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Friday, 6 March, 2026
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बदलाव या व्यवस्था: बालेन शाह और गगन थापा के साथ नेपाल की नई राजनीतिक लड़ाई

दोनों को नेपाल की उम्रदराज़ राजनीतिक नेतृत्व को चुनौती देने वाली नई पीढ़ी का प्रतिनिधि माना जाता है, लेकिन सत्ता तक पहुंचने के उनके रास्ते और शासन के उनके विचार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.

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काठमांडू: नेपाल ने शुक्रवार को राजनीतिक बदलाव की दो बिल्कुल अलग-अलग सोच के लिए वोट दिया. यह बदलाव उस जेन ज़ी विरोध प्रदर्शन के बाद आकार लेता दिख रहा है, जिसे यहां 2025 का फॉल अपराइजिंग कहा जाता है. एक तरफ हैं बागी बाहरी नेता और रैपर से मेयर बने बालेंद्र शाह, जो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. दूसरी तरफ हैं सुधारवादी स्थापित नेता गगन थापा, जो नेपाली कांग्रेस के नए अध्यक्ष हैं.

दोनों को नेपाल की नई पीढ़ी के ऐसे प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है जो देश के बुजुर्ग राजनीतिक नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन सत्ता तक पहुंचने के उनके रास्ते और शासन को लेकर उनके विचार बिल्कुल अलग हैं.

शाह के लिए राजनीति का मतलब व्यवस्था को झकझोरना रहा है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि उनके पास न कोई स्पष्ट विचारधारा है और न ही राजनीतिक धैर्य. वहीं थापा के लिए राजनीति व्यवस्था के भीतर रहकर सुधार करने की रही है, लेकिन कई विश्लेषक उन्हें ‘स्टेटस क्वोइस्ट’ यानी मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने वाला मानते हैं.

राजनीतिक कॉलम लेखक दीपक थापा ने अपने लेख ‘डॉन ऑफ ए न्यू एरा’ में लिखा, “मुझे इस बात को लेकर गंभीर शक है कि आरएसपी के नेतृत्व में देश किस दिशा में जाएगा. पार्टी के पास न कोई काम करने वाली विचारधारा है और न ही देश के सामने मौजूद कई मुद्दों पर कोई साफ और मजबूत रुख.”

थापा ने आगे कहा, “पार्टी के पक्ष में बस यही बात है कि वह कांग्रेस, यूएमएल या माओवादी नहीं है. इसके अलावा, बालेन फैक्टर अभी भी समझ से बाहर है, जबकि राजधानी के मेयर के रूप में उनका कार्यकाल आधा-अधूरा और कमज़ोर रहा है.”

गगन थापा के बारे में उन्होंने लिखा, “यह भी पूरी संभावना है कि थापा का दांव सफल न हो. नेपाली कांग्रेस (और यूएमएल, प्रचंड की पार्टी और कई अन्य पुरानी पार्टियां) को नए सिरे से बदलाव की ज़रूरत है और राजनीति में पांच साल बहुत जल्दी निकल जाते हैं. देश के हित में सिर्फ गगन थापा ही नहीं, बल्कि उनकी पार्टी को भी इसके लिए तैयार रहना होगा.”

बालेन, बाहरी नेता

नेपाल में बहुत कम नेता ऐसे रहे हैं जो बालेंद्र शाह की तरह इतनी जल्दी और इतने अप्रत्याशित तरीके से उभरे हों. जनता उन्हें बस बालेन के नाम से जानती है. उन्होंने पहले एक रैपर के रूप में पहचान बनाई, जिनके गानों में राजनीतिक आलोचना और युवाओं की नाराज़गी दोनों झलकती थी.

उनके गानों में भ्रष्टाचार, पुलिस की परेशानियां और पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों की नाकामी की आलोचना होती थी. इससे नेपाल के युवाओं के बीच उनका मजबूत समर्थन बन गया.

2022 में उन्होंने अपनी इस सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक ताकत में बदल दिया. एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए शाह ने काठमांडू मेयर चुनाव में 61,000 से ज्यादा वोट पाकर राजनीतिक व्यवस्था को चौंका दिया. उन्होंने नेपाली कांग्रेस और ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के उम्मीदवारों को हरा दिया.

उनकी जीत को नेपाल की जमी-जमाई राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ एक बगावत के रूप में देखा गया. पद संभालने के बाद शाह ने जल्दी ही अपनी काम करने की शैली दिखानी शुरू की, जिसे कई लोग नाटकीय, दिखाई देने वाली और टकराव वाली कहते हैं.

बुलडोज़र उनकी प्रशासनिक शैली का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया. सड़क किनारे के विक्रेताओं को हटाया गया और अवैध निर्माणों को तोड़ा गया.

