Thursday, 20 January, 2022
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4 खेलों में 6 मेडल: भारत के Olympic Run ने हरियाणा में कुश्ती को कैसे बदल दिया

2008 के बाद से ही भारत ने ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में कुश्ती को अपने शीर्ष खेलों में से एक बना दिया है, और पिछले 13 साल की इस अवधि मे कुल मिलकर छह पदक इस खेल में जीते हैं जो इस अंतराल में किसी भी अन्य खेल में अधिक है.

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रोहतक/सोनीपत: हरियाणा के मोखरा गांव में दोपहर के 3:30 बज रहे हैं और अगस्त की गर्म, उमस भरी दोपहरी आम जनजीवन पर भारी पड़ रही है. सड़कें सुनसान सी नजर आ रही हैं, पर ऐसे हालात में भी पसीने में तरबतर कुछ युवक-युवतियां साइकिल से गांव के स्थानीय अखाड़े शंकर व्यायामशाला की ओर जा रहे हैं.

महिलाओं का अखाड़े में प्रवेश करना काफ़ी नई बात हैं. करीब पांच साल पहले तक यह अखाड़ा केवल पुरुषों के काम के था. यहां की महिलाओं ने अपनों मे से ही एक साक्षी मलिक के ओलंपिक चैंपियन बनने के बाद ही यहां ट्रेनिंग शुरू की थी.

2016 के रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक के जीते कांस्य ने कई सारे ग्रामीणों का जैसे हृदय परिवर्तन ही कर दिया और उन्होंने स्थानीय कोच 83 वर्षीय मारिया पहलवान से महिलाओं के लिए भी आखाड़े के द्वार खोलने का आग्रह किया.

मारिया ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमारे जमाने में, हमने लड़कियों को अखाड़े के पास फटकने की भी अनुमति नहीं दी थी. यहां तक कि अगर कोई गलती से भी अंदर आ जाता था, तो हम धूपबत्ती से मिट्टी के गड्ढे को साफ करते, उसकी पूजा करते. लेकिन कुश्ती के लिए उत्सुक इतनी सारी लड़कियों को देखकर मैंने हार मान ली और उन सभी को यहां प्रशिक्षण लेने दिया. अब समय बदल रहा है.’

हरियाणा के रोहतक में नोखरा गांव में शंकर व्यायामशाला के छात्र अपने कोच सतपाल (बीच में, बाईं ओर) और मारिया (बीच में, दाईं ओर) के साथ पोज़ देते हुए | फोटो: शुभांगी मिश्रा / दिप्रिंट

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लेकिन यह ‘बदलाव’ सिर्फ एक ओलंपिक चक्र के दौरान नहीं आया है. 2008 के बाद से ही भारत ने ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में कुश्ती को अपने शीर्ष खेलों में से एक बना दिया है और पिछले 13 साल की इस अवधि मे कुल मिलकर छह पदक इस खेल में जीते हैं जो इस अंतराल में किसी भी अन्य खेल में अधिक है.

साल 2008 में सुशील कुमार ने बीजिंग में पहला कांस्य पदक जीता था. इसके चार साल बाद उन्होंने लंदन 2012 में रजत पदक जीता. लेकिन वहां उन्हें कांस्य पदक जीतने वाले योगेश्वर दत्त का भी साथ मिला. इसके बाद रियो ओलंपिक मे साक्षी मलिक की धूम मची. पिछले महीने, पहलवानों ने भारत को टोक्यो 2020 मे मिले सात पदकों में से दो पदकों का योगदान दिया– रवि कुमार दहिया के लिए एक रजत और बजरंग पुनिया के लिए एक कांस्य.

वर्ल्ड चैंपियनशिप टूर्नामेंटों में भी काफ़ी सफलता मिली है. जहां सुशील कुमार एक मात्र भारतीय पहलवान हैं, जिन्होंने वहां स्वर्ण पदक जीता है, वहीं भारत ने 3 रजत और 9 कांस्य पदक भी जीते हैं. इन 13 में से ग्यारह पदक पिछले एक दशक में ही आए हैं.

