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इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की फाइल फोटो | गेटी इमेज
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मतदान का मौसम आते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर चर्चा गरमाने लगती है. अब हाल ही में 21 राजनैतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में यह मांग रखी थी कि इस मतदान के नतीजे घोषित करने से पहले 50 प्रतिशत ईवीएम का सत्यापन वीवीपीएट (मतदाता-सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रायल) पर्ची से कराया जाए. मुख्य न्यायालय ने इस मांग को ख़ारिज करते हुए चुनाव आयोग को हर विधानसभा क्षेत्र में एक की जगह पांच ईवीएम का वीवीपीएट पर्ची से सत्यापन करने का आदेश दे दिया. सुप्रीम कोर्ट की इस मध्यस्थता के बावजूद यह विवाद थमा नहीं है और 23 मई के नज़दीक आते ही यह फिर से तूल पकड़ लेगा. इसके अलावा मतदान के दूसरे चरण में उत्तरप्रदेश, असम, और तमिलनाडु के कुछ मतदान केंद्रों से ईवीएम में ख़राबी की शिकायतें भी सामने आई है. तो क्या ईवीएम सुरक्षित और भरोसेमंद है? और अगर हां तो राजनीतिक दलों के सतत असंतोष का कारण क्या है? इन्हीं सवालों पर एक विश्लेषण.

ईवीएम की आलोचना में दो विषय अक़्सर उलझ जाते है – एक तकनीकी खराबियां और दूसरा ईवीएम हैकिंग के द्वारा हेरा-फेरी. किसी भी मशीन की तरह ईवीएम में तकनीकी ख़राबी आना लाज़मी है. लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस तरह की खराबियां चुनावी परिणामों को ही तोड़-मरोड़ न दें, पर्याप्त प्रबंध किए जाते हैं. प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए ईवीएम के अतिरिक्त स्टॉक होते हैं और उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंटों की उपस्थिति में ट्रायल पोल के बाद ही नए ईवीएम का उपयोग किया जाता है. यदि परिणाम के दिन ईवीएम में खराबी सामने आती है, तो उन क्षेत्रों में पुन: चुनाव का आदेश दिया जाता है. तो ईवीएम का प्रयोग करके बड़े पैमाने पर मतदान की धोखाधड़ी संभव है, यह आशंका निराधार है. फिर भी मतदान के दौरान तकनीकी खराबियों के सामने आने से मतदाताओं का पूरी प्रक्रिया पर से विश्वास हिल सकता है. चुनाव आयोग को जल्द से जल्द इसका तोड़ ढूंढना चाहिए.


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रही बात किसी अफसर के साथ मिलीभगत के ज़रिए ईवीएम को हैक करने की. ध्यान रहे ईवीएम में कोई रिमोट कनेक्टिविटी (वाई-फाई/ब्लूटूथ इत्यादि) सुविधा ही नहीं है और इसका सॉफ्टवेयर भी रिप्रोग्रामेबल नहीं है, इसलिए ईवीएम में हेरफेर तभी संभव है जब किसी को लम्बे समय के लिए उसे खोलने और हार्डवेयर बदलने का मौका मिल जाए. ऐसा करने के लिए, एक हमलावर को तकनीकी और प्रशासनिक सुरक्षा की कई परतों को चकमा देना होगा. अगर कोई इस षडयंत्र को अंजाम दे भी देता है तो प्रत्येक उम्मीदवार के पोलिंग एजेंटों की उपस्थिति में आयोजित अनिवार्य ट्रायल पोल आसानी से पता लगा लेंगे कि ईवीएम में हेराफेरी हुई है और उस क्षेत्र में मतदान फिर से करा दिया जाएगा.

