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Sunday, 11 January, 2026
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उत्तर प्रदेश में SIR को लेकर बीजेपी क्यों है चिंतित

बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी कार्यकर्ताओं से कहा है कि जब तक यह प्रक्रिया चल रही है, वे हर मतदाता तक पहुंचें और लापरवाही न बरतें.

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) एक अप्रत्याशित मुद्दे को लेकर चिंतित है—चुनावी सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR). पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इसे अब तक एक सामान्य प्रक्रिया बताता रहा है.

सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस बात पर चिंता जताई है कि संशोधित मतदाता सूची में बीजेपी समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा बाहर हो सकता है. एक और चिंता यह है कि शहरी इलाकों, जिनमें एनसीआर भी शामिल है, उसमें पार्टी की पकड़ कमज़ोर हो सकती है. यहां कई लोग दूसरे राज्यों से हैं और वे अपने गृह नगर की मतदाता सूची में ही अपना नाम बनाए रखना चाहते हैं.

तीसरी बात, सूत्रों के मुताबिक, बूथ-स्तरीय एजेंट (बीएलए) नियुक्त करने की प्रक्रिया जो यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी रहे—विपक्ष को ज़मीनी स्तर पर बेहतर तरीके से संगठित होने में मदद कर रही है. कई सालों से बीजेपी की चुनावी मशीनरी को राज्यों में संगठन के मामले में सबसे मजबूत माना जाता रहा है.

SIR की शुरुआत इस साल की शुरुआत में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले हुई थी. बाद में चुनाव आयोग ने घोषणा की कि इस प्रक्रिया का दूसरा चरण 12 और राज्यों में किया जाएगा, जिनमें यूपी और दिल्ली भी शामिल हैं.

विपक्षी दलों ने SIR का जोरदार विरोध किया है. उनका आरोप है कि यह लाखों मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित कर चुनावों में हेरफेर करने की कोशिश है. वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का कहना है कि यह देशभर में मतदाता सूचियों को अपडेट करने की एक नियमित संवैधानिक प्रक्रिया है.

यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है, जहां SIR की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है.

देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में SIR की शुरुआत 4 नवंबर को हुई थी और इसे एक महीने में पूरा किया जाना था, लेकिन पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा के अनुरोध पर इसकी समय-सीमा बढ़ाकर 26 दिसंबर कर दी.

‘एक गंभीर मामला’

एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया कि रविवार को यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा के लिए हुए एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने पार्टी पदाधिकारियों को चेतावनी दी कि करीब चार करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं और इनमें से “85 से 90 प्रतिशत” “हमारे” हैं.

मुख्यमंत्री ने बीजेपी कार्यकर्ताओं से कहा कि जब तक यह प्रक्रिया चल रही है, वे हर मतदाता तक पहुंचें.

कार्यक्रम में आदित्यनाथ ने कहा, “यूपी की आबादी करीब 25 करोड़ है. इसमें से लगभग 65 प्रतिशत मतदाता होने चाहिए, जिनमें 18 साल के होने वाले लोग भी शामिल हैं. इस हिसाब से मतदाताओं की संख्या 16 करोड़ होनी चाहिए, लेकिन अब तक SIR की गिनती 12 करोड़ तक ही पहुंची है.”

मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने पुष्टि की कि आदित्यनाथ ने पार्टी कार्यकर्ताओं को लापरवाही से बचने की चेतावनी दी है और कहा है कि वे पूरी प्रक्रिया पर करीबी से नज़र रखे हुए हैं.

अधिकारी ने बताया कि दो हफ्ते पहले हुई एक बंद कमरे की बैठक में भी मुख्यमंत्री ने ऐसी ही चिंता जताई थी. आदित्यनाथ ने मंत्रियों और विधायकों से इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होने को कहा और शादियों जैसे कार्यक्रमों के लिए यात्रा से बचने को कहा.

अधिकारी ने कहा, “उन्होंने साफ कहा कि नेता इस मुद्दे को हल्के में ले रहे हैं, जबकि यह वास्तव में एक गंभीर मामला है.”

राज्य निर्वाचन आयोग के 10 दिसंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, यूपी की मौजूदा मतदाता सूची (दिनांक 27 अक्टूबर 2025) में 15.44 करोड़ मतदाता थे.

SIR के लिए बूथ-स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) ने 15.43 करोड़ मतदाताओं को गणना फॉर्म बांटे, जो कुल मतदाताओं का 99.9 प्रतिशत है. इनमें से 80.29 प्रतिशत फॉर्म बीएलओ ने वापस ले लिए, जिन पर मतदाता या परिवार के किसी सदस्य के हस्ताक्षर थे.

चुनाव आयोग ने बताया कि बाकी 19 प्रतिशत फॉर्म यानी 2.91 करोड़ “एकत्र नहीं किए जा सके.” संशोधित मतदाता सूची अभी प्रकाशित नहीं हुई है.

भाजपा के एक पदाधिकारी ने कहा कि लगभग पांचवां हिस्सा मतदाताओं का वोटर लिस्ट से हटना “बेहद गंभीर” मामला है.

उन्होंने कहा, “बीएलए से मिली हमारी आंतरिक रिपोर्ट बताती है कि इन मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा उच्च जातियों से है, जो हमारा मुख्य आधार हैं. अगर इनमें से आधे भी उच्च जाति के हुए, तो हम कम से कम 1.5 करोड़ मतदाता खो सकते हैं. समय-सीमा में बहुत कम दिन बचे हैं, इसलिए यह बड़ी चिंता है.”