इसी साल की शुरुआत में, मोखरा की 16 वर्षीय तनु मलिक ने हंगरी के बुडापेस्ट में आयोजित विश्व कैडेट चैंपियनशिप में 43 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था.

तनु ने दिप्रिंट को बताया. कि ‘जब मैंने अपने गांव में साक्षी का भव्य स्वागत देखा, तो मैंने वहीं तय कर लिया कि मुझे भी कुश्ती लड़नी है. मुझे यह जानकर निराशा हुई कि मैं (अखाड़े के अंदर महिलाओं के जाने की अनुमति से पहले) ऐसा नहीं कर सकती थी और साक्षी के पदक जीतने के बिना, मैं इसे करने में सक्षम हो भी नहीं पाती.’

लेकिन यह कहानी सिर्फ मोखरा की ही नहीं है. ओलंपिक कुश्ती में भारत की सफलता ने हरियाणा के अंदरूनी इलाकों में भी खेल और इसके लिए उपलब्ध बुनियादी ढांचे के दृष्टिकोण में एक आदर्श बदलाव लाया है, जो अब काफ़ी मजबूती के साथ भारतीय कुश्ती की राजधानी बन चुकी है.

सुशील कुमार का प्रभाव

रोहतक के मेहर सिंह अखाड़ा में भारतीय खेल प्राधिकरण के पूर्व कोच रणबीर ढाका का कहना है कि ओलंपिक में जीते गये पदकों ने उन सपनों को जो कभी अकल्पनीय माने जाते थे अब हकीकत बना दिया है.

ढाका कहते हैं, ‘ओलंपिक में सुशील और योगेश्वर पदक ने भारतीय कुश्ती की दुनिया को हमेशा लिए बदल दिया. उनकी जीत से पहले हमारे पहलवान किसी विदेशी देश के पर्यटकों की तरह ओलंपिक में जाते थे. क्या किसी ने सोचा था कि हम वास्तव में उज़बेकों और रूसियों को कुश्ती के मैट पर हरा सकते हैं? 2008 में, सुशील ने हमारे लिए एक जादुई द्वार खोल दिया. मैं सदा के लिए उनका आभारी हूं.’

सुशील कुमार का यह पदक केडी जाधव द्वारा 1952 के हेलसिंकी खेलों में कुश्ती में कांस्य पदक जीतने के 56 साल बाद आया था. बीजिंग में उनकी सफलता के कारण इस खेल का पुनरुत्थान हुआ और अखाड़ों में इस खेल के प्रति और अधिक उत्साही युवकों का दाखिला होना शुरू हो गया.

ढाका कहते हैं. ‘2008 से पहले मेरे यहां (मेहर सिंह अखाड़ा में) करीब 100 प्रशिक्षु थे. सुशील के पदकों के तुरंत बाद, मेरे अखाड़े में इतने सारे इच्छुक लड़के आए कि मुझे उनमें से कुछ के आवेदन अस्वीकार भी करने पड़े. अभी यहाँ 250 लड़के हैं.’

इस साल की शुरुआत में, दो बार के ओलंपिक चैंपियन सुशील कुमार को दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में पहलवान सागर धनखड़ की हत्या में उनकी कथित संलिप्तता के कारण गिरफ्तार का लिया गया था. उन्हें चार्जशीट भी किया गया है

हालांकि यह आम तौर पर माना जाता है कि इन आरोपों से हरियाणा के कुश्ती समुदाय की नजरों में उनकी छवि धूमिल होगी, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. यहां एक आम सहमति यह है कि सुशील पहलवान का योगदान और उनकी सफलताएं उनके द्वारा की गई एक ‘छोटी’ गलती से कही अधिक हैं.

2008 के बाद की कुश्ती की दुनिया

हरियाणा में अखाड़ा संस्कृति हमेशा से प्रचलित रही है, जहां हर गांव में कुश्ती के लिए एक गड्ढा/अखाड़ा होता है, और जो लोग इस खेल में आगे बढ़ाना चाहते हैं वे बड़े आवासीय कुश्ती स्कूलों में जाते हैं.

