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Thursday, 5 March, 2026
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नेपाल: जेन ज़ी उम्मीदवार ताशी ल्हाजोम की मुहिम—हाशिये के आदिवासी समुदायों को संसद तक लाने की कोशिश

जलवायु कार्यकर्ता ताशी ल्हाजोम नेपाल चुनाव लड़ रही हैं ताकि दूरदराज़ इलाकों में ‘संरचनात्मक बदलाव’ हो सके. यह मिशन उनके निजी अनुभवों से पैदा हुआ है.

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काठमांडू: ताशी ल्हाजोम की राजनीति उनके निजी अनुभवों से पैदा हुई है. नेपाल-तिब्बत सीमा पर बसे दूरदराज़ हिमालयी गांव हालजी की 26-वर्षीय उम्मीदवार नेपाल की संसद के लिए चुनाव लड़ रही हैं. उनका मकसद हाशिये पर रहने वाले और अक्सर राज्य की नज़रों से दूर रह जाने वाले आदिवासी समुदायों की असल ज़िंदगी की चुनौतियों को सामने लाना है.

जलवायु कार्यकर्ता से नेता बनी ल्हाजोम ने दिप्रिंट से कहा, “2011 में हालजी में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड आया था.”

उन्होंने कहा, “तबाही तुरंत और बहुत गंभीर थी, लेकिन जो बात मेरे मन में सबसे ज्यादा रह गई, वह यह थी कि राहत दो साल तक नहीं पहुंची.”

ल्हाजोम के लिए यह देरी सिर्फ यह नहीं दिखाती थी कि पहाड़ी समुदाय जलवायु परिवर्तन के सामने कितने असुरक्षित हैं. उनके अनुसार इससे यह भी सामने आया कि दूरदराज़ हिमालयी इलाकों की संरचनात्मक रूप से अनदेखी होती है.

उन्होंने कहा, “हमारे समुदाय को लगभग पूरी तरह अपने दम पर ही हालात से निपटना पड़ा. समस्या सिर्फ पर्यावरणीय जोखिम की नहीं थी, बल्कि यह भी सच है कि दूरदराज़ समुदाय अक्सर राज्य की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली से हाशिये पर रह जाते हैं.”

2013 में, बाढ़ के सिर्फ दो साल बाद, उनके परिवार को भी एक व्यक्तिगत झटका लगा. पशुपालक होने के कारण उनके परिवार के कई याक एक हिमस्खलन में मारे गए, जो असामान्य समय और अप्रत्याशित जगह पर आया था.

उन्होंने कहा, “मेरी जलवायु आंदोलन में भागीदारी इन्हीं अनुभवों से शुरू हुई. मैंने लिमी में जो हो रहा था उसके बारे में बोलना शुरू किया, ताकि हमारे समुदाय की कमजोरियों पर ध्यान जाए. समय के साथ यह अभियान आदिवासी ज्ञान, ग्लेशियर के खतरे और ऊंचाई वाले जिलों की संरचनात्मक अनदेखी जैसे मुद्दों तक फैल गया. इसके केंद्र में हमेशा प्रतिनिधित्व का सवाल रहा है—ताकि दूरदराज़ समुदाय राष्ट्रीय और वैश्विक चर्चाओं से बाहर न रहें.”

हुमला में चुनाव प्रचार के दौरान ल्हाजोम | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
हुमला में चुनाव प्रचार के दौरान ल्हाजोम | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

ल्हाजोम अब 2026 के नेपाल चुनाव पहली बार उम्मीदवार के रूप में लड़ रही हैं, ताकि दूरदराज़ इलाकों में “संरचनात्मक बदलाव” लाया जा सके.

उन्होंने कहा, “जलवायु से जुड़े मुद्दों पर काम करते हुए मुझे लगातार यह महसूस हुआ कि सिर्फ नैतिक अपील या सबूतों के आधार पर बात करने से संरचनात्मक बदलाव नहीं आते. राजनीतिक ताकत के बिना अभियान अक्सर सिर्फ प्रतीकात्मक बनकर रह जाते हैं.”

