नई दिल्ली: ईरान और इज़राइल ने बुधवार को पहली बार एक-दूसरे की ऊर्जा संरचना पर हमला किया और सीधे उन ठिकानों को निशाना बनाया जो जीवाश्म ईंधन उत्पादन से जुड़े हैं. इसे पश्चिम एशिया के संघर्ष में एक बड़ा और खतरनाक विस्तार माना जा रहा है.
अब तक अमेरिका और इज़राइल, दोनों ही खाड़ी क्षेत्र में ईरान के मुख्य ऊर्जा उत्पादन केंद्रों पर हमला करने से बचते रहे थे, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे ग्लोबल मार्किट में बड़ा असर पड़ सकता है. यहां तक कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने खार्ग द्वीप पर हमले का आदेश दिया था, जो ईरान के लगभग 90 प्रतिशत तेल निर्यात का केंद्र है, तब भी हमले सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित रहे थे.
यह सावधानी तब खत्म हुई जब इज़राइल ने साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया, जिसे ईरान कतर के साथ साझा करता है. यह दुनिया का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र है और ईरान तथा कतर दोनों के लिए बहुत अहम आर्थिक और ऊर्जा आधार है.
ट्रंप ने इस हमले से खुद को अलग दिखाने की कोशिश की और कहा कि अमेरिका को इस हमले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, “मध्य पूर्व में जो हुआ उससे नाराज़ होकर इज़राइल ने ईरान के एक बड़े ठिकाने साउथ पार्स गैस फील्ड पर हिंसक हमला किया.”
हालांकि, एपी के अनुसार इज़राइल ने इस ठिकाने पर हमला करने की अपनी योजना की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी.
यह समझना जरूरी है कि तेजी से बढ़ रहे पश्चिम एशियाई संघर्ष से बाहर भी साउथ पार्स फील्ड क्यों इतना महत्वपूर्ण है.
दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार
साउथ पार्स फील्ड, जिसे कतर की तरफ नॉर्थ डोम कहा जाता है, फारस की खाड़ी के नीचे स्थित है और इसे दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार माना जाता है.
ईरान और कतर के बीच साझा यह क्षेत्र आकार में लगभग एक छोटे देश जितना बड़ा है और इसमें दुनिया के ज्ञात गैस भंडार का बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है. कुछ अनुमान बताते हैं कि इसमें लगभग 1,800 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस है.
यह एक अकेला भंडार वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है.

कतर, जिसके पास इसका बड़ा और बेहतर विकसित हिस्सा है, ने अपनी अर्थव्यवस्था इसी क्षेत्र से निकाली जाने वाली लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी के उत्पादन और निर्यात पर खड़ी की है.
इसके अलावा यह क्षेत्र अभी भी काफी हद तक खाली नहीं हुआ है और इसमें लगभग 90 प्रतिशत गैस अभी निकाली जानी बाकी है.
हालिया तनाव से पहले यहां से हर दिन कई अरब क्यूबिक फीट गैस निकल रही थी, जो वैश्विक एलएनजी सप्लाई का बड़ा हिस्सा थी और कतर की सरकारी आय का भी बहुत बड़ा स्रोत थी.
यह गैस दुनिया भर में भेजी जाती है और यूरोप से एशिया तक, भारत सहित, घरों, उद्योगों और बिजली व्यवस्था को चलाने में इस्तेमाल होती है.
दूसरी ओर, ईरान अपने हिस्से को पूरी तरह विकसित नहीं कर पाया है. वर्षों से लगे प्रतिबंध, तकनीकी सीमाएं और निवेश की कमी इसकी वजह रहे हैं.
फिर भी साउथ पार्स ईरान की घरेलू ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ है. देश में बिजली उत्पादन और हीटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली बड़ी मात्रा में गैस यहीं से आती है. यहां रुकावट आने पर देश के भीतर जल्दी बिजली संकट पैदा हो सकता है.
इस क्षेत्र को खास बनाता है इसका साझा होना.
क्योंकि ईरान और कतर दोनों एक ही भूमिगत गैस भंडार से गैस निकाल रहे हैं, इसलिए एक तरफ की संरचना को नुकसान पहुंचने से गैस निकालने की कुल रफ्तार प्रभावित हो सकती है.
यह व्यवस्था सिर्फ गैस पर नहीं, बल्कि उन प्रोसेसिंग प्लांट, पाइपलाइन और निर्यात टर्मिनल के पूरे नेटवर्क पर निर्भर करती है जिन्हें बनाने में कई साल और अरबों डॉलर लगते हैं.
और अब यही संरचना हमले का निशाना बनी है. हालिया हमलों में ट्रांसपोर्ट या स्टोरेज स्थलों के बजाय उत्पादन और प्रोसेसिंग केंद्रों को निशाना बनाया गया, जो एक बड़ा बदलाव है और इससे संघर्ष और बढ़ सकता है.
