Saturday, 21 May, 2022
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कर्नाटक कांग्रेस ने कोविड कर्फ्यू के बावजूद शुरू की मेकेदातु पदयात्रा, बीजेपी ने बताया- ‘सियासी ड्रामा’

यह पदयात्रा कर्नाटक में भाजपा सरकार पर निशाना साधने के लिए सिद्धारमैया और शिवकुमार की तरफ से संयुक्त रूप से किए जा रहे विरोध प्रदर्शन की ही अगली कड़ी है.

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बेंगलुरु: कर्नाटक कांग्रेस ने अपने ऐलान के करीब दो महीने बाद अब रविवार को बहुचर्चित ‘मेकेदातु’ पदयात्रा शुरू कर दी.

केपीसीसी अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार, नेता विपक्ष सिद्धारमैया और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने जलाशय परियोजना तत्काल शुरू करने की मांग को लेकर मेकेदातु से पदयात्रा शुरू की है.

पिछले साल नवंबर में पार्टी ने आधिकारिक तौर पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी. प्रिंट ने तब रिपोर्ट छापी थी कि कैसे पार्टी मेकेदातु के साथ भाजपा के ‘डबल इंजन ग्रोथ’ के वादे की पोल खोलना चाहती है.

कांग्रेस की यह पदयात्रा 10 दिनों में एक दर्जन से अधिक विधानसभा क्षेत्रों को कवर करते हुए 155 किलोमीटर की दूरी तय करेगी. पदयात्रा शुरू करने से पहले शनिवार को शिवकुमार कनकपुरा में दो मंदिरों के अलावा एक चर्च और एक मस्जिद में भी पहुंचे. रविवार को पदयात्रा के उद्घाटन से पूर्व उन्होंने मेकेदातु में पूजा-अर्चना की.

यह पदयात्रा कर्नाटक में भाजपा सरकार पर निशाना साधने के लिए सिद्धारमैया और शिवकुमार की तरफ से संयुक्त रूप से किए जा रहे विरोध प्रदर्शन की ही अगली कड़ी है. हालांकि, यह सब तब हो रहा है जब दोनों नेताओं के बीच वर्चस्व की जंग और पार्टी में आंतरिक कलह को लेकर सुगबुगाहट किसी से छिपी नहीं है.

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पदयात्रा ऐसे समय शुरू हुई है जब कर्नाटक में कोविड-19 के केस बढ़ रहे हैं और राज्य सरकार ने वीकेंड लॉकडाउन लागू किया है. वॉकथॉन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच शिवकुमार पिछले हफ्ते कई मौकों पर पत्रकारों से कह चुके हैं, ‘वे जितने चाहें मामले दर्ज कर लें. पदयात्रा कर्नाटक के लोगों के लिए है. यह हमारे पानी पर हमारे अधिकार की एक लड़ाई है. हम कोविड-19 के मद्देनजर सभी सावधानियां बरतेंगे और प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन करेंगे, लेकिन पदयात्रा निकालेंगे.’

उन्होंने यह दावा भी किया कि सरकार ने पदयात्रा को रोकने के इरादे से ही वीकेंड कर्फ्यू लागू किया है.

हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा ने मार्च को एक ‘राजनीतिक ड्रामा’ करार दिया है.

राज्य के गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र ने शनिवार को संवाददाताओं से कहा, ‘यह एक राजनीतिक नौटंकी है. ऐसे समय में जबकि कोविड-19 केस बढ़ रहे हैं, कांग्रेस नेताओं को लोगों की भलाई के लिए अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए.’ साथ ही जोड़ा कि वीकेंड लॉकडाउन और रात्रिकालीन कर्फ्यू का उल्लंघन करने वालों पर मामला दर्ज का जाएगा.

मेकेदातु से इतर इस पदयात्रा के क्या मायने हैं?

