Monday, 27 June, 2022
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समाजवादी पार्टी को 2022 में ‘संजीवनी’ की उम्मीद थी लेकिन दोबारा ‘पानी फिर गया’

साल 2014 में, जब मोदी लहर ने लोकसभा चुनावों में भाजपा को भारी जीत दिलाई थी, सपा द्वारा जीती गई सीटें 23 से घटकर सिर्फ 5 पर रह गई थी .

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लखनऊ: ‘2022 हमारे लिए संजीवनी हो सकती थी’- समाजवादी पार्टी (सपा) के एक युवा नेता ने उत्तर प्रदेश में 2022  के विधानसभा चुनावों, जिसके परिणाम गुरुवार को घोषित किए गए, का कुछ इसी तरह से वर्णन किया.

एसपी ने 403 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में जिन सीटों पर चुनाव लड़ा था उसमें से उन्हें शाम 8:33 बजे तक 68 सीटें हासिल हुई. जहां पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने करहल में जीत हासिल की, वहीं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से सपा में गए स्वामी प्रसाद मौर्य को फाजिलनगर में हार का सामना करना पड़ा.

अखिलेश यादव के नेतृत्व में यह पार्टी की लगातार तीसरी चुनावी हार है. वे अपने पिता मुलायम सिंह यादव की राजनैतिक छाया से बाहर तो आ गए हैं लेकिन 2017 में बीजेपी द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से उन्होंने कभी भी चुनावी सफलता का स्वाद नहीं चखा है.

साल 2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन सिर्फ 47 सीटों पर कब्जा कर पाई जो 1992 में इसकी स्थापना के बाद से इसकी सबसे कम संख्या थी. 2019 का लोकसभा चुनाव, जिसमें सपा ने मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के साथ गठबंधन किया, भी उनके लिए मामूली नतीजे ही ला पाया और सपा के सीटों की संख्या 7 से घटाकर 5  रह गई.

साल 2014 में, जब मोदी लहर ने लोकसभा चुनावों में बीजेपी को भारी जीत दिलाई थी, एसपी द्वारा जीती गई सीटें 23 से घटकर सिर्फ 5 पर रह गई थी .

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हालांकि,  2014 के लोकसभा चुनावों में सपा का मत प्रतिशत 22.2 फीसदी था, 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में उसका वोटशेयर 28.32 फीसदी हो गया. 2019 में यह फिर से घटकर 18 प्रतिशत रह गया, जब उसने अपने तीन मजबूत गढ़ों – कन्नौज, बदायूं और फिरोजाबाद – को खो दिया.

इसी वजह से अखिलेश और सपा के लिए 2022 के चुनाव में जीत उसके उत्साह में जबरदस्त बुलंदी कर सकती थी.

48-वर्षीय अखिलेश ने इस विधानसभा चुनाव में एक उत्साही और जोरदार चुनाव अभियान का नेतृत्व किया जिससे उन्होंने इस चुनाव को बीजेपी-बनाम-एसपी के मुकाबले में बदल दिया. इसने गैर-यादव ओबीसी आधार वाली पार्टियों के साथ गठबंधन करके ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का एक नया फॉर्मूला आजमाया और योगी आदित्यनाथ सरकार के ‘ख़राब प्रदर्शन’ पर ध्यान केंद्रित किया. इसके लिए अखिलेश ने अपने चाचा शिवपाल यादव के साथ भी समझौता कर लिया.

हालांकि, पार्टी के कुछ अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनाव प्रचार में शामिल किया जाना पार्टी को महंगा पड़ा हो सकता है.


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एक बड़ी राजनीतिक ताकत बने रहेंगे अखिलेशलेकिन आगे है और भी कड़ा संघर्ष

हालांकि, अखिलेश यूपी में एक राजनैतिक ताकत बने हुए हैं, मगर पार्टी नेताओं का कहना है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद मिली हार का संकेत यह है कि उनके सामने एक बड़ा संघर्ष मौजूद हैं.

सपा के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट को बताया, ‘यह चुनाव बेहद अहम था. लगातार तीन चुनावों में हार का सामना करने के बाद, विपक्ष में और पांच साल बिताना पार्टी के साथ-साथ अखिलेश जी के लिए भी और बड़े संघर्ष का संकेत देते हैं. इस चुनाव ने पार्टी समर्थकों के जोश में नई जान डाल दी थी.’

जी.बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज के निदेशक और राजनीतिक विश्लेषक बद्री नारायण ने कहा कि अखिलेश यूपी में एक राजनीतिक ताकत बने रहेंगे लेकिन उन्होंने भविष्य में सपा प्रमुख के लिए अपने समर्थकों को एक साथ रखने में कठिनाई होने की संभावना से इंकार नहीं किया.

इस चुनाव में, सपा ने चार क्षेत्रीय दलों – रालोद, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), जनवादी सोशलिस्ट पार्टी (जसपा) और महान दल के साथ गठबंधन किया था. इसके अलावा, 13 विधायकों ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया था और सपा के पाले में चले गए थे. इनमें भाजपा सरकार के तीन मंत्री भी शामिल थे और उनमें से एक स्वामी प्रसाद मौर्य तो एक प्रमुख गैर-यादव ओबीसी चेहरा माने जाते थे.

नारायण ने कहा कि हालांकि अखिलेश ने गैर-यादव ओबीसी के बीच अपना-अपना वोट का आधार रखने वाले नेताओं के साथ मिलकर काम किया है, लेकिन निकट भविष्य में वह किस तरह से इस ‘जुटान’ को एक साथ रखने में सफल होंगें, यह देखा जाना अभी बाकी है.

उन्होंने कहा, ‘सपा का मुस्लिम-यादव वोट आधार तो अखिलेश की मदद करना जारी रखेगा, लेकिन, उन्हें अब अन्य जातियों में वोट आधार वाली पार्टियों को साथ रखना होगा. आने वाले कुछ दिनों में यूपी में फिर से किसी राजनीतिक मंथन से इंकार नहीं किया जा सकता है.‘

इस हार का यूपी में सपा के लिए भविष्य की संभावनाओं पर पड़ने वाला असर, 2024 के लिए संभावित गठबंधन

कई सपा नेताओं ने दिप्रिंट के साथ बातचीत में स्वीकार किया कि वे अपनी पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रचार अभियान किए जाने से नाखुश थे. उनका दावा था कि इससे उन्हें फायदे से ज्यादा नुकसान हुआ हो सकता था.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘चुनावी प्रचार में ममता के प्रवेश से पहले चुनावी नैरेटिव योगी बनाम अखिलेश था, मगर उनके प्रचार अभियान ने इसे ‘मोदी बनाम अखिलेश’ का रूप दे दिया. यह एक गलती थी और पार्टी को पहले से ही इसका एहसास हो रहा था क्योंकि वाराणसी में मोदी विरोधी अभियान काम नहीं करता है.’

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि सपा नेतृत्व को अब 2024 के लोकसभा चुनाव और इससे पहले किए जाने वाले गठबंधनों के लिए अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा.

राष्ट्रीय राजनीति में सपा की गतिविधियों की दिशा के बारे में पूछे जाने पर, सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी पहले यूपी की स्थिति पर गौर करेगी और फिर इस बारे में विचार करेगी कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में क्या किया जाना है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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