न हो. एक कामयाब फार्मूले से छेड़छाड़ करके और इसे चुनावी मुहिम के चक्कर में उलझाने की कोशिश करके मोदी ने भारी भूल की है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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