Wednesday, 29 June, 2022
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कांग्रेस और TMC के गोवा की क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन BJP से लड़ने के लिए काफी क्यों नहीं होंगे

कांग्रेस ने गोवा फॉरवर्ड पार्टी से हाथ मिलाया है, जो सिर्फ एक चुनाव पुरानी है. TMC ने MGP के साथ गठबंधन किया है, जिसने दशकों पहले गोवा पर राज किया था, लेकिन फिर उसने लगातार अपना गौरव खोया है.

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मुम्बई: इसी महीने, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने गोवा की दो क्षेत्रीय पार्टियों के साथ अपने गठबंधनों का ऐलान किया- क्रमश: गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी).

गठबंधनों के ऐलान तो बहुत धूमधाम के साथ हुए, लेकिन दोनों क्षेत्रीय संगठनों के चुनावी रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि चुनाव-पूर्व के ये गठबंधन, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को टक्कर देने के लिए नाकाफी साबित हो सकते हैं.

जीएफपी केवल एक चुनाव पुरानी है. 2017 में इसके पास तीन विधायक थे, और उनमें से एक जयेश सालगांवकर, 3 दिसंबर को बीजेपी में शामिल हो गए.

एमजीपी ने, जो कभी गोवा की सबसे ताक़तवर पार्टी हुआ करती थी, पिछले तीन दशकों में लगातार अपना गौरव गंवाया है. पिछले दो असेम्बली चुनावों में, एमजीपी केवल तीन-तीन सीटें जीत पाई है. कुल मिलाकर पार्टी 40-सदस्यीय सदन के, क़रीब छह चुनाव क्षेत्रों में मतों को प्रभावित कर सकती है.

टीएमसी ने गोवा में पहले भी चुनाव लड़े हैं, लेकिन राज्य में उसका कोई जनाधार नहीं है. कांग्रेस का एक समय वर्चस्व हुआ करता था, और 2017 चुनावों में 17 सीटों के साथ वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन अब उसके पास केवल तीन विधायक रह गए हैं, और उसके अधिकांश विधायक पार्टी बदलकर बीजेपी में चले गए हैं.

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जीएफपी एक चुनाव पुरानी है. 2017 में इसके तीन विधायक थे, जिनमें से एक जयेश सालगांवकर, 3 दिसंबर को बीजेपी में शामिल हो गए.

राजनीतिक टीकाकार क्लियोफेटो कूटीन्हो ने दिप्रिंट से कहा, ‘किसी भी गठबंधन में एक पार्टी दूसरी पार्टी को कुछ हस्तांतरित करती है, वरना वो गठबंधन नहीं होता है, वो फिर सिर्फ सीटों का समायोजन है. जीएफपी कांग्रेस में कुछ इज़ाफा नहीं करती. जीएफपी के पास एक या दो चुनाव क्षेत्र हैं, जहां उसके क्षत्रप जीत सकते हैं’.

कूटीन्हो ने आगे कहा, ‘टीएमसी और एमजीपी के बीच, एमजीपी की चार या पांच स्थानों पर मौजूदगी है, चूंकि उसके उम्मीदवार वहां बहुत लोकप्रिय हैं, इसका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है. टीएमसी के पास गोवा में कुछ नहीं है, लेकिन वो संसाधन ला सकती है और उसकी की वजह से ही, एमजीपी ने उससे हाथ मिलाया होगा’.


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एमजीपी के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन का ऐलान करते हुए, तृणमूल कांग्रेस सांसद और गोवा की पार्टी प्रभारी महुआ मोइत्रा ने पत्रकारों से कहा, ‘हमारा मानना है कि गोवा के जो लोग बीजेपी से छुटकारा पाने के लिए विकल्प तलाश रहे हैं, उन्हें कहीं और देखने की ज़रूरत नहीं है…एमजीपी और टीएमसी का ये गठबंधन टीएमसी की जुझारू भावना, और गोवा में एमजीपी के पुराने इतिहास का एक अदभुत मिश्रण है’.

