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Thursday, 19 February, 2026
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पंजाब में घरों और खेतों के पास सीमेंट प्लांट की योजना पर SC की रोक, पर्यावरण पर कोर्ट ने क्या कहा

संगरूर में किसानों और वसंत वैली पब्लिक स्कूल ने 2 साल पहले कोर्ट में अर्जी दी थी, जिसमें कहा गया था कि सीमेंट कंपनी ने घरों और ज़मीनों के पास ‘सीमेंट से जुड़ी इंडस्ट्रियल यूनिट’ के लिए 48 एकड़ ज़मीन खरीदी थी.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पर्यावरण को एक बार नुकसान पहुंच जाए तो उसे कई बार वापस ठीक नहीं किया जा सकता. अदालत ने 93 साल के किसान हरबिंदर सिंह सेखों, अन्य किसानों और वसंत वैली पब्लिक स्कूल को राहत दी. ये लोग पंजाब के संगरूर में अपने खेतों और घरों के पास 47.82 एकड़ जमीन पर सीमेंट का औद्योगिक यूनिट लगाए जाने के खिलाफ लड़ रहे थे.

सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर, हवा की गुणवत्ता में गिरावट और लंबे समय के पर्यावरणीय नुकसान को संभावित परिणाम बताते हुए अदालत ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े नियम प्रतिक्रिया देने के लिए नहीं, बल्कि पहले से रोकथाम के लिए बनाए जाते हैं. अदालत ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीमेंट यूनिट लगाने के लिए जमीन के उपयोग में बदलाव को सही ठहराया गया था.

संगरूर और आसपास रहने वाले किसानों के एक समूह ने दो साल पहले अदालत का दरवाजा खटखटाया था. उन्होंने कहा था कि एक सीमेंट निर्माण कंपनी ने करीब 47.82 एकड़ जमीन खरीदी है ताकि वहां “सीमेंट से जुड़ा औद्योगिक यूनिट” लगाया जा सके, जो उनके घरों और खेतों के बहुत पास है.

इन किसानों ने वसंत वैली पब्लिक स्कूल के साथ मिलकर याचिका दायर की थी. स्कूल ने कहा था कि उसका परिसर प्रस्तावित स्थल के बिल्कुल पास है और ऐसी गतिविधि से छात्रों और स्टाफ की सेहत और सुरक्षा पर बुरा असर पड़ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने शुक्रवार को इन किसानों को राहत दी और विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि आर्थिक विकास और उद्योगों की बढ़ोतरी राज्य के जरूरी और सही लक्ष्य हैं, लेकिन “कानून के शासन पर आधारित संवैधानिक ढांचे में विकास कोई अमूर्त या पूर्ण लक्ष्य नहीं है. यह जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा के अनिवार्य दायित्व से बंधा हुआ है.”

अदालत ने कहा कि जो विकास इन मूल मूल्यों को कमजोर करता है, वह संवैधानिक रूप से स्वीकार्य विकास नहीं रह जाता. साथ ही यह भी कहा कि जब कोई विकास गतिविधि मानव स्वास्थ्य या पर्यावरण की सुरक्षा के लिए खतरा बनती है, तो नियमों को सुरक्षा की तरफ झुकना चाहिए.

बेंच ने यह भी कहा कि जब आम लोगों का जीवन और स्वास्थ्य स्पष्ट खतरे में हो, तो कोई “समझौता” नहीं हो सकता. संविधान के अनुच्छेद 14 और 21, जो समानता और जीवन के अधिकार से जुड़े हैं, “ऐसी नियामक गणना को स्वीकार नहीं करते जिसमें पर्यावरण सुरक्षा को मोलभाव की चीज माना जाए.”

अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि अगर इस मामले में किसानों द्वारा चुनौती दिए गए तरह के “नियमों को कमजोर करने” को स्वीकार कर लिया जाए, तो यह पर्यावरण प्रशासन में एक बुनियादी बदलाव होगा.

पिछली घटनाएं

यह मामला पहली बार दिसंबर 2021 में सामने आया था, जब पंजाब ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टमेंट प्रमोशन ने सीमेंट कंपनी के पक्ष में चेंज ऑफ लैंड यूज दिया था. चेंज ऑफ लैंड यूज का मतलब है कि सरकार की मंजूरी के बाद जमीन का उपयोग एक तय उद्देश्य, जैसे खेती, से बदलकर किसी दूसरे उद्देश्य, जैसे औद्योगिक उपयोग, के लिए कानूनी रूप से करना.