अब इस राज्य के ओलंपियनों ने उन सभी के लिए अखाड़ो की राह खोल दिए हैं जो इसे सीखना चाहते हैं.


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योगेश्वर दत्त ने सोनीपत के गोहाना में अपने पैतृक गांव के पास एक स्कूल खोला है, जबकि एक अन्य ओलंपियन अमित दहिया ने उसी जिले के खेवड़ा गांव के पास एक स्कूल खोला है.

महावीर फोगट स्पोर्ट्स अकादमी, पहलवान महावीर फोगट के नाम पर हैं, जिसे अभिनेता आमिर खान ने उनके बायोपिक दंगल में दिखाया था, और यह चरखी-दादरी जिले के बलाली गांव में विशेष रूप से महिलाओं के लिए एक लोकप्रिय कुश्ती का स्कूल है.

इन अखाड़ों की औसत मासिक फीस – 4,000-5,000 रुपये के बीच- नाममात्र ही है, लेकिन इसमें दूध, बादाम, घी आदि जैसी वस्तुओं सहित एक पहलवान के खाने के लिए आवश्यक भोजन की पूरी लागत शामिल नही होती है. अक्सर आशान्वित माता-पिता इन अखाड़ों में अपने बच्चों का खाना पहुंचाने के लिए 70-80 किमी तक की यात्रा करते हैं.

उत्तर प्रदेश के बड़ौत मे रहने वाली रेणु तोमर एक ऐसी ही अभिभावक हैं. लंदन ओलंपिक के दौरान टेलीविजन पर इस खेल से रु-ब-रु होने के बाद, उनके बेटे बादल ने 2012 में पहलवान बनने का फैसला किया.

रेणु कहती हैं, ’जब हमने सुना कि योगेश्वर जी जैसे ओलंपिक चैंपियन अपनी अकादमी खोल रहे हैं तो हम सोनीपत चले आए ताकि बादल अपने सपने को साकार कर सके. उसका एकमात्र लक्ष्य ओलंपिक पदक हासिल करना है और वह इसके लिए मेहनत कर रहा है. मुझे उस पर बहुत गर्व है.’

अपने इस सपने को पूरा करने के लिए बादल को अपनी औपचारिक शिक्षा छोड़नी पड़ी. लेकिन ओलिंपिक में भारतीयों की जीत ने उनके परिवार का आत्मविश्वास इस हद तक बढ़ा दिया कि उन्होने उसे यह कठिन चुनाव करने दिया

उसने दिप्रिंट से कहा, ’मेरे माता-पिता मेरे बड़े सहायक हैं. उनका मानना है कि अगर मैं एक ओलंपिक चैंपियन के तहत प्रशिक्षण लेता हूं, तो मैं भी भविष्य के ओलंपिक खेलों में टीम इंडिया के लिए पदक जीत सकता हूं. कुश्ती में भारत की लगातार सफलता के बिना उनमें इतना उत्साह नहीं होता.’

दत्त एक और अकादमी खोलने के प्रति आशान्वित हैं जो पूरी तरह से उनके स्वामित्व में होगा न कि पहले वाले की तरह जो फिलहाल लीज (पट्टे) पर है. गोहाना में 8 एकड़ में फैली हुई इस अकादमी में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए जगह होगी.

दत्त ने दिप्रिंट को बताया, ‘मैं बस उन सभी सुविधाओं के बारे में सोचता हूं जो मेरे लिए उपलब्ध नहीं थीं और मैं उन्हें अगली पीढ़ी को प्रदान करने के बारे में भी सोचता रहता हूं ताकि उन्हें उसी तरह से संघर्ष न करना पड़े. हरियाणा में कुश्ती की अपार संभावनाएं हैं. हमने इस साल जितने पदक जीते हैं, उससे दोगुना जीत सकते हैं.’

