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Friday, 13 February, 2026
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बांग्लादेश में जनमत संग्रह को भारी समर्थन: जुलाई चार्टर को 72% वोट, अब संवैधानिक बदलाव की तैयारी

यह जनमत संग्रह आम चुनाव के साथ हुआ, जिसमें बीएनपी ने जीत हासिल की है. मतदाताओं से ‘इम्प्लीमेंटेशन ऑर्डर’ का समर्थन करने को कहा गया; जुलाई चार्टर के 84 में से 47 प्रस्तावों के लिए संविधान संशोधन ज़रूरी है.

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ढाका: बांग्लादेश में मतदाताओं ने जुलाई नेशनल चार्टर से जुड़े एक इम्प्लीमेंटेशन ऑर्डर को मंजूरी दे दी, जिसमें 72.9 प्रतिशत लोगों ने इसके पक्ष में वोट दिया. यह जनमत संग्रह आम चुनाव के साथ हुआ, जिसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जीत हासिल की.

लेकिन यह जनमत संग्रह सिर्फ हां या ना का साधारण वोट नहीं था. इसमें सीधे यह नहीं पूछा गया कि क्या मतदाता पूरे जुलाई नेशनल चार्टर को मंजूर करते हैं और न ही इसमें खास संविधान संशोधनों को मंजूरी के लिए रखा गया. इसके बजाय, उनसे एक “इम्प्लीमेंटेशन ऑर्डर” का समर्थन करने को कहा गया—यह एक कानूनी दस्तावेज़ है, जो बड़े स्तर पर संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू करेगा.

चार्टर की 84 सिफारिशों में से 47 के लिए संविधान में संशोधन ज़रूरी होगा, इसलिए वे जनमत संग्रह के दायरे में आती हैं. बाकी सुधार बिना संविधान बदले लागू किए जा सकते हैं.

बांग्लादेश के संविधान में अभी जनमत संग्रह कराने का कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए वोट की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए एक अलग अध्यादेश तैयार किया गया: मतदान कब शुरू और खत्म होगा, बैलेट पेपर कैसे संभाले जाएंगे, कौन प्रेसीडिंग ऑफिसर होगा और वोटों की गिनती कैसे होगी.

लेकिन इम्प्लीमेंटेशन ऑर्डर सिर्फ मतदान की प्रक्रिया नहीं बताता. यह उन कदमों को भी तय करता है जो जनमत सफल होने पर संसद को उठाने होंगे. यानी यह चार्टर के संवैधानिक सुधार लागू करने के लिए एक नई विधायी प्रक्रिया शुरू करता है.

कार्यवाहक सरकार की वापसी

पहला सुधार चुनाव के समय कार्यवाहक सरकार बनाने से जुड़ा है.

बांग्लादेश ने 1996 में एक संवैधानिक संशोधन के जरिए कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था शुरू की थी, ताकि राष्ट्रीय चुनाव के दौरान निष्पक्षता बनी रहे. कार्यवाहक सरकार के तहत हुए चुनावों को सत्तारूढ़ सरकार के तहत हुए चुनावों की तुलना में ज्यादा विश्वसनीय माना जाता था.

लेकिन हसीना सरकार ने इस प्रावधान को खत्म कर दिया और चुनाव सत्तारूढ़ सरकार के तहत कराए गए.

जुलाई चार्टर में कार्यवाहक सरकार के मुख्य सलाहकार के चयन के लिए एक विस्तृत और समयबद्ध प्रक्रिया सुझाई गई है. पांच सदस्यीय चयन समिति, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, स्पीकर, विपक्ष से एक डिप्टी स्पीकर और दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का एक प्रतिनिधि शामिल होगा, पंजीकृत राजनीतिक दलों और निर्दलीय विधायकों से नाम मांगेगी.

अगर सहमति नहीं बनती है, तो प्रक्रिया आगे के विकल्पों के ज़रिए आगे बढ़ेगी. इसमें प्रतिद्वंद्वी पार्टियों द्वारा एक-दूसरे के नामों का चयन और अंत में पैनल में दो वरिष्ठ जजों को शामिल करना भी शामिल है. अगर फिर भी समाधान नहीं निकलता, तो संविधान के 13वें संशोधन की बदली हुई प्रक्रिया लागू होगी, लेकिन एक बड़े अंतर के साथ: राष्ट्रपति को मुख्य सलाहकार बनने की अनुमति नहीं होगी.

