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Monday, 19 January, 2026
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भारत को निशाना बनाना ‘अनुचित और बेवजह’ — रूसी तेल पर US और EU के प्रतिबंधों को लेकर जयशंकर ने कहा

जयशंकर ने पोलैंड के राडोस्लाव सिकोरस्की के साथ मीटिंग में यह साफ कर दिया कि भारत का मुद्दा सिर्फ अमेरिकी टैरिफ से नहीं था, बल्कि रूसी तेल की खरीद को कम करने के लिए EU द्वारा उठाए गए कदमों से भी था.

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नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को अमेरिका और यूरोपीय संघ को कड़ा संदेश दिया और भारत को “चुनिंदा तरीके से निशाना बनाए जाने” पर तीखी आपत्ति जताई. उन्होंने साफ किया कि नई दिल्ली की चिंताएं सिर्फ हालिया अमेरिकी टैरिफ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रूसी तेल की खरीद को लेकर पश्चिमी देशों के दबाव से भी जुड़ी हैं.

जयशंकर ने पोलैंड के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोर्स्की के साथ बातचीत के दौरान कहा, “हाल के समय में, पिछले साल सितंबर में न्यूयॉर्क और इस साल जनवरी में पेरिस में, मैंने यूक्रेन संघर्ष और उसके प्रभावों पर अपने विचार खुलकर साझा किए हैं. ऐसा करते हुए मैंने बार-बार यह भी रेखांकित किया है कि भारत को चुनिंदा रूप से निशाना बनाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि बेवजह भी है. मैं आज फिर यह बात दोहरा रहा हूं.”

जब सिकोर्स्की ने “टैरिफ के जरिए चुनिंदा निशाना बनाए जाने” के मुद्दे पर जयशंकर से “पूरी तरह सहमति” जताई. यह अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए शुल्कों की ओर इशारा था, जिसमें ग्रीनलैंड को लेकर 10 यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ शामिल हैं. इसके बाद जयशंकर ने एक दुर्लभ सार्वजनिक प्रतिक्रिया में बात को और आगे बढ़ाया.

उन्होंने स्पष्ट किया कि “चुनिंदा निशाना बनाना सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है” और भारत के खिलाफ ऐसे “अन्य रूप” भी रहे हैं. उन्होंने रूसी तेल व्यापार को लेकर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का जिक्र किया.

हाल के महीनों में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूसी तेल कंपनियों, जिनमें रोसनेफ्ट और लुकोइल शामिल हैं, पर प्रतिबंध लगाने पर जोर बढ़ाया है. इसके साथ ही मॉस्को के साथ व्यापार जारी रखने वाली कंपनियों, जिनमें भारतीय संस्थाएं भी शामिल हैं, पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए गए हैं.

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया. जी7 देशों. अमेरिका, जापान, कनाडा, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, फ्रांस और यूरोपीय संघ. ने ऊर्जा बिक्री से मॉस्को की आय सीमित करने के लिए मूल्य सीमा तय की. हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन ने कहा था कि यह मूल्य सीमा भारत की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, लेकिन वॉशिंगटन और ब्रसेल्स दोनों ही नई दिल्ली से अपनी खरीद सीमित करने का आग्रह करते रहे.

जब अमेरिका ने दबाव बढ़ाया, जिसमें पिछले साल अगस्त में भारत पर लगाए गए टैरिफ पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त दंड भी शामिल था, तो भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद धीमी हो गई. इसी दौरान अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच भारत का अमेरिकी कच्चे तेल का आयात लगभग 60 प्रतिशत बढ़ गया.

यह सब उस स्थिति में हुआ, जब नई दिल्ली बार-बार यह कहता रहा है कि वह वैश्विक बाजार से ऊर्जा अपनी जरूरतों के आधार पर खरीदता है.

सिकोर्स्की, जिनका देश यूक्रेन का सबसे मुखर समर्थक है, सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं, जिसमें इस महीने की शुरुआत में पेरिस में दिया गया बयान भी शामिल है, कि पोलैंड भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के कदमों से संतुष्ट है.

सितंबर 2025 में रूसी ड्रोन पोलैंड के हवाई क्षेत्र में घुस आए थे, जिसके बाद मॉस्को का युद्ध यूरोपीय संघ के क्षेत्र में फैलने की आशंका के बीच पोलैंड की वायुसेना को उन्हें मार गिराने के लिए तैनात किया गया.

सोमवार को जयशंकर ने सिकोर्स्की की अक्टूबर में इस्लामाबाद यात्रा पर भी निशाना साधा. उन्होंने वारसा से “आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता” दिखाने और “हमारे पड़ोस में आतंकी ढांचे को बढ़ावा देने में मदद न करने” की अपील की. विदेश मंत्री ने कहा कि वह सिकोर्स्की की हालिया क्षेत्रीय यात्राओं पर “चर्चा” की उम्मीद करते हैं.

सिकोर्स्की 23-24 अक्टूबर 2025 को दो दिवसीय यात्रा पर पाकिस्तान गए थे. उनके और पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया था कि इस्लामाबाद ने पोलिश मंत्री को “जम्मू और कश्मीर विवाद” पर जानकारी दी. बयान में दोनों पक्षों ने “संयुक्त राष्ट्र” के सिद्धांतों के आधार पर समाधान की बात कही थी.

भारत का रुख है कि उसकी क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा यह विवाद पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्तर पर ही चर्चा और प्रबंधन का विषय है, इसमें किसी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की कोई भूमिका नहीं है.

नई दिल्ली पहुंचने से पहले सिकोर्स्की ने जयपुर का दौरा किया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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