उनके अनुसार चुनाव लड़ना उनके अभियान से अलग कदम नहीं है, बल्कि उसी का “तार्किक विस्तार” है. उन्होंने कहा, “अगर जलवायु जोखिम वाले जिले राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करना चाहते हैं, तो उनके प्रतिनिधियों का निर्णय लेने वाली संस्थाओं में होना ज़रूरी है.”

आधुनिक मानकों के हिसाब से हालजी आज भी बेहद दूरदराज़ इलाका है. सर्दियों में करीब छह महीने तक बर्फ से घिरा रहने वाला यह गांव लगभग कट जाता है और यहां मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है. जिला मुख्यालय सिमीकोट तक पहुंचने में पैदल पांच दिन लगते हैं और वहां से काठमांडू जाने के लिए महंगी उड़ान लेनी पड़ती है.

हुमला में चुनाव प्रचार भी अपनी चुनौतियां लेकर आता है. कई गांवों तक पहुंचने के लिए पहाड़ों के कठिन रास्तों पर कई दिनों तक पैदल चलना पड़ता है.

ताशी ने कहा, “सिर्फ ईंधन का खर्च ही 50,000 रुपये से ज्यादा हो चुका है, इसमें गाड़ी किराए और उसके रखरखाव का खर्च शामिल नहीं है.”

स्थापित राजनीतिक दलों की तरह मजबूत ज़मीनी नेटवर्क न होने के कारण ल्हाजोम का चुनाव अभियान काफी हद तक स्वयंसेवकों पर निर्भर है.

उन्होंने कहा, “हमारी रणनीति दिखावे की बजाय लोगों के बीच जाकर समय बिताने पर आधारित है. मैंने गांवों में लंबे समय तक रहकर, घरों में ठहरकर, खेतों में काम कर रहे मतदाताओं से मिलकर और परिवारों से सीधे बात करके प्रचार किया है.”

स्थापित पार्टियों की तरह मजबूत ज़मीनी नेटवर्क न होने के कारण ल्हाजोम का अभियान स्वयंसेवकों पर निर्भर है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
स्थापित पार्टियों की तरह मजबूत ज़मीनी नेटवर्क न होने के कारण ल्हाजोम का अभियान स्वयंसेवकों पर निर्भर है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

आदिवासी और नवाचारी

ल्हाजोम पहली बार 2019 में अपने पैतृक लिमी घाटी लौटीं, जहां उन्होंने क्षेत्र का पहला जमीनी स्तर का जलवायु और महिला सशक्तिकरण अभियान शुरू किया. इस अभियान का उद्देश्य स्थानीय लोगों की आवाज़ को सामने लाना और बदलाव के लिए प्रेरित करना था.

इसके बाद उन्होंने डॉक्यूमेंट्री “No Monastery, No Village” बनाई—यह लिमी क्ये भाषा में बनी पहली फिल्म है, जिसमें क्षेत्र के 1,000 साल पुराने मठ पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दिखाया गया. इसके बाद उन्होंने Born to Lead नाम का संगठन शुरू करने में भी को-फाउंडिंग की, जो लिमी के लोगों को एक अलग आदिवासी समुदाय के रूप में मान्यता दिलाने की मांग करता है.

उन्होंने पिछले साल सितंबर में हुए जेन ज़ी विरोध प्रदर्शनों में भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था, जिनमें हज़ारों युवा सड़कों पर उतरे थे और राजनीतिक नेताओं से जवाबदेही की मांग कर रहे थे.

ताशी ने कहा, “ये प्रदर्शन सिर्फ एक पीढ़ी से जुड़े नहीं थे; वे होना तय थे. यह वह पल था जब नागरिकों ने आखिरकार जमे हुए व्यवस्था को चुनौती देने के लिए सार्वजनिक जगह पर अपना हक जताया.”

