Monday, 23 May, 2022
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क्यों BJP को झटका देते हुए उत्तराखंड के पूर्व CM त्रिवेंद्र सिंह रावत ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया

त्रिवेंद्र रावत ने भाजपा प्रमुख जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कहा है कि वह 'मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों’' में चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं, लेकिन पार्टी की सत्ता में वापसी की दिशा में काम करेंगे.

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देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा आगामी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के ऐलान से राज्य में बीजेपी को तगड़ा झटका लगा है. भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को लिखे एक पत्र में रावत ने कहा कि वह ‘मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों’ के तहत चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं, लेकिन पार्टी की सत्ता में वापसी की दिशा में काम करेंगे.

पार्टी 14 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव में डोईवाला निर्वाचन क्षेत्र से यहां के वर्तमान विधायक रहे रावत को चुनावी मैदान में उतारने के लिए पूरी तरह से तैयार थी.

नड्डा के नाम 18 जनवरी को लिखे गए अपने पत्र में रावत ने लिखा है, ‘पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है और प्रदेश को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के रूप में एक युवा नेतृत्व मिला है. बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में मुझे चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. मैंने पूर्व में भी चुनाव नहीं लड़ने के अपने इरादे के बारे में सूचित किया था.’

पत्र में आगे कहा गया है, ‘मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि अपना पूरा समय पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा पुनः सत्ता में लौटे के लिए देना चाहता हूं. मैं आपसे चुनाव नहीं लड़ने के मेरे अनुरोध पर विचार करने का आग्रह करता हूं.’

रावत के अनुसार, उन्होंने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष नड्डा से नई दिल्ली में मुलाकात की थी और खुद के चुनाव नहीं लड़ने को लेकर अपनी बात रखी थी. उनके अनुरोध को शाह और नड्डा ने स्वीकार कर लिया था, जिसके बाद उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को यह पत्र लिखा.

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दिप्रिंट से बात करते हुए, त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस बात की पुष्टि की कि पार्टी नेतृत्व उनकी इच्छाओं से अवगत था. पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने कहा, ‘चुनाव लड़ने के प्रति अनिच्छा का कारण क्या है यह मैंने पहले ही पत्र में उल्लेख कर दिया है. पार्टी नेतृत्व मेरी इस इच्छा से अवगत था, क्योंकि मैंने पहले भी राष्ट्रीय अध्यक्ष से बात की थी. जब मैंने 17 जनवरी को दिल्ली में हुई एक बैठक के दौरान मेरे इरादे को दोहराया तो पार्टी प्रमुख जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मेरे विचारों को स्वीकार कर लिया.’

रावत यह भी कहा कि वह पार्टी के लिए प्रचार करेंगे. उन्होंने कहा, ‘पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता में वापसी सुनिश्चित करने हेतु मैं पूरे दिल से संगठन के लिए काम करूंगा.’

हालांकि रावत ने इस बात से इनकार किया कि पार्टी नेतृत्व ने उनकी किसी भी मांग को मानने का वादा किया है. रावत ने कहा, ‘मैं वह व्यक्ति नहीं हूं जो पार्टी से तब तक कोई पद मांगेगा जब तक कि नेतृत्व खुद मुझे इसके लायक नहीं पाता. मेरे विधायक नहीं बनने के बावजूद मुझे बहुत काम करना है.’

भाजपा के सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि मार्च 2021 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के पद से हटाए जाने के बाद से ही रावत चुनाव लड़ने के प्रति इच्छुक नहीं थे. उन्होंने आगे बताया कि हालांकि अगर उन पर यह जिम्मेदारी थोपी जाती तो वह चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार थे.

उत्तराखंड भाजपा नेताओं ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि भाजपा द्वारा उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ नामित किये जाने की हालत में रावत डोईवाला – जो कि देहरादून और ऋषिकेश से सटा हुआ है – से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे.


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कभी पीएम मोदी और अमित शाह के करीबी रहे थे त्रिवेंद्र

जब भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज की थी, उस वक्त त्रिवेंद्र सिंह रावत इस राज्य में अमित शाह और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति थे.

शाह और मोदी से उनकी निकटता ने ही चुनावों के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनने में मदद की, लेकिन मार्च 2021 में उन्हें भाजपा नेतृत्व द्वारा पद छोड़ने के लिए कहा गया.

पिछले साल अगस्त में दिप्रिंट से बात करते हुए त्रिवेंद्र रावत ने कहा था कि लोकसभा सांसद तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री के रूप में नामांकित किये जाने से एक दिन पहले ही जेपी नड्डा ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा था. त्रिवेंद्र रावत ने तब कहा था कि उन्हें उनके पद से हटाने का कोई कारण नहीं बताया गया था.

चार महीने बाद, जुलाई 2021 में, तीरथ सिंह रावत को भी मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया और पुष्कर सिंह धामी को उनकी जगह लाया गया.

देहरादून में पार्टी के नेताओं का दावा है कि त्रिवेंद्र रावत को मुख्यमंत्री के पद से हटाए जाने का एक प्रमुख कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की राज्य इकाई द्वारा उनके खिलाफ लगातार विरोध करना था. यह इस तथ्य के बावजूद था कि वह स्वयं कभी एक आरएसएस प्रचारक थे.

इसके अलावा, इन नेताओं का कहना है कि, दिल्ली स्थित भाजपा नेतृत्व चार धाम तीर्थस्थलों के पुजारियों के दबाव में था, जिन्होंने गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के चार मंदिरों, और उनसे जुड़े अन्य सभी मंदिरों, को नियंत्रित करने हेतु एक चार धाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड स्थापित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा 2019 में लिए गए फैसले का कड़ा विरोध किया था.

विदित हो कि उत्तराखंड सरकार ने पिछले साल नवंबर में चार धाम देवस्थानम बोर्ड अधिनियम को वापस लेने की घोषणा की थी.


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