एमजीपी की वास्तव में गोवा में गहरी जड़ें हैं. 1963 में पुर्तगाली शासन से राज्य के आजाद़ होने के बाद, इसने दयानंद बंडोदकर की अगुवाई में पहली सरकार बनाई थी. पार्टी 1979 तक सत्ता में बनी रही, जब सूबे की कमान कांग्रेस के हाथ में आ गई. उन शुरुआती सालों में, एमजीपी गोवा के महाराष्ट्र में विलय का समर्थन कर रही थी, लेकिन उनके विचार को इस छोटे तटीय राज्य में लोकप्रिय समर्थन नहीं मिला.

गोवा में एमजीपी की ताक़त 1990 के दशक में कम होनी शुरू हो गई, जब कांग्रेस को दूर रखने के लिए 1994 में उसने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया. एमजीपी का जनाधार हिंदुओं का ग़रीब तबक़ा था. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एमजीपी नेताओं को लगा था कि बीजेपी के साथ जुड़ने से उन्हें बढ़ावा मिलेगा, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी धीरे-धीरे करके क्षेत्रीय पार्टी का आधार खा गई, और राज्य में मज़बूत हो गई.

1994 के असेम्बली चुनावों में, एमजीपी ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें से 12 पर वो विजयी रही. बीजेपी ने भी एमजीपी के साथ गठबंधन में 12 सीटों पर चुनाव लड़ा, और चार पर जीत हासिल की.

2002 के चुनाव आते-आते, बीजेपी ने ख़ुद को राज्य में एक प्रमुख हिंदू पार्टी साबित कर दिया था, और एमजीपी पूरी तरह उसके साए में आ गई थी. बीजेपी के पास 17 विधायक थे और एमजीपी के पास केवल दो थे.

एमजीपी का प्रदर्शन 2007 में भी ऐसा ही था- वो सीर्फ दो सीटें जीत पाई, और इसके 19 उम्मीदवारों को अपनी ज़मानतें ज़ब्त करानी पड़ीं. 2012 में भी पार्टी केवल दो सीटें ही जीत पाई.

2017 के विधानसभा चुनावों में, एमजीपी ने 40 में से 25 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ तीन जीत पाई- मारकेम, सावरदेम तथा पेरनेम- और 17 सीटों पर अपनी ज़मानत गंवा बैठी. राज्य में इसका कुल वोट प्रतिशत 11.27 था, और उन सीटों पर 17.42 था, जहां इसने चुनाव लड़ा था.

उस समय एमजीपी ने सरकार बनाने के लिए बीजेपी का समर्थन किया था, जबकि सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाई थी.

लेकिन 2019 में, एमजीपी के तीन में से दो विधायकों- मनोहर अजगांवकर और दीपक पॉस्कर ने, एमजीपी की असेम्बली इकाई का बीजेपी के साथ विलय कर लिया, और सुदिन धवालिकर सदन में पार्टी के एकमात्र योद्धा रह गए. इससे नाराज़ होकर एमजीपी ने बीजेपी के साथ नाता तोड़ लिया.

2017 के चुनावों में, उन सीटों के अलावा जो इसने जीतीं, जिन चुनाव क्षेत्रों में इसने प्रतिस्पर्धी पार्टियों को कड़ी टक्कर दी, वो थे बिचोलिम, जहां वो सिर्फ 666 वोटों से बीजेपी से पराजित हुई, और शायद प्रियोल भी, जहां एमजीपी के दीपक धवालिकर 4,686 मतों से हारकर, निर्दलीय गोविंद गावड़े के बाद दूसरे स्थान पर रहे. गावड़े बीजेपी ख़ेमे में हैं और उसकी अगुवाई की सरकार का समर्थन कर रहे हैं.

डेबोलिम में भी, एमजीपी उम्मीदवार 2,494 मतों के अंतर से हारते हुए, बीजेपी के पीछे दूसरे स्थान पर रहा.

एमजीपी अध्यक्ष दीपक धवालिकर ने दिप्रिंट से कहा, ‘हम गोवा में बीजेपी सरकार को हराना चाहते हैं. 1990 के दशक में बीजेपी कुछ नहीं थी. पार्टी ने हमारी पीठ पर सवार होकर तरक़्क़ी की. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने हमारे नेताओं से दल-बदल कराकर, हमारे लिए बहुत परेशानियां पैदा की हैं. आज पैसा ही ताक़त है और हमारी पार्टी के पास वो ज़्यादा नहीं है. इसलिए टीएमसी जैसी किसी बड़ी पार्टी का सहारा लेना बहुत ज़रूरी हो जाता है.

