नई दिल्ली: “क्या तुम इसी देश में पैदा हुए हो, बताओ. या फिर तुम बाप-बिना, मां-बिना, किसी के भी नहीं हो?”
“तुम्हारे शरीर में क्या अब भी गर्व से भरा लाल खून बहता है, या फिर सिर्फ सत्ता की ठंडी स्याही.”
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अध्यक्ष ममता बनर्जी अपनी कविता ‘हेट्रेड’ में ये सवाल उठाती हैं.
यह उन 26 कविताओं में से एक है, जिन्हें ममता ने लिखा है और जो एक किताब ‘SIR – 26 इन 26’ के रूप में प्रकाशित हुई हैं. इस किताब के जरिए बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपने रचनात्मक रूप में राज्य में चल रही वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया है.
मंगलवार को उन्होंने दिल्ली के बंगा भवन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस किताब की प्रतियां बांटीं. इस किताब में उनकी मूल रूप से बंगाली में लिखी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद शामिल है.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने लगातार दूसरे दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा हमला बोला. हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि उनके पास सिर्फ आम राजनीतिक बयानबाजी ही नहीं है.
ममता ने बताया कि उन्होंने ये 26 कविताएं तीन दिनों के भीतर, सफर के दौरान लिखीं. इन कविताओं में कथित अन्याय के खिलाफ गुस्से की एक कड़ी है, साथ ही सत्ता के अस्थायी होने की चेतावनी भी दी गई है.
मसलन, कविता ‘इंसिग्निफिकेंट’ में वह लिखती हैं. “रुको – वह दिन आ रहा है. जिस दिन तुम जिंदगी के कर्ज को समझोगे. और उस दिन तुम अकेले खड़े होगे. शासक हो या नहीं – तुम हिल जाओगे, तुम पर वार होगा, तुम गिर जाओगे.”
‘एक्सप्लेनेशन’ कविता में वह लिखती हैं, “क्योंकि अगर आसमान अब भी थामे हुए है, चांद, सूरज, ग्रह, तारे – तो एक दिन तुम सब कुछ खो दोगे. उस दिन तुम जानोगे—आखिरकार तुम जानोगे. जेल बनी रहेगी. लोहे की सलाखें बुला रही हैं. गुस्से का पारा चढ़ रहा है. आग का गोला आ रहा है, तेजी से आगे बढ़ता हुआ…”
इन कविताओं का एक और विषय ममता का खुद को दिल्ली की दबंग मौजूदगी से बंगाल की रक्षा करने वाली नेता के रूप में पेश करना है. यही रुख उनकी राजनीति की पहचान भी रहा है, जहां 2020 के राज्य चुनावों में टीएमसी ने बीजेपी के हिंदुत्व अभियान को कमजोर करने के लिए उप-राष्ट्रीयता का कार्ड खेला था.
‘ट्रिवियलिटी’ कविता में वह इसी अंदाज में चेतावनी देती हैं.
“ध्यान से सुनो, दिल्ली—बंगाल में न तो खामोशी होगी, न ही सन्नाटा,
वहां उठती है, वहां तैरती है लोगों की दहाड़, उनकी बेचैन गड़गड़ाहट.”
बंगाली गर्भवती महिला सुनाली खातून की पीड़ा भी कविता ‘विक्टिम ऑफ लैंग्वेज’ में जगह पाती है. सुनाली को अवैध प्रवासी बताकर बांग्लादेश भेज दिया गया था और बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वापस लाया गया.
“आज मैंने सुना—एक नवजात बच्चे ने आखिरकार बंगाल की रोशनी देखी, यानी अपने देश की.
लेकिन अगर यह कुछ दिन पहले हुआ होता. तो वे उसे विदेशी, बाहरी कह देते…”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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