द्विसदनीय संसद

दूसरा प्रावधान बांग्लादेश की एकसदनीय संसद को द्विसदनीय संसद में बदल देगा.

इस प्रस्ताव के तहत 100 सदस्यों वाला एक उच्च सदन बनाया जाएगा, जिसे संभवतः ‘सीनेट’ कहा जाएगा. यह सदन आम चुनाव में हर पार्टी को मिले वोट के अनुपात में बनेगा. पार्टियां पहले से संभावित सीनेटरों की क्रमबद्ध सूची देंगी; सीटें वोट प्रतिशत के आधार पर बांटी जाएंगी.

किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए इस उच्च सदन में बहुमत से मंजूरी जरूरी होगी.

जनमत संग्रह के पाठ में इस बदलाव को तय व्यवस्था के रूप में पेश किया गया है. हालांकि, यह अभी भी मतदाताओं की मंजूरी पर निर्भर है.

कार्यान्वयन और टकराव

तीसरा प्रावधान कहता है कि अगला संसदीय चुनाव जीतने वाली पार्टियां चार्टर में सहमत 30 सुधारों को “लागू करेंगी”.

इनमें शामिल हैं: संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना, उपाध्यक्ष और प्रमुख संसदीय समिति अध्यक्षों का चुनाव विपक्ष से करना, प्रधानमंत्री का कार्यकाल कुल मिलाकर 10 साल तक सीमित करना, कुछ नियुक्तियों में राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ाना, मौलिक अधिकारों को मजबूत करना और स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाना.

भाषा बाध्यकारी लगती है, लेकिन लागू करना मुश्किल हो सकता है.

उदाहरण के लिए चार्टर कहता है कि पार्टियां अगले चुनाव में कम से कम 5 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों को नामित करें और हर चुनाव में 5 प्रतिशत अंक बढ़ाते हुए इसे 33 प्रतिशत तक पहुंचाएं, लेकिन मौजूदा चुनाव चक्र में 2.5 प्रतिशत से भी कम उम्मीदवार महिलाएं हैं.

तीन पार्टियों—इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस और बांग्लादेश निजामी इस्लाम पार्टी, ने महिलाओं के प्रतिनिधित्व वाले प्रावधान पर औपचारिक आपत्ति जताई थी. कुछ अन्य पार्टियां सिद्धांत रूप में सहमत थीं, लेकिन वे भी 5 प्रतिशत की सीमा तक नहीं पहुंच सकीं.

इसी तरह, “मौलिक अधिकारों को मजबूत करने” की बात में यह साफ नहीं बताया गया है कि कौन से खास अधिकार जोड़े जाएंगे. पहले की चर्चाओं में इंटरनेट की पहुंच और मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार मानने, या एक औपचारिक अधिकार विधेयक बनाने जैसे प्रस्ताव थे. लेकिन ये खास बातें जनमत संग्रह के शब्दों में शामिल नहीं हैं.

फैसला कौन करेगा?

चौथा और आखिरी प्रावधान कहता है कि जुलाई चार्टर में बताए गए अन्य सुधार राजनीतिक पार्टियों की प्रतिबद्धताओं के अनुसार लागू किए जाएंगे.

तीसरे प्रावधान के उलट, यह हिस्सा मानता है कि सभी प्रस्तावों पर पूरी सहमति नहीं थी. यह पार्टियों को अपनी-अपनी आपत्तियां और अलग व्याख्या रखने की जगह देता है.

बीएनपी नेताओं ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी सिद्धांत रूप में जनमत संग्रह का समर्थन करती है, लेकिन सांसद चुने जाने के बाद वे तय करेंगे कि किन कदमों को पहले लागू करना है.

ध्यान देने वाली बात है कि जीतने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने कार्यवाहक सरकार की नियुक्ति प्रक्रिया के कुछ हिस्सों पर औपचारिक असहमति नोट जारी किया है. उसने सुझाव दिया है कि मुख्य सलाहकार के चयन के लिए संसद में बहुमत से वोट कराया जाए.

अब देखना होगा कि अगर सुधार लागू नहीं किए जाते हैं, तो उसके कानूनी परिणाम क्या होंगे, खासकर तब जब पहले वाला 180 दिन में अपने-आप लागू होने वाला प्रावधान हटा दिया गया है. यह प्रावधान संवैधानिक चुनौतियों से बचने और संसद की वैधता बनाए रखने की चिंता के कारण हटाया गया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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