इसके बाद कंपनी को पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश के बाद नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट भी दे दिया गया. लेकिन किसानों ने इसका विरोध किया और कहा कि यह एनओसी पंजाब रीजनल एंड टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1995 के अनुसार नहीं दी गई.

किसानों का कहना था कि जहां सीमेंट यूनिट लगाई जा रही है, वह क्षेत्र संगरूर मास्टर प्लान के तहत ग्रामीण कृषि क्षेत्र में आता है और वहां “रेड कैटेगरी” की प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री की अनुमति नहीं दी जा सकती.

किसानों ने पहले पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट, चंडीगढ़ बेंच में याचिका दायर की थी. हाई कोर्ट ने फरवरी 2024 में उनकी याचिका खारिज कर दी और जमीन के बदले हुए उपयोग को सही ठहराते हुए सीमेंट कंपनी को राहत दी.

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पंजाब रीजनल एंड टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड ने जनवरी 2022 में जमीन के बदले हुए उपयोग को मंजूरी दे दी थी, जिसे अदालत ने मास्टर प्लान में संशोधन के रूप में माना.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने “यह मानकर आगे बढ़ा” कि संबंधित अधिकारियों ने सभी जरूरी पहलुओं पर विचार किया था और सीएलयू में खुद शर्तें और पाबंदियां दी गई थीं, जिन्हें तोड़े जाने पर प्रभावित पक्ष उचित कानूनी उपाय अपना सकते थे.

63 पन्नों के अपने फैसले में जस्टिस नाथ और जस्टिस मेहता ने कहा कि पीठ के सामने असली सवाल यह था कि जब संगरूर के मास्टर प्लान में उस जगह को “ग्रामीण कृषि क्षेत्र” के तहत रखा गया है, तो वहां सीमेंट फैक्ट्री के लिए सीएलयू कैसे दिया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि मास्टर प्लान सिर्फ कोई नीति दस्तावेज या आंतरिक प्रशासनिक गाइडलाइन नहीं है, बल्कि यह एक “वैधानिक दस्तावेज है जो तय करता है कि योजना क्षेत्र में जमीन का उपयोग और नियमन कैसे होगा.” ऐसे प्लान जमीन को अलग-अलग खास उद्देश्यों के लिए अलग-अलग जोन में बांटते हैं. कानून यह भी कहता है कि एक बार मास्टर प्लान तैयार हो जाए तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोग तय समय के अंदर अपनी आपत्तियां दे सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यह कोई औपचारिक प्रक्रिया भर नहीं है. यह एक वैधानिक सुरक्षा है जिसका उद्देश्य पारदर्शिता, लोगों की भागीदारी और सोच-समझकर फैसला लेना सुनिश्चित करना है, क्योंकि जोनिंग और जमीन के उपयोग के फैसलों का सीधा असर संपत्ति के अधिकार, स्थानीय बस्तियों, सार्वजनिक सुविधाओं और पर्यावरण व स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं पर पड़ता है.”

पंजाब रीजनल एंड टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1995 यह भी कहता है कि एक बार प्रकाशित होने के बाद मास्टर प्लान लागू हो जाता है और वह अधिकारियों और जनता दोनों पर बाध्यकारी होता है.

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून समीक्षा प्रक्रिया के जरिए अनौपचारिक तरीके से या एक-एक मामले के आधार पर जमीन के नियम बदलने की अनुमति नहीं देता.

अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि अगर पंजाब सरकार की इस कार्रवाई को मंजूरी दे दी जाती, तो यह सिर्फ इस मामले तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक मिसाल बन जाती और अलग-अलग क्षेत्रों में रोकथाम संबंधी सुरक्षा उपाय धीरे-धीरे कमजोर होते जाते, जिसके परिणाम स्थायी और अपरिवर्तनीय होते. अदालत ने कहा, “कानून पर्यावरण संरक्षण को धीरे-धीरे इतना कमजोर करने की अनुमति नहीं देता कि नुकसान होना तय हो जाए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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