सोनीपत में अपनी कुश्ती अकादमी में अपने छात्रों के साथ ओलंपिक चैंपियन योगेश्वर दत्त | फोटो: शुभांगी मिश्रा / दिप्रिंट

अखाड़ों में बेहतर बुनियादी सुविधाएं

यह सांस्कृतिक बदलाव राज्य सरकार की नज़र मे भी आ चुका है जो निजी तौर पर चलने वाले अखाड़ों को भी सहायता कर रही है.

1992 के अंत-अंत तक भारत के पास कोई ओलंपिक मैट नहीं था, और हमारे पहलवान जूट के मैट पर प्रशिक्षण लेते थे, जिससे वे चोटों की चपेट में आ जाते थे.

पत्रकार रुद्रनील सेनगुप्ता ने अपनी किताब ‘एंटर द दंगल’ में लिखा है कि 1992 तक सरकारी कुश्ती स्कूलों में 10 से भी कम मैट उपलब्धथे, और ये सभी पतले जूट के मैट थे जिनकी ओलंपिक मैट से कोई समानता नही थी.

भारत में पहली ओलंपिक मैट 1999 में आई. 1998 विश्व कैडेट चैम्पियनशिप में सुशील कुमार की अंडर -18 जीत के एक साल बाद जहां उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था.

आज ओलिंपिक मैट किसी के लिए भी दूर का सपना नहीं है और ग्रामीण भारत के छोटे-छोटे अखाड़ों में भी ये अब उपलब्ध हैं.

इन ओलंपिक मैट को प्रायोजित करने से राजनेताओं को भी अपनी धाक बनाने में मदद मिलती है. सेनगुप्ता लिखते हैं, ‘हरियाणा में सभी राजने ताओं को लगभग अनिवार्य रूप से एक अखाड़े को प्रायोजित करना होता है और अगरवे अपने मतदाताओं पर प्रभाव बनाने चाहते हैं, उसे ओलंपिक मैट भी प्रदान करना होता है.’

2016 में दंगल फिल्म की सफलता के बाद, मनोहर लाल खट्टर सरकार ने राज्य के विभिन्न अखाड़ों को 100 कुश्ती मैट दान में दी थीं. लेकिन इनके रखरखाव की लागत भी काफ़ी अधिक होती है.

ढाका कहते हैं. ‘हमें हर छह महीने में मैट को कवर करने वाली शीट बदलनी पड़ती है. सिर्फ़ इसकी कीमत 70,000 रुपये से 80,000 रुपये के बीच होती है और हमें इसे अपने समय पर करना होता है. मैं सरकार से इस संबंध में हमारी सहायता करने का आग्रह करता हूं.’

उन्होंने सरकार से स्वयं आगे बढ़कर प्रतिभा की खोज करने का भी आग्रह किया ताकि राज्य और भी अधिक ओलंपिक चैम्पियनों को जन्म दे सके.

वे कहते हैं, ’हम ओलंपिक चैंपियन को तो पैसा देते रहते हैं. यह अच्छी बात है, लेकिन इससे कोई फायदा नहीं होता है. सरकार को सब-जूनियर स्तरों पर अच्छे खिलाड़ियों की पहचान करने और उन तक अच्छी डाइट पहुंचाने की वयवस्था को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से सहायता करने की आवश्यकता है. बहुत सारे एथलीट गरीब घरों से आते हैं और ठीक से खाना भी नहीं खा पा रहे हैं.’

ढाका सवाल करते हुए कहते हैं, ‘एक बार किसी के चैंपियन बनने के बाद केंद्र और राज्य दोनों जश्न मनाते हैं. लेकिन वे उस प्रतिभा के बारे में क्या कर रहे हैं जो अपनी पूरी क्षमता का एहसास कराने से पहले ही ख़त्म हो जा रही है?’

सरकार के प्रयास

हरियाणा के खेल और युवा विभाग के प्रमुख पंकज नैन का कहना है कि सरकार निजी अखाड़ों को भी समर्थन प्रदान करती है.

वे कहते हैं, ‘हम उन्हें सरकारी कोच की सुविधा प्रदान करते हैं और सभी बच्चों और कोचों के लिए आवश्यक उपकरण भी प्रदान करते हैं. यह सब कुछ एकदम से साफ नहीं है, सरकार पहले से उपलब्ध बुनियादी ढांचे का उपयोग करने और इसकी क्षमता बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही है.’