उन्होंने आगे कहा, ‘टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी को शिकस्त दी, जिसके लिए बहुत ताक़त चाहिए. ऐसी पार्टी के साथ हाथ मिलाने से निश्चित रूप से मदद मिलेगी’.

इस बीच, राजनीतिक विरोधी दोनों पार्टियों की विचारधाराओं के बीच बुनियादी अंतर की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसमें एमजीपी एक हिंदू संगठन है, जिसने कभी तटीय राज्य में बिकनी पर बैन लगाने की मांग की थी, जबकि टीएमसी अपने आपको सेक्युलर और उदार कहती है.


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गोवा फॉरवर्ड पार्टी

जीएफपी केवल 2016 में वजूद में आई. इसका गठन पूर्व कांग्रेस नेता विजय सरदेसाई ने किया था, जिन्होंने 2017 के विधानसभा चुनावों में इसकी अगुवाई की थी.

पार्टी ने तीन सीटों पर जीत हासिल की- फतोरदा जहां से सरदेसाई ने चुनाव लड़ा, सियोलोम और सालिगाव. जीएफपी ने अपने छोटे से जीवनकाल में चक्कर दिलाने वाली ताक़त का स्वाद भी चखा, और उसके बाद वो धड़ाम से नीचे भी आई.

पार्टी को खड़ा करने वाले सरदेसाई ने 2012 में कांग्रेस को छोड़ दिया, और पहले फतोरदा से एक निर्दलीय के रूप में जीतकर विधायक बने. सदन में वो विपक्ष में बैठे, और बीजेपी के कड़े आलोचकों में से थे.

लेकिन, 2017 के चुनावों के बाद, सरदेसाई ने यू-टर्न ले लिया और बीजेपी से हाथ मिला लिया, और एमजीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने में उसकी सहायता की.

जीएफपी उस समय अचानक प्रसिद्धि पा गई, जब सीएम मनोहर पर्रिकर बीमार पड़े और इलाज के लिए देश के अंदर-बाहर रहे, और सरदेसाई राज्य के मामलात की प्रभारी, एक तीन-सदस्यीय कैबिनेट सलाहकार समिति का हिस्सा बन गए. पर्रिकर की मौत के बाद जब बीजेपी ने प्रमोद सावंत को मुख्यमंत्री नियुक्त किया, तो उसके बाद सरदेसाई डिप्टी सीएम बन गए.

लेकिन, जब संख्या बढ़ाकर बीजेपी अपनी ताक़त बढ़ाने में कामयाब हो गई, तो उसने उन्हें अनौपचारिक ढंग से हटा भी दिया, जिसके बाद सरदेसाई और अन्य दो जीएफपी विधायक वापस विपक्ष में आ गए.

पिछले सप्ताह, जीएफपी के सालियागो विधायक जयेश सालगांवकर में शामिल हो गए, जिसके बाद जीएफपी के पास केवल दो चुनाव क्षेत्र रह गए, जहां वो अपने कुछ प्रभाव की डींग हांक सकती है- फतोरदा और सियोलिम.

जीएफपी को पिछले महीने एक झटका और लगा, जब उसके कार्यकारी अध्यक्ष किरन कंडोलकर टीएमसी में शामिल हो गए. कंडोलकर तिविम चुनाव क्षेत्र में काफी मज़बूत हैं, जहां वो 2012 से 2017 तक विधायक थे. 2017 में वो 795 मतों के अंतर से अपनी सीट हार गए, और 2020 में बीजेपी छोड़कर जीएफपी में आ गए.

सरदेसाई ने दिप्रिंट से कहा, ‘गोवा में, राजनीति ये नहीं है कि आप अपने पदचिन्ह कैसे फैलाते हैं. असली बात ये होती है कि आप किसकी क़ीमत पर अपना पदचिन्ह बढ़ाते हैं’.

उन्होंने आगे कहा, ‘कांग्रेस के साथ हमारा एक साझा इरादा है, और वो है गोवा में बीजेपी को हराना. टीएमसी की मंशा सिर्फ ये है कि वो ख़ुद को राष्ट्रीय स्तर पर, कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है. हम 2022 में गोवा के लिए काम कर रहे हैं, टीएमसी 2024 में देश के लिए काम कर रही है’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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