नई दिल्ली: 7 अप्रैल 2024 से अब तक पांच ऐसे मौके आए हैं जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से घुटनों के बल झुककर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूने की कोशिश की. यह इशारा आमतौर पर किसी राजनीतिक अधीनस्थ द्वारा अपने वरिष्ठ को खुश करने से जोड़ा जाता है.
हर बार मोदी, जो इस स्थिति में साफ तौर पर असहज दिखे, ने नीतीश को ऐसा करने से रोक दिया. नीतीश उनसे उम्र में पांच महीने और 12 दिन छोटे हैं.
इस सार्वजनिक सम्मान का यह सिलसिला गुरुवार को एक तरह से पूरा होता दिखा, जब नीतीश ने बिहार से होने वाले आगामी राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल किया. उस समय मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद थे.
सिर्फ तीन महीने पहले ही रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश, जिन्हें इस सदी की शुरुआत में बिहार को खराब प्रशासनिक हालात से बाहर निकालने का श्रेय दिया जाता है और पिछले एक दशक में उनके राजनीतिक उतार-चढ़ाव के लिए आलोचना भी हुई है, अब एक चौंकाने वाले राजनीतिक घटनाक्रम में मुख्यमंत्री पद छोड़ने जा रहे हैं.
कई मायनों में मोदी के पैर छूने की उनकी बार-बार की कोशिशें उन राजनीतिक घटनाओं की प्रस्तावना थीं जो अब पटना में सामने आई हैं. यह उस लंबे और असंभव लगने वाले सफर का अंत है, जो तीखी नापसंदगी से शुरू होकर खुली श्रद्धा तक पहुंचा.
कभी ऐसा समय था जब नीतीश को मोदी राजनीतिक रूप से इतने अस्वीकार्य लगते थे कि उन्होंने 2013 में बीजेपी के साथ 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया था.
जब बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव अभियान का प्रमुख मोदी को बनाया, जो उन्हें पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने जैसा था, तब नीतीश ने कहा था, “हम ऐसे व्यक्ति को स्वीकार नहीं कर सकते जो विभाजनकारी छवि वाला हो. इस व्यक्ति से कोई समझौता नहीं हो सकता, क्योंकि यह हमारी सामाजिक सद्भावना के लिए खतरा है.”
उस समय भारतीय राजनीति का झुकाव अभी पूरी तरह दक्षिणपंथ की ओर नहीं हुआ था, इसलिए मोदी के प्रति नीतीश की नाराजगी समझना मुश्किल नहीं था. खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित थे और जिनकी राजनीतिक दीक्षा जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान हुई थी.
1951 में पटना के पास बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश, जो स्वभाव से शांत और कम बोलने वाले माने जाते हैं, 1966 में पढ़ाई के लिए राज्य की राजधानी पटना आए और पटना साइंस कॉलेज में दाखिला लिया. बाद में उन्होंने 1973 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की.
राज्य सभा के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। pic.twitter.com/R9mDOHUfYr
— Nitish Kumar (@NitishKumar) March 5, 2026
राजनीति से उनका पहला परिचय पटना साइंस कॉलेज के दिनों में हुआ, जब उन्होंने राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के युवा संगठन समाजवादी युवजन सभा में शामिल हुए. बाद में वे बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय छात्र संघ (BAMSU) के अध्यक्ष भी बने.
पटना में उनके शुरुआती सालों के दौरान ही राज्य की राजनीति में छात्र नेता के रूप में लालू प्रसाद यादव का तेजी से उभार हो रहा था. लेकिन दोनों के व्यक्तित्व में बड़ा अंतर था. नीतीश सादगी और शालीनता के लिए जाने जाते थे, जबकि लालू की लोकप्रियता उनके खुले देहाती अंदाज पर टिकी थी.
नीतीश ने लालू के लिए चुनाव प्रचार भी किया, जब लालू पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने. उसी समय उन्होंने जेपी आंदोलन से भी अपना संबंध मजबूत किया. वे छात्र संघर्ष समिति के सदस्य बन गए थे, जो उस समय बिहार में चल रहे विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रही थी.
बिहार में केवल स्थिर
आपातकाल के दौरान उन्हें मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया.
शुरुआती राजनीतिक सक्रियता के बावजूद नीतीश का चुनावी सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने हरनौत विधानसभा सीट से लगातार दो चुनाव हारे. 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में और 1980 में उसके अलग हुए गुट लोक दल के उम्मीदवार के रूप में.

इन हारों ने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को कमजोर कर दिया और वे निराश हो गए. इससे उनकी पत्नी मंजू के साथ संबंधों में भी तनाव आ गया, जिनसे उन्होंने 1973 में शादी की थी.
एक समय उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि अगर तीसरी कोशिश में भी वे चुनाव नहीं जीत पाए, तो राजनीति छोड़ देंगे. मंजू ने उनका साथ दिया और उनके चुनाव अभियान के लिए 22,000 रुपये भी दिए.