उनके लिए ये प्रदर्शन निराशा से जिम्मेदारी की ओर बढ़ने का संकेत थे. उन्होंने कहा, “सिर्फ विरोध प्रदर्शन से सुधार लंबे समय तक नहीं चल सकता. इसके लिए संस्थागत व्यवस्था ज़रूरी है.”

ल्हाजोम चुनाव लड़ने वाली इकलौती जेन ज़ी महिला हैं और हुमला जिले में एकमात्र महिला उम्मीदवार भी हैं. हालांकि, औपचारिक राजनीति में आने के बाद उन्हें उन संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिनका सामना कई युवा उम्मीदवारों को करना पड़ता है.

ताशी ने कहा, “मेरी राजनीति में एंट्री विरोध प्रदर्शनों के जरिए हुई, पार्टी राजनीति के जरिए नहीं और यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है.”

उनके मुताबिक नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था अभी भी मजबूत पार्टी ढांचों के नियंत्रण में है, जो समाज की असमानताओं को भी दर्शाती है.

ल्हाजोम ने कहा, “महिलाओं और आदिवासी युवाओं के लिए, और खासकर हमारे जैसे लोगों के लिए जिनके पास न पैसा है और न ही पीढ़ियों से पार्टी से जुड़े रिश्ते, चुनाव का टिकट हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाता है.”

हुमला जैसे दूरदराज़ जिले में चुनाव प्रचार का खर्च इस चुनौती को और बढ़ा देता है.

ल्हाजोम ने कहा, “जब कोई अपने अभियान के लिए पैसा नहीं जुटा पाता, तो उसके अवसरों तक पहुंच बहुत सीमित हो जाती है.”

वह मानती हैं कि इस अनुभव ने नेपाल की चुनाव प्रणाली में अनुपातिक प्रतिनिधित्व की ज़रूरत को भी और स्पष्ट किया है.

ल्हाजोम चुनाव लड़ने वाली इकलौती जेन ज़ी महिला हैं और हुमला की एकमात्र महिला उम्मीदवार भी | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
ल्हाजोम चुनाव लड़ने वाली इकलौती जेन ज़ी महिला हैं और हुमला की एकमात्र महिला उम्मीदवार भी | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

भूराजनीति और उसका व्यक्तिगत असर

ल्हाजोम का एक राजनीतिक चेहरा बनना पूरी तरह विवादों से मुक्त नहीं रहा है. पिछले साल, जब उनका नाम कर्णाली प्रांत का प्रतिनिधित्व करते हुए संभावित मंत्री उम्मीदवार के रूप में सामने आया था, तब सोशल मीडिया पर उनकी नागरिकता और कथित “Free Tibet” आंदोलन से संबंधों को लेकर सवाल उठने लगे.

जेन ज़ी कर्णाली के सदस्यों ने एक बयान जारी कर सरकार से कहा कि किसी भी नियुक्ति पर विचार करने से पहले उनकी पृष्ठभूमि की जांच की जाए. बयान में चीन के साथ नेपाल के कूटनीतिक संबंधों का भी जिक्र किया गया, खासकर तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के नजदीक होने को लेकर, जहां तिब्बत से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियां बहुत संवेदनशील मानी जाती हैं.

कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी इन दावों को आगे बढ़ाया. राजतंत्र समर्थक राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी के प्रवक्ता ज्ञानेंद्र शाही ने आरोप लगाया कि काठमांडू में अमेरिकी दूतावास ने ल्हाजोम को चुनने के लिए लॉबिंग की थी. हालांकि, इस दावे की कोई पुष्टि नहीं हुई है.

भूराजनीतिक संवेदनशीलता 2025 में राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी के भीतर उनके चयन के दौरान भी सामने आई. बताया जाता है कि पार्टी ने पहले उन्हें अपने प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन (पीआर) महिला कोटा के तहत नामांकन देने की पेशकश की थी, लेकिन बाद में अंतिम सूची से उनका नाम हटा दिया.