पाइपलाइन के मुकाबले गैस प्रोसेसिंग प्लांट और लिक्विफिकेशन टर्मिनल बहुत विशेष ढांचे होते हैं और इन्हें बदलना आसान नहीं होता. सामान्य परिस्थितियों में भी इन्हें दोबारा तैयार करने में कई साल लग सकते हैं.
दुनिया भर असर
इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है. साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले के बाद ईरान ने चेतावनी दी कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर की बड़ी तेल और गैस संरचनाएं अब “सीधे और वैध निशाने” हैं और लोगों से वहां से निकलने को कहा.
कुछ ही घंटों में रियाद से तेज धमाकों की खबरें आने लगीं.
I strongly condemn attacking Iran’s energy infrastructure. Such aggressive acts will yield nothing for the Zionist–American enemy & their supporters. This will complicate the situation & could have uncontrollable consequences, the scope of which could engulf the entire world. https://t.co/FGtTZZjA6Y
— Masoud Pezeshkian (@drpezeshkian) March 18, 2026
कतर, जो अमेरिका का करीबी सहयोगी है और जहां क्षेत्र का सबसे बड़ा अमेरिकी एयरबेस है, उसने हमले के लिए इज़राइल को जिम्मेदार ठहराया लेकिन अमेरिका का नाम सीधे नहीं लिया.
कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस हमले को “खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना” विस्तार बताया, जो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को अस्थिर कर सकता है.
यूएई ने भी यही चिंता जताई और कहा कि यह हमला सिर्फ ऊर्जा सप्लाई ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता के लिए खतरा है.
कुछ घंटों बाद कतरएनर्जी की रस लाफान सुविधा पर हमला हुआ. इस साझा गैस क्षेत्र का कतर वाला हिस्सा रस लाफान इंडस्ट्रियल सिटी से जुड़ता है, जहां दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यात केंद्र है.
अगर इस क्षेत्र में लंबे समय तक रुकावट रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और कड़ी हो सकती है, कीमतें बढ़ सकती हैं और उन देशों के लिए ऊर्जा योजना मुश्किल हो सकती है जो आयातित गैस पर निर्भर हैं.
लंबे समय की चिंता संरचनात्मक है. अगर लड़ाई जल्दी भी रुक जाए, तब भी साझा गैस क्षेत्र के दोनों हिस्सों में हुए नुकसान के कारण कई साल तक उत्पादन सीमित रह सकता है.
ग्लोबल सप्लाई में इस क्षेत्र की बड़ी भूमिका को देखते हुए, इससे ऊर्जा बाजार बदल सकते हैं, दूसरे स्रोतों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा भू-राजनीतिक तनाव गहरा सकता है.
एनर्जी इंटेल के अनुसार रस लाफान वैश्विक एलएनजी सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा देता है और इसे बनाने में लगभग 70 अरब डॉलर लगे थे.
ईरान और कतर दोनों तरफ की अहम संरचना को नुकसान पहुंचने के कारण दुनिया के सबसे बड़े गैस संसाधन का बड़ा हिस्सा कई साल तक इस्तेमाल से बाहर रह सकता है, जिससे सप्लाई सीमित होगी और अहम ऊर्जा अनिश्चितता बढ़ेगी.
बाजार ने इसका असर तुरंत दिखाया. हमलों के बाद तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ीं, क्योंकि यह डर बढ़ गया कि संघर्ष खाड़ी क्षेत्र की दूसरी ऊर्जा संरचनाओं तक भी फैल सकता है.
यह इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्रों में से एक है और बड़ी शक्तियां लंबे समय से यहां की संरचना को ऐसी सीमा मानती रही हैं जिसे पार करने से बड़ा आर्थिक झटका लग सकता है.
ऊर्जा ने लंबे समय से तय किया है कि इस क्षेत्र के देश अपनी प्रतिस्पर्धा और सहयोग कैसे संभालते हैं.
2024 में सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव कम रहा, क्योंकि सऊदी अरब के वास्तविक शासक क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के लिए तनाव कम करना और संसाधनों को आर्थिक विविधीकरण की ओर ले जाना प्राथमिकता थी. उस समय ईरान पर अमेरिका के भारी प्रतिबंध भी लगे हुए थे.
कतर ने भी ऐतिहासिक रूप से ईरान के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं, क्योंकि साउथ पार्स में दोनों की साझी हिस्सेदारी है. द गार्जियन के अनुसार कई बार यह गैस क्षेत्र सिर्फ दोहा और तेहरान के बीच ही नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर भी कूटनीतिक पुल का काम करता रहा है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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