मुख्यमंत्री के अनुमान और चुनाव आयोग की गणना में अंतर पर उन्होंने कहा, “चार करोड़ गायब मतदाताओं का मुख्यमंत्री का अनुमान भी सही है और लगभग तीन करोड़ का चुनाव आयोग का आंकड़ा भी सही है. फर्क सिर्फ इतना है कि मुख्यमंत्री ने संभवतः पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को भी इसमें शामिल किया है.”

शहरी मजबूत इलाकों में सेंध?

यूपी में बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारी आदित्यनाथ के आकलन से सहमत हैं और उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे अपनी कोशिशें तेज़ करें, ताकि मतदाता अपने हस्ताक्षर वाले गणना फॉर्म चुनाव आयोग को ज़रूर वापस करें.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “सबसे पहले, लखनऊ, आगरा, नोएडा और गाजियाबाद जैसे शहरी केंद्रों में हमें फीडबैक मिल रहा है कि कई मतदाता शहरों में रहने के बजाय अपने पैतृक गांवों में ही अपना वोटर आईडी बनाए रखना चाहते हैं. इसमें ज्यादातर वे लोग शामिल हैं जिनका नाम दो जगह दर्ज है. इनकी संख्या लाखों में हो सकती है और इससे शहरी इलाकों में नुकसान हो सकता है, जहां हमारी मजबूत पकड़ है.”

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य के ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में जीत हासिल की थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में, भले ही 2019 के मुकाबले यूपी में पार्टी की सीटें लगभग आधी रह गईं, लेकिन राज्य के प्रमुख शहरी इलाकों में बीजेपी ने जीत दर्ज की.

वरिष्ठ नेता ने गाजियाबाद के एक बीएलओ के अनुभव का ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, “बीएलओ ने मुझे बताया कि एक हाई-राइज सोसाइटी में ज्यादातर निवासी अपने वोट अपने पैतृक स्थानों पर ही रखना चाहते हैं. कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि वे अब गाजियाबाद में वोट नहीं देना चाहते. वे SIR के दौरान अपने नाम हटवाने के लिए तैयार हैं और अपने गांवों में फॉर्म 6 (वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए) जमा करने की योजना बना रहे हैं.”

बीजेपी नेता ने आगे कहा कि जहां पार्टी के वरिष्ठ नेता सरकारी कार्यक्रमों, निजी आयोजनों और पार्टी कार्यक्रमों में व्यस्त हैं, वहीं विपक्षी नेता पूरी तरह SIR पर ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने मुख्य वोटर आधार की चिंता है.

उन्होंने कहा, “हमारे नेताओं में वैसी तात्कालिकता नहीं दिख रही, जो अच्छा संकेत नहीं है.”

एक नींव

वरिष्ठ बीजेपी नेता के अनुसार, एक और चिंता यह है कि कुछ विपक्षी दल SIR को लेकर सतर्क रहते हुए अनजाने में अपनी संगठनात्मक क्षमता मजबूत कर रहे हैं.

नेता ने कहा, “विपक्षी दल, खासकर समाजवादी पार्टी, ने हमारे लगभग बराबर ही बीएलए (बूथ-स्तरीय एजेंट) नियुक्त कर लिए हैं, फर्क बहुत मामूली है. यह प्रक्रिया उन्हें बूथ स्तर पर कैडर तैयार करने में मदद कर रही है, जिसकी कमी उन्हें पहले थी.”

चुनाव आयोग के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं. यूपी में राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त किए गए 4.91 लाख बीएलए में से 1.59 लाख बीजेपी के हैं, इसके बाद समाजवादी पार्टी के 1.42 लाख हैं. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के 1.38 लाख बीएलए हैं, जबकि कांग्रेस के 49,121 हैं.

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने द प्रिंट को बताया कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया की निगरानी करना “कुछ हद तक परेशान करने वाला” रहा है, लेकिन इससे पार्टी को फायदा हुआ है.

सिंह ने कहा, “अब हमारे कार्यकर्ता हर बूथ पर हैं. पहले हमें रिपोर्ट मिलती थी कि SIR के दौरान अल्पसंख्यक इलाकों में समस्याएं आ सकती हैं. लेकिन बिहार में जिस तरह की अफरा-तफरी देखी गई, उसके बाद अब यूपी के लोग ज्यादा जागरूक हो गए हैं और इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं.”

बीजेपी भी अपनी तरफ से इन चिंताओं को दूर करने की कोशिश कर रही है.

पश्चिमी यूपी से बीजेपी नेता अवनीश त्यागी ने कहा, “हम निस्संदेह उत्तर प्रदेश की नंबर एक पार्टी हैं, लेकिन हमें SIR प्रक्रिया पर कहीं ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. मैं मुख्यमंत्री के बयान से सहमत हूं और उनकी चिंता जायज है. हमारे कार्यकर्ताओं को जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास में नहीं रहना चाहिए.”

बीजेपी सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक को 25-25 जिलों की विशेष जिम्मेदारी सौंपी है.

मौर्य और पाठक व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया की निगरानी करेंगे, ताकि अवैध प्रवासियों की पहचान की जा सके और उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा सकें.

इसके अलावा, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को पुलिस और जिला प्रशासन के साथ मिलकर घर-घर जाकर सत्यापन करने के निर्देश दिए हैं, जिनमें झुग्गी बस्तियां और अन्य इलाके भी शामिल हैं. सूत्र के मुताबिक, पिछले हफ्ते हुई एक बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा था, “जो लोग वैध दस्तावेज पेश नहीं कर पा रहे हैं, उनकी जानकारी तुरंत प्रशासन को दी जाए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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