इन सब के ऊपर, वीवीपीएट पर्चियों से ईवीएम का सत्यापन भी किया जाता है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री क़ुरैशी ने लिखा है कि इसके तहत अब तक 1500 मशीनों का अलग-अलग मतदानों में सत्यापन हो चुका है और अभी तक पर्चियों की गिनती और ईवीएम की इलेक्ट्रॉनिक गिनती के मेल न होने की एक भी शिकायत सामने नहीं आई है. पर अब पार्टियां मांग कर रही है कि यह ऑडिट 50 प्रतिशत मतलब तकरीबन 5 लाख ईवीएम के साथ कराया जाए. इससे मतगणना प्रक्रिया को काफ़ी दिन लगेंगे और मिलीभगत के आरोप भी लगेंगे. कागज़ी मतपत्रों की प्रणाली को वापस लाने की मांग को बढ़ावा मिलेगा और हमारे मत आज की तुलना में और भी असुरक्षित हो जाएंगे. शायद लोग भूल गए हैं वह दिन जब बूथ-कैप्चरिंग और फ़र्ज़ी कागज़ी वोट एक आम बात होती थी और किस तरह ईवीएम ने इस पर अंकुश लगा दिया.

वैसे यह ऑडिटिंग भी राजनीतिक दलों के संदेह को दूर नहीं करेगी. वोटिंग प्रक्रिया में ख़ामियों का बहाना ईवीएम से कई दशकों पहले का पैंतरा है. जब नतीजे अपेक्षाकृत नहीं आए, तब भारत के हर प्रमुख राजनीतिक दल ने इस बहाने का प्रयोग किया है बजाय अपने गिरेबान में झांकने के. 1971 की एक हास्यास्पद घटना का वर्णन डॉ आलोक शुक्ला (पूर्व उप चुनाव आयुक्त) की किताब EVM — The True Story में किया गया है: लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी की कांग्रेस भारी अंतर से जीती. तो भारतीय जनसंघ के एक उम्मीदवार ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने मोहर के लिए एक चमत्कारी स्याही का प्रयोग किया था जो मतपत्र से गायब होकर कांग्रेस के उम्मीदवार के नाम के आगे प्रकट हो रही थी. यह आरोप सर्वोच्च न्यायालय ने पूरी जांच के बाद खारिज कर दिया था.

देखते-देखते ईवीएम के आने के बाद पार्टियां अपनी चुनावी हार के लिए इन मशीनों को ज़िम्मेदार ठहराने लगी. अगस्त 2009 में चुनाव आयोग ने उन सभी व्यक्तियों को आमंत्रित किया, जिन्होंने ईवीएम से छेड़छाड़ की शिकायत की. छेड़छाड़ के आरोपों को साबित करने के लिए पार्टियां या तो सामने ही नहीं आयी या फिर आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहींं. फिर भी, राजनीतिक दल चुनावी नुकसान के लिए ईवीएम को दोष देते रहते हैं और यह चलता रहेगा.


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दिलचस्प बात यह है कि कुछ यूरोपीय देशों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग पर प्रतिबंध लगने के बाद 2009 से ईवीएम के विरोध को भी व्यापक तूल मिला. वहां जिन तर्कों का प्रयोग हो रहा था वह भारत में भी इस्तेमाल किए जाने लगे जबकि मशीनों और चुनावी प्रक्रिया में ज़मीन-आसमान का अंतर था. उदाहरण के लिए, यूरोप में इंटरनेट से हैकिंग के कारण इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को चुनौती दी गई थी. दूसरी ओर, भारत के ईवीएम में कोई रिमोट कनेक्टिविटी का विकल्प ही नहीं है.

तो, अब समय आ गया है कि हम ईवीएम को कमज़ोर बनाने के प्रयास को त्याग कर यह सोचे कि पूरी मतदान प्रक्रिया को कैसे सदृढ़ बनाया जाए. आज भी मतदाता पंजीकरण में कई तकलीफ़ें आती हैं. वोटर कार्ड की धोखाधड़ी के किस्से आज भी सामने आ रहे हैं. चुनाव आचार संहिता की निरंतर अवहेलना हो रही है और फ़र्ज़ी प्रचार के माध्यम से मतदाताओं के दिमाग को ‘हैक’ करने का प्रयास हो रहा है. अच्छा होगा कि हम ईवीएम हैकिंग का राग अलापने की बजाय इन असली विषयों पर ध्यान केंद्रित करें.

(प्रणय कोटस्थाने, तक्षशिला संस्थान के फेलो है और हेमंत चांडक तक्षशिला संस्थान से पब्लिक पालिसी ग्रेजुएट हैं.)


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