इंस्टाग्राम पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देते हुए ल्हाजोम ने इन आरोपों को सख्ती से खारिज किया. उन्होंने लिखा, “मैं बार-बार साफ कर चुकी हूं कि मैं तिब्बती नहीं हूं. मेरा ‘Free Tibet’ आंदोलन से किसी भी तरह का संबंध नहीं है.”

उन्होंने आगे कहा, “मैं आरोप लगाने वालों को चुनौती देती हूं कि वे अपने सबूत सार्वजनिक करें.”

पार्टी ने इस फैसले के पीछे के कारणों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन यह घटना दिखाती है कि किस तरह भूराजनीतिक संवेदनशीलताएं नेपाल की घरेलू राजनीति से जुड़ सकती हैं.

हालांकि, ल्हाजोम के लिए यह अनुभव हतोत्साहित करने वाला नहीं बल्कि सीख देने वाला रहा.

ताशी ने कहा, “इससे मुझे समझने का मौका मिला कि पार्टी के ढांचे कैसे काम करते हैं और औपचारिक राजनीतिक संगठनों के भीतर प्रतिनिधित्व कैसे तय किया जाता है. मैंने इसे झटका मानने के बजाय अपने राजनीतिक रास्ते पर विचार करने के अवसर के रूप में देखा.”

उन्होंने आगे कहा, “मैं यह भी सोच रही हूं कि असहमति नेपाल के लोकतंत्र को कैसे आकार देती है. यह उल्लेखनीय है कि यहां अपने विश्वास के लिए लड़ने की जगह मौजूद है—चाहे वह बिना किसी नेता के चलने वाला जेन ज़ी आंदोलन हो या पार्टी ढांचे के भीतर एक व्यक्ति के रूप में. यह हमेशा आसान या सुरक्षित नहीं होता, लेकिन असहमति के लिए जगह होना नेपाल के बदलते लोकतंत्र का संकेत है.”

ल्हाजोम ने पिछले साल सितंबर में हुए जेन ज़ी विरोध प्रदर्शनों में भी सक्रिय भाग लिया था, जिनमें हजारों युवा राजनीतिक नेताओं से जवाबदेही की मांग करते हुए सड़कों पर उतरे थे | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
ल्हाजोम ने पिछले साल सितंबर में हुए जेन ज़ी विरोध प्रदर्शनों में भी सक्रिय भाग लिया था, जिनमें हजारों युवा राजनीतिक नेताओं से जवाबदेही की मांग करते हुए सड़कों पर उतरे थे | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

वह नेपाल जिसकी वे कल्पना करती हैं

जलवायु संकट, चुनावी असमानता और युवाओं की निराशा को करीब से देखने के बाद ल्हाजोम कहती हैं कि पीढ़ीगत बदलाव के साथ-साथ संस्थागत सुधार भी ज़रूरी हैं.

उन्होंने कहा, “इस अनुभव ने यह बात और मजबूत की है कि लोकतंत्र में भागीदारी को बढ़ाने के लिए संस्थागत ढांचा कितना महत्वपूर्ण होता है.”

उनका मानना है कि अंतर-जिला मतदान और विदेश से मतदान जैसी व्यवस्थाएं लागू की जाएं तो उन प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें कम हो सकती हैं, जिन्हें वोट देने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है.

ताशी ने कहा, “मैं जिस नेपाल के लिए काम कर रही हूं, वह ऐसा देश हो जहां हुमला का कोई नागरिक बुनियादी सेवाओं, इलाज, शिक्षा या सरकारी काम के लिए मजबूरी में पलायन न करे. वह ऐसा नेपाल हो जहां नागरिकों को अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए आवाज़ न उठानी पड़े, बल्कि राज्य खुद आगे बढ़कर दूर-दराज़ के समुदायों तक पहुंचे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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