हरियाणा सरकार अपनी ओर से सोनीपत के नहरी गांव और झज्जर जिले के खुदान गांव में भी इनडोर स्टेडियम खोल रही है, जो क्रमश: रवि दहिया और बजरंग पुनिया के पैतृक गांव हैं.

पारंपरिक कुश्ती के लिए बने मिट्टी के पिट पर काम कर रहा एक छात्र। | फोटो: शुभांगी मिश्रा / दिप्रिंट

राज्य सरकार अखाड़ों को जमीनी स्तर पर सहायता प्रदान करने के लिए रोहतक में एक उत्कृष्टता केंद्र (सेंटर फॉर एक्सलेन्स) खोलने की भी योजना बना रही है ताकि वे अपने बच्चों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की कोचिंग सुविधा दे सकें.

सरकार 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नर्सरी (आवासीय खेल अकादमियों), जिन्हें कोविड की महामारी के कारण निलंबित कर दिया गया था, को भी फिर से खोलने का इरादा रखती है. नैन के अनुसार, हरियाणा में राज्य सरकार द्वारा पहले ही 1,000 स्पोर्ट्स नर्सरी को मंजूरी दी जा चुकी है.

उन्होने दिप्रिंट को बताया कि ‘वर्तमान में यहां 150 अकादमियां हैं जिन्हें जल्द ही बढ़ाया जाएगा. इन नर्सरियों में से प्रत्येक में हम 25 छात्रों को 2,000-2,500 रुपये का वजीफा देने की भी योजना बना रहे हैं, जो अभिभावकों को अपने बच्चों को यहां दाखिला दिलाने के लिए प्रोत्साहित करेगा.’

एथलेटिक्स में भारत के पहले ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा, जिन्होंने पिछले महीने ही टोक्यो ओलिंपिक खेलों में भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था, पंचकुला की एक ऐसी ही एक नर्सरी से निकले हैं.

दूसरी जगहों के हालात

वापस मोखरा की बात करे तों वहां तनु अगली विलक्षण प्रातिभा है. ग्रामीणों को पूरी उम्मीद है कि वह उन्हें ओलंपिक में पदक दिलाएंगी.

सेना में एक पूर्व सैनिक नवदीप मलिक, जो उसी अखाड़े में प्रशिक्षण लेते हैं, का कहना है, ‘मैं शुरू से ही उसे प्रशिक्षण लेते देख रहा हूं. वह एक दिन भी नहीं इससे नहीं चूकती. मुझे यकीन है कि वह भी साक्षी की तरह इस गांव को गौरवान्वित करेगी और ओलंपिक में पदक जीतेगी,’

मलिक की सफलता ने आसपास के गांवों का भी मन-मिजाज बदल दिया है. मदीना, गड्ड, बसाना और बडम्बा से शंकर व्यायामशाला के लिए अनेकों लड़कियां साइकिल चला कर आती हैं, क्योंकि अभी भी कुछ हीं स्थानीय अखाड़े महिला पहलवानों को अनुमति देते हैं.

मारिया पहलवान के लिए इसका एक मतलब यह भी रहा है कि उन्हें अपने कई पूर्वाग्रहों को दूर करना पड़ा है. वे दिप्रिंट को बताते हैं, ‘पहले मुझे लगता था कि कुश्ती में लड़कियां बिल्कुल भी स्वीकार नहीं की जाएंगी. लेकिन आज मुझे अपने छात्रों पर गर्व महसूस होता है. जब मैं उन्हें पूरी लगन से प्रशिक्षण लेते देखता हूं, तो मुझे बहुत खुशी होती है.’

लड़कियों को कुश्ती के मैदान में जाने देने पर सख़्त पाबंदी से लेकर दूसरे गांवों के महिला छात्रों का स्वागत करने तक, मोखरा ने वह सफ़र तय किया है जो ओलंपिक पदक की असली कीमत बताता है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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