नई दिल्ली: भारत ने 2026-27 के यूनियन बजट में बांग्लादेश को दी जाने वाली विकास सहायता को आधा कर दिया है. इसे घटाकर 60 करोड़ रुपये कर दिया गया है. यह फैसला दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण कूटनीतिक संबंधों के बीच लिया गया है.
यह पड़ोसी देशों में सबसे बड़ी कटौती है. यह अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच करीब एक साल से चले आ रहे कूटनीतिक ठहराव को दिखाता है. वहीं अफगानिस्तान, श्रीलंका और नेपाल के लिए आवंटन में मामूली बढ़ोतरी की गई है.
हालांकि 2025-26 के यूनियन बजट में भारत ने बांग्लादेश के लिए 120 करोड़ रुपये रखे थे, लेकिन संशोधित अनुमान बताते हैं कि इसमें से केवल 34 करोड़ रुपये ही खर्च होने की संभावना थी. 2024-25 के बजट में भारत ने करीब 120 करोड़ रुपये का स्थिर आवंटन बनाए रखा था, जो सरकार से सरकार की सहायता को लेकर ज्यादा सतर्क रुख को दिखाता है.
इसके उलट भारत ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली सहायता में 50 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की है. यह कदम नई दिल्ली द्वारा काबुल में तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से तय करने का संकेत है. 2021 में संबंध तोड़ने के बाद भारत ने धीरे-धीरे कूटनीतिक संपर्क फिर से शुरू किए हैं.
अक्टूबर में तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने विदेश मंत्री एस जयशंकर से बातचीत के लिए नई दिल्ली का दौरा किया था. इसके बाद भारत ने काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला और अफगानिस्तान के वाणिज्य मंत्री की मेजबानी की. यह सतर्क जुड़ाव की नीति को दिखाता है.
श्रीलंका और नेपाल को दी जाने वाली सहायता में 100-100 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की गई है. श्रीलंका का आवंटन भी 100 करोड़ रुपये बढ़ा है. सहायता का फोकस बुनियादी ढांचे, क्षमता निर्माण और आर्थिक स्थिरता पर रहा है, जिससे भारत की एक अहम क्षेत्रीय साझेदार के रूप में भूमिका मजबूत होती है.
नेपाल को 800 करोड़ रुपये मिलेंगे और वह भारतीय सहायता पाने वाले सबसे बड़े देशों में बना रहेगा. भारत का सबसे बड़ा सहायता प्राप्त देश भूटान है, जिसे 2025 के 2,150 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2,288 करोड़ रुपये कर दिया गया है, यानी 138 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी.
भारत ने हाल ही में भूटान के लिए 4,000 करोड़ रुपये की लाइन ऑफ क्रेडिट शुरू की है, जो उसकी पहली है. इसका मकसद ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाना है. 2025 में पुनेत्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना, जिसे भारतीय अनुदान और ऋण के मिश्रण से संयुक्त रूप से विकसित किया गया था, पूरी तरह शुरू हो गई. इससे भूटान की बिजली उत्पादन क्षमता में करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. भारत ने लंबे समय से अटकी पुनेत्सांगछू-I परियोजना पर काम फिर से शुरू करने की योजना की भी पुष्टि की है.
नई दिल्ली ने भूटान के लिए दो रेलवे लाइनों के निर्माण की योजना भी घोषित की है. इनकी अनुमानित लागत 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है. इनमें पश्चिम बंगाल के बनारहाट से समत्से और असम के कोकराझार से गेलेफू को जोड़ने वाली लाइनें शामिल हैं. इन परियोजनाओं का मकसद आर्थिक एकीकरण को गहरा करना है.
मालदीव को दी जाने वाली सहायता 50 करोड़ रुपये घटाकर 500 करोड़ रुपये कर दी गई है. वहीं मॉरीशस के मामले में सहायता में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
म्यांमार के लिए आवंटन राजनीतिक अस्थिरता और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में दिक्कतों के बीच करीब 14 प्रतिशत घटाकर 300 करोड़ रुपये कर दिया गया है. अफ्रीकी देशों के लिए सहायता 225 करोड़ रुपये पर स्थिर रही है. लैटिन अमेरिका के लिए आवंटन दोगुना होकर 120 करोड़ रुपये हो गया है. यूरेशियाई देशों के लिए फंडिंग में हल्की गिरावट आई है और यह 38 करोड़ रुपये रह गई है.
सरकार ने ‘एड टू कंट्रीज’ के लिए 5,686 करोड़ रुपये रखे हैं. यह पिछले साल के अनुमान से थोड़ी बढ़ोतरी है, लेकिन 2025-26 के संशोधित आवंटन से अब भी करीब 100 करोड़ रुपये कम है.
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