नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ अपनी याचिका पर खुद बहस करना चर्चा का विषय बन गया. इसकी बड़ी वजह यह थी कि यह कदम बिल्कुल अलग और नया था और इसमें साफ राजनीतिक संदेश भी था.
हालांकि, ममता के पुराने राजनीतिक साथियों के लिए यह पूरी तरह चौंकाने वाला नहीं था, क्योंकि वे पहले भी उन्हें वकील की पोशाक पहनते देख चुके हैं. सालों में ममता एक साधारण पार्टी कार्यकर्ता से बंगाल में विपक्ष की नेता बनीं और फिर मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचीं. इस दौरान उन्होंने कई बार राजनीति और अदालत—दोनों को साथ जोड़ा.
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे, जो संविधान से जुड़े मामलों के वरिष्ठ वकील हैं, उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि ममता सीपीआई(एम) शासन के दौरान “राजनीतिक प्रताड़ना” झेल रहे लोगों के बचाव में बंगाल की कई जिला अदालतों में वकील के रूप में पेश हुई थीं.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार जयंत घोषाल के मुताबिक, एक मामले में ममता ने 41 गिरफ्तार लोगों को जमानत दिलवाई थी.
रे, जो 1970 के दशक से ममता के साथ काम कर रहे हैं—जब दोनों कांग्रेस में थे, उन्होंने बताया कि जिन जिला अदालतों में ममता ने वकील के तौर पर बहस की, उनमें अलीपुर, बालुरघाट और बंकशाल शामिल हैं.
10 जुलाई 1996 को प्रकाशित प्रमुख बंगाली अखबार संगबाद प्रतिदिन के पहले पन्ने पर कोलकाता के बंकशाल कोर्ट में वकील की पोशाक में ममता की तस्वीर छपी थी. ममता ने दिसंबर 1997 में कांग्रेस से इस्तीफा दिया और 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस बनाई.
आखिरी बार उन्होंने जून 2003 में काली पोशाक पहनी थी, जब कोलकाता नगर निगम के मेयर-इन-काउंसिल के सात सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद वह बंकशाल कोर्ट में पेश हुई थीं. हालांकि, उस मामले में उन्होंने आरोपियों की तरफ से दलील नहीं दी थी.
रे ने याद करते हुए कहा, “बार-बार उन्होंने हमारे पार्टी कार्यकर्ताओं का बचाव किया, जब लेफ्ट फ्रंट के शासन में राजनीतिक दुश्मनी के कारण उन्हें परेशान किया जाता था. मेरे जैसे व्यक्ति पर, जिसने कभी किसी को थप्पड़ तक नहीं मारा, 25 मामले थे; इससे आप उस समय के डर और दबाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं. उसी माहौल में उन्होंने ये केस लड़े.”
मुख्यमंत्री के चुनावी हलफनामों के अनुसार, ममता ने कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधुरी लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की है. हालांकि, बुधवार को वह सुप्रीम कोर्ट में वकील के तौर पर नहीं, बल्कि खुद याचिकाकर्ता (पिटीशनर-इन-पर्सन) के रूप में पेश हुईं.
रे ने इसे “ऐतिहासिक और अनोखा” बताया.
उन्होंने कहा, “यह पहली बार था जब वह शीर्ष अदालत में पेश हुईं. अदालत की अनुमति से उन्होंने जिस तरह अपनी दलीलें रखीं, वह भी खास था. उनकी प्रस्तुति किसी वरिष्ठ वकील जैसी थी—उन्होंने सीधे उन मुद्दों की ओर इशारा किया जिन्हें वह उठाना चाहती थीं. उनके पक्ष में यह भी जाता है कि उन्होंने यह राजनीतिक बात रिकॉर्ड पर रखी कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ बीजेपी के इशारे पर काम कर रहा है.”
घोषाल, जो ममता के जीवनीकार हैं और कुछ समय तक उनके सलाहकार भी रहे, उन्होंने कहा कि ममता अक्सर पुराने किस्से बताती हैं कि कैसे वह वकील के रूप में पार्टी कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए अदालत में पेश होती थीं.
उन्होंने कहा कि बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उनकी पेशी का राजनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है.
टीएमसी के राज्यसभा सांसद ने कहा, “पहली बात, उन्होंने सिर्फ राज्य में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक केंद्र मंच पर कब्जा कर लिया है. यहां तक कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व भी मान रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले वह राजनीतिक एजेंडा तय कर रही हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “बीजेपी अब उनकी सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी को आगे बढ़ाने के बजाय बचाव की स्थिति में आ गई है. ममता दिल्ली-विरोधी भावना का भी फायदा उठा रही हैं, जो ऐतिहासिक रूप से बंगाल की पहचान रही है.”
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