1985 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने जनता के बड़े नेताओं चंद्रशेखर और देवी लाल के समर्थन से संगठित अभियान चलाया और लोक दल के उम्मीदवार के रूप में हरनौत सीट 22,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत ली.
चार साल बाद 1989 में वे जनता दल के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए और 1991 में फिर से जीते. उस समय देश की राजनीति में बड़ा बदलाव हो रहा था, जिसमें कांग्रेस का प्रभाव घट रहा था और क्षेत्रीय पार्टियां उभर रही थीं. इनमें से कई जनता परिवार से निकली थीं, जिसने नीतीश और लालू जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया.
1990 में जब केंद्र में वी.पी. सिंह सरकार में वे राज्य मंत्री थे, तब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लालू को आगे बढ़ाने में नीतीश ने अहम भूमिका निभाई.
अगले डेढ़ दशक तक यह फैसला उनके लिए सबसे बड़ी राजनीतिक गलती साबित हुआ. लालू ने मंडल राजनीति की लहर पर सवार होकर राज्य की राजनीति पर मजबूत पकड़ बना ली और नीतीश जैसे नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया.
पत्रकार संकार्षण ठाकुर ने अपनी किताब The Brothers Bihari में लिखा है, “1992 तक नीतीश और लालू के बीच बातचीत बंद हो गई थी.” यह किताब दोनों नेताओं की जिंदगी पर आधारित है, जिनकी दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता ने लगभग चार दशकों तक बिहार की राजनीति को प्रभावित किया. इस लंबे राजनीतिक सफर पर गुरुवार को नीतीश ने जैसे पर्दा डाल दिया.
पत्रकार श्रीकांत की किताब Bihar: The Politics of Letters में दर्ज एक पत्र में नीतीश ने लालू से लिखा था, “जब हमने आपको चुनने में मदद की थी, तब हमें लगा था कि आप कांग्रेस शासन के भ्रष्टाचार और खराब प्रशासन को खत्म करेंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और आप सिर्फ सत्ता में बने रहने और अपने करीबी लोगों को खुश करने में ही रुचि रखते दिखते हैं.”
1994 में नीतीश ने लालू से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी बनाई. बाद में इस पार्टी का बड़ा हिस्सा 2003 में जनता दल (यूनाइटेड) में मिल गया, जिसका नेतृत्व आज भी नीतीश करते हैं.

उन्होंने पहले यूनाइटेड फ्रंट और बाद में बीजेपी के साथ गठबंधन किया और 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में सफलता हासिल की.
लेकिन 1990 के दशक में राष्ट्रीय राजनीति में सफलता मिलने के बावजूद बिहार में सत्ता उनसे दूर ही रही. लालू को कई झटके लगे, जिसमें चारा घोटाले में जेल जाना भी शामिल था, जिसके कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद अपनी पत्नी राबड़ी देवी को देना पड़ा. फिर भी उनका यादव-मुस्लिम समर्थन आधार मजबूत बना रहा.
2000 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को सत्तारूढ़ आरजेडी से दो सीटें ज्यादा मिलीं. केंद्र की एनडीए सरकार ने राज्यपाल के माध्यम से 3 मार्च 2000 को नीतीश को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई.
लेकिन उनकी सरकार सिर्फ एक हफ्ते ही चल सकी और विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए जरूरी संख्या न जुटा पाने के कारण गिर गई. उसी साल बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना. यह ऐसा फैसला था जिसे लालू शायद कभी मंजूरी नहीं देते, अगर उन्हें कांग्रेस के समर्थन की जरूरत न होती.
संकार्षण ठाकुर ने अपनी किताब में लिखा है कि इस फैसले से नीतीश को अनजाने में राजनीतिक फायदा मिला. पहले संयुक्त बिहार में 324 सदस्यीय विधानसभा थी और 54 लोकसभा सीटें थीं. विभाजन के बाद विधानसभा 243 सदस्यों की रह गई और लोकसभा सीटें 40 हो गईं.
ठाकुर ने लिखा, “पुरानी व्यवस्था में बीजेपी बिहार में नीतीश की बड़ी सहयोगी थी क्योंकि झारखंड क्षेत्र की ज्यादातर सीटें उसके पास थीं. लेकिन छोटे बिहार के बनने के बाद नीतीश गठबंधन में बड़े हिस्सेदार बन गए. 40 लोकसभा सीटों में से 25 और विधानसभा की 243 सीटों में से 139 सीटों पर उनका प्रभाव हो गया. धीरे-धीरे उन्होंने बिहार गठबंधन की दिशा तय करनी शुरू कर दी. सीटों के बंटवारे से लेकर एजेंडा और विचारधारा तय करने तक में उनकी भूमिका प्रमुख हो गई.”
2005 का साल बिहार की राजनीति में नीतीश के एक केंद्रीय नेता के रूप में उभरने का समय बना. उस साल हुए पहले विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु परिणाम आया और आरजेडी कमजोर हुई. उसी साल बाद में हुए दूसरे चुनाव में लालू को बड़ी हार मिली और नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में पहला पूरा पांच साल का कार्यकाल मिला.