माना जाता है कि उन्होंने संस्थागत सुधार की बजाय दिखावे वाली कार्रवाई को ज्यादा महत्व दिया. नेपाल के शहरी योजना विशेषज्ञ पिताम्बर शर्मा ने उनके कामकाज पर सवाल उठाए.

उन्होंने कहा, “काठमांडू आने वाला कोई व्यक्ति महसूस कर सकता है कि शहर ज्यादा साफ और व्यवस्थित दिख रहा है, लेकिन असली सवाल यह है कि यह शहर आखिर किसके लिए है?”

शाह के कार्यकाल ने बाहरी राजनीति की सीमाएं भी दिखाईं. काठमांडू में बजट खर्च करने की दर नेपाल के महानगरों में सबसे कम रही. उनकी सरकार का कई बार नौकरशाही से टकराव हुआ, जिसमें शहर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के साथ लंबा विवाद भी शामिल था.

सड़क विक्रेताओं ने नगर पुलिस पर हिंसक कार्रवाई के आरोप लगाए और कहा कि मेयर ने उन्हीं गरीब लोगों को छोड़ दिया, जिनकी आवाज़ वह अपने गानों में उठाते थे.

इन विवादों के बावजूद शाह की लोकप्रियता बनी हुई है. देशभर में उनकी चुनावी रैलियों में बड़ी भीड़ देखने को मिलती है. उनका आकर्षण नीतियों से ज्यादा इस बात में है कि लोग उन्हें पारंपरिक राजनीति से अलग विकल्प मानते हैं.

काठमांडू की सड़कों पर लोग कहते सुने जाते हैं—“अब की बार, बालेन सरकार”, जो भारत में 2014 में मोदी के लिए बीजेपी के नारे की याद दिलाता है.

राजनीतिक विश्लेषक दीपक थापा अपने लेख में इसे “बालेन फैक्टर” कहते हैं—ऐसा समर्थन जिसकी पूरी तरह व्याख्या करना मुश्किल है, खासकर जब उनका प्रशासनिक रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है.

अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि शाह की डिजिटल पहुंच बहुत बड़ी है, जो लोगों की उनके और आरएसपी के प्रति प्रतिक्रिया को प्रभावित करती है.

शाह के आसपास बना यह माहौल राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी के उभार में भी मदद कर रहा है, जिसने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताया है. लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या उनकी राजनीति का मॉडल—जो व्यक्तिगत छवि, सोशल मीडिया और टकराव वाली प्रशासनिक शैली पर आधारित है—राष्ट्रीय नेतृत्व में बदल सकता है.

पूर्व राजनयिक विजय कांत कर्णा कहते हैं कि नेपाल को चलाना आसान नहीं है और इसके लिए संस्थाओं और पड़ोसी देशों के साथ जटिल रिश्तों को संभालना पड़ता है.

उन्होंने एक लेख में कहा था, “देश का शीर्ष नेता होना सिर्फ दो देशों के बीच संतुलन बनाने का मामला नहीं है. यह राजनीतिक, प्रशासनिक और कूटनीतिक स्तर पर भरोसा बनाने का काम है.”

अब तक शाह ने इस तरह की संस्थागत भागीदारी में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई है. 2023 में उन्होंने भारत के अखंड भारत नक्शे के जवाब में अपने दफ्तर में ग्रेटर नेपाल का नक्शा लगा दिया था, जिससे विवाद भी हुआ.

सितंबर के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा रही 26 साल की तनुजा पांडे भी इससे सहमत हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “कभी-कभी लगता है कि उन्होंने पहले अराजकता पैदा की और अब उसी से राजनीतिक फायदा उठा रहे हैं. उनके आसपास बहुत मजबूत पब्लिक रिलेशन रणनीति है, जो लगभग हर कार्रवाई को सकारात्मक कहानी में बदल देती है.”

वे यह भी कहती हैं कि शाह की चुप्पी भी उनकी रणनीति का हिस्सा है.

पांडे ने कहा, “कई नेताओं की तरह वह बार-बार जनता से बात नहीं करते. वह बहुत कम बोलते हैं. यही चुप्पी उनकी राजनीतिक छवि का हिस्सा बन गई है—जैसे वह रोज़मर्रा की राजनीति से ऊपर हैं और सिर्फ काम पर ध्यान दे रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “अपने अभियान के दौरान उन्होंने पर्यावरण न्याय और आम लोगों के अधिकारों की बात की थी, लेकिन बाद में जब बस्तियां और सड़क विक्रेता बिना सही नोटिस या विकल्प दिए हटाए गए, तो लगा कि जिन लोगों की वह बात करते थे, उन्हीं के साथ विश्वासघात हुआ है. क्या आपने देखा है कि वह कैसे कपड़े पहनते हैं? वह राजा के पहनावे की तरह कपड़े पहनते हैं.”

अंदर से सुधार करने वाले नेता: गगन थापा

अगर शाह व्यवस्था को झकझोरने का प्रतीक हैं, तो गगन थापा व्यवस्था के भीतर सुधार का प्रतिनिधित्व करते हैं. नेपाली कांग्रेस के लंबे समय से नेता रहे थापा ने अपनी राजनीतिक पहचान छात्र राजनीति, संसदीय राजनीति और नीतिगत वकालत के जरिए बनाई है. पिछले दो दशकों में उन्होंने खुद को पार्टी के सबसे स्पष्ट बोलने वाले सुधारवादी नेताओं में से एक के रूप में स्थापित किया है.

शाह के विपरीत, थापा संस्थाओं को तोड़ने के बजाय उनमें सुधार करने और उन्हें बदलने की बात करते हैं. चुनाव अभियानों के दौरान थापा ने शाह की व्यवस्था-विरोधी बातों की तुलना में सुधार पर ज्यादा जोर दिया. इसी वजह से राजनीतिक टिप्पणीकार सीके लाल कहते हैं कि 2026 का चुनाव लगभग नाटकीय रूप ले चुका है.

सीके लाल ने द काठमांडू पोस्ट में अपने लेख में लिखा, “दो कहानियां इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. एक है बालेंद्र के आसपास बना मजबूत माहौल और दूसरी है गगन द्वारा पेश की जा रही जिम्मेदार नेता की सावधानी से बनाई गई छवि.”

जहां शाह अपनी तेज़ी और बाहरी नेता वाली छवि पर भरोसा करते हैं, वहीं थापा पार्टी संगठन और संस्थागत नेटवर्क पर निर्भर हैं. थापा ने खुद अपने सुधारवादी होने को लेकर उठे सवालों को ज्यादा महत्व नहीं दिया है. उनका कहना है कि आरएसपी जैसी नई पार्टियां भी उतनी ही जनभावनाओं को भड़काने वाली हैं और नफरत तथा विरोध की राजनीति से प्रेरित हैं.

उन्होंने द काठमांडू पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “लोकलुभावन राजनीति को हमेशा एक दुश्मन की ज़रूरत होती है.”

हालांकि, थापा के सामने भी कई चुनौतियां हैं. नेपाली कांग्रेस के भीतर गुटबाजी की समस्या है और बहुत से लोग पारंपरिक पार्टियों से थक चुके हैं. हर कोई इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि थापा अपनी पार्टी को नई ऊर्जा दे पाएंगे.

काठमांडू में राजनीतिक विज्ञान के व्याख्याता प्रकाश भंडारी ने कहा कि जेन-ज़ी विरोध प्रदर्शनों के बाद सावधानी से बनाई गई अपनी छवि के कारण थापा ने अपनी स्थिति मजबूत ज़रूर की है, लेकिन वह पार्टी में नई जान फूंक पाएंगे, इसकी संभावना कम है.

भंडारी ने द काठमांडू पोस्ट से कहा, “वह एक सक्षम प्रबंधक हैं, लेकिन कांग्रेस की पुरानी व्यवस्था में इतना लंबा समय बिताने के बाद हम उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह पार्टी को पूरी तरह नई दिशा दे देंगे.”

इसी तरह सीके लाल भी थापा को ‘स्टेटस क्वोइस्ट’ यानी मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने वाला बताते हैं.

लाल ने कहा, “लोग अब निराश हो चुके हैं. कांग्रेस पार्टी को यह समझने के लिए सिंह दरबार के जलने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए था कि उसे सुधार की ज़रूरत है. राजनीति में सचमुच नया बनने के लिए नया एजेंडा और नई विचारधारा चाहिए.”

वह पार्टी के सुधार प्रयासों की तुलना चलती बस में हैंडल पकड़कर लटकने वाले यात्री से करते हैं. उनका कहना है कि सिर्फ नेतृत्व बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती.

लाल कहते हैं, “थापा खुद को सुधारवादी नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन यह देखना बाकी है कि पार्टी सिर्फ ड्राइवर बदलेगी या सच में इंजन को भी नया बनाएगी.”

हालांकि, संपादक और लेखक कनक मणि दीक्षित इससे अलग राय रखते हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से बातचीत में कहा, “अगर मुझे इन नेताओं में से किसी एक को चुनना हो, तो मैं नेपाली कांग्रेस के गगन थापा का समर्थन करूंगा. मुझे लगता है कि उनके पास लोकतांत्रिक शासन की विरासत भी है और नेपाली समाज व अर्थव्यवस्था की गहरी समझ भी.”

उन्होंने आगे कहा, “तीनों बड़ी पार्टियों में से उनकी पार्टी ने आंतरिक सुधार भी किए हैं. सितंबर के विरोध प्रदर्शनों के बाद जब नए नेतृत्व की जरूरत थी, तब उन्होंने पुराने नेतृत्व को चुनौती दी और आगे आए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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