अपने पहले पूर्ण कार्यकाल में नीतीश ने बिहार में प्रशासन में बदलाव की शुरुआत की. खासकर बुनियादी ढांचे और कानून व्यवस्था के क्षेत्र में सुधार किए. साथ ही उन्होंने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (EBC) के बीच मजबूत समर्थन आधार बनाया, जिसमें गैर-प्रभावशाली ओबीसी, मुसलमान और सवर्ण वर्ग भी शामिल थे.
"पूरी तरह से भाजपा ने नीतीश कुमार को हाईजैक कर लिया था, आज यह बात साबित हो गया है!"@yadavtejashwi#RJD #TejashwiYadav #bihar pic.twitter.com/M6YRRbzOqN
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पांच साल बाद उन्हें इसका चुनावी फायदा मिला और उनकी पार्टी जेडीयू ने 115 सीटें जीतीं, जो अब तक का उसका सबसे बड़ा आंकड़ा है.
उस समय राजनीतिक हलकों में नीतीश को भविष्य के संभावित प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जाने लगा था.
इसी दौर में मोदी राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से उभरने लगे. कई सालों तक नीतीश सार्वजनिक रूप से मोदी का नाम तक लेने से बचते रहे और उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि बीजेपी बिहार के राजनीतिक कार्यक्रमों में मोदी को दूर रखे.
2009 के आम चुनाव से पहले नीतीश अनिच्छा से लुधियाना में एनडीए की रैली में शामिल हुए. उन्हें गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार एल.के. आडवाणी और बीजेपी नेता अरुण जेटली ने मनाया था.
रैली के मंच पर मोदी ने नीतीश का हाथ पकड़कर भीड़ के सामने ऊपर उठा दिया. इस घटना से बिहार के मुख्यमंत्री काफी नाराज हो गए थे.
2010 में उन्होंने गुजरात सरकार द्वारा 2008 के कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजे गए 5 करोड़ रुपये की राहत राशि भी लौटा दी थी. और जैसा पहले बताया गया, 2013 में जब यह साफ हो गया कि मोदी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा, तब उन्होंने जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन तोड़ दिया.
बार-बार पाला बदलना
2014 के आम चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत हुई और बिहार में जेडीयू को भारी नुकसान हुआ. इससे नीतीश कुमार हिल गए. हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी जगह जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया.
कुछ महीनों बाद वे फिर से मुख्यमंत्री बने. उन्होंने राजनीतिक जरूरत के तहत लालू प्रसाद यादव से समझौता किया और 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी हार दी.
लेकिन दो साल के भीतर ही वे फिर से एनडीए में लौट आए. उन्होंने एक बार फिर बीजेपी से गठबंधन किया और आरजेडी से अलग हो गए. 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को नुकसान हुआ, लेकिन नीतीश बीजेपी के साथ गठबंधन में मुख्यमंत्री बने रहे.
2022 में उन्होंने फिर से पाला बदल लिया और आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर नई सरकार बनाई. इस सरकार में भी वे मुख्यमंत्री बने रहे.

2024 तक, जब देश एक और लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा था, नीतीश ने फिर से गठबंधन बदल दिया. उन्होंने INDIA गठबंधन छोड़ दिया, क्योंकि उनकी इच्छा के बावजूद उन्हें इसका संयोजक नहीं बनाया गया.
जब उनसे उनके फैसलों के बारे में पूछा गया, तो नीतीश, जिन्हें तब तक बार-बार राजनीतिक पलटी मारने के कारण ‘पलटू राम’ कहा जाने लगा था, ने कहा, “अब मैं कहीं नहीं जा रहा हूं.”
नवंबर 2025 में नीतीश आरामदायक बहुमत के साथ फिर सत्ता में लौटे. उनकी पार्टी जेडीयू ने 85 सीटें जीतीं और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 202 सीटों पर बड़ी जीत हासिल की.
हालांकि वे सत्ता में बने रहे, लेकिन उनकी गिरती सेहत और याददाश्त को लेकर चर्चा तेज हो गई. इसकी वजह कई असामान्य सार्वजनिक घटनाएं थीं. एक सरकारी कार्यक्रम में एक अधिकारी के सिर पर फूलों का गमला रख देना, विधानसभा में जन्म नियंत्रण समझाते समय बहुत खुलकर टिप्पणी करना, राष्ट्रगान के दौरान इशारे करना और बोलना, बातचीत के दौरान एक मुस्लिम मेडिकल छात्रा का हिजाब खींच देना, और प्रधानमंत्री मोदी के पैर छूने की कोशिश करना.
एक समय शुरुआती चुनावी हार के बाद निराशा में उन्होंने कहा था कि वे “किसी भी तरह से सत्ता हासिल करेंगे” और फिर उससे अच्छा काम करेंगे. लेकिन आखिर में नीतीश की राजनीतिक यात्रा शासन से ज्यादा राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने की कहानी बन गई.
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