पार्टी को उम्मीद है कि वह मेकेदातु पदयात्रा के साथ 2010 में ‘बेल्लारी चलो’ पदयात्रा जैसा प्रभाव फिर कायम करने में सफल रहेगी. यहां तक कि कांग्रेस के भीतर के लोग भी इसे उसी तर्ज पर निकाली जा रही पदयात्र मान रहे हैं.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री कृष्णा बायरेगौड़ा ने दिप्रिंट से कहा, ‘नि:संदेह इसमें समानताएं हैं. वह (बेल्लारी चलो) मुद्दा सियासी सांठगांठ के साथ संयुक्त राज्य के खनिज संसाधनों की लूट से जुड़ा था. दूसरी ओर यह सरकार के कोई रुचि न लेने और राजनीतिक अक्षमता के कारण राज्य के संसाधनों के नुकसान से जुड़ा है. बेंगलुरु को पानी की जरूरत है और हम इसके लिए लड़ रहे हैं.’

बायरेगौड़ा ने कहा, ‘मेकेदातु का पानी बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा. जाहिर तौर पर बेंगलुरू में हमारी प्रतिद्वंद्वी पार्टी भाजपा ही है और यह मुद्दा शहर को प्रभावित करता है लेकिन यह सिर्फ राजनीति की बात नहीं है.’

वैसे तो यह पदयात्रा अपनी पकड़ मजबूत करने के लिहाज से शिवकुमार के लिए महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, जैसा सिद्धारमैया ने बेल्लारी चलो यात्रा के दौरान किया था—लेकिन इसे सियासी तौर पर बेंगलुरु में अपना प्रभुत्व बढ़ाने की कांग्रेस की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

कर्नाटक कांग्रेस के एक विधायक और वरिष्ठ पदाधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, ‘उत्तर कर्नाटक में तो हमारे पास राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी से मुकाबला करने के लिए फंड की कमी, डेवलपमेंट बोर्ड की नाकामियां, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी जैसे मुद्दे हैं. लेकिन बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्र के लोगों को जोड़ने के लिए मेकेदातु ही एक अच्छा मुद्दा है.’ साथ ही जोड़ा कि सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच वर्चस्व की लड़ाई इस पदयात्रा के प्रभाव पर कोई खास असर नहीं डालेगी.

2018 के चुनावों में राजधानी बेंगलुरु की कुल 28 विधानसभा सीटों में भाजपा ने 11, कांग्रेस ने 15 और जेडीएस ने दो सीटें जीती थीं. 2019 में यह आंकड़ा बदल गया जब कांग्रेस और जेडीएस विधायक पाला बदलकर भाजपा में चले गए. अभी भाजपा के पास 15 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस के पास 12 और जेडीएस के पास एक ही सीट है. बेंगलुरु की तीनों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है.

‘वे किसके खिलाफ विरोध कर रहे?’

भाजपा को यह पदयात्रा कतई नहीं सुहा रही है, लेकिन वह इस पर जोर दे रही है कि इसमें बेल्लारी चलो जैसा कुछ नहीं है.

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सी.टी. रवि ने कहा, ‘वे किसके खिलाफ विरोध कर रहे हैं? वे तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके के गठबंधन सहयोगी हैं. उन्हें तमिलनाडु सरकार से कहना चाहिए कि वह अपनी आपत्ति छोड़ दे जो परियोजना में बाधक बन रही है.’ भाजपा का मानना है कि भले ही 2010 में बेल्लारी चलो पदयात्रा से कांग्रेस को व्यापक जमीनी समर्थन मिला हो, लेकिन मेकेदातु पदयात्रा से ऐसा कुछ नहीं होने वाला है.

राजनीतिक विश्लेषक और स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी एंड गवर्नेंस, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के फैकल्टी सदस्य ए. नारायण ने दिप्रिंट से कहा, ‘बेल्लारी चलो पदयात्रा के दौरान राज्य में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर एक माहौल बना हुआ था, लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट आ चुकी थी और अवैध खनन को लेकर आम जनता में नाराजगी थी. लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं है. पार्टी एक ऐसे विषय पर पदयात्रा शुरू कर रही है जिस पर सार्वजनिक तौर पर कोई बहस नहीं होती है.’ साथ ही जोड़ा कि इसके पीछे मुख्य इरादा बेंगलुरू पर सियासी दबदबा कायम करने का हो सकता है.

पदयात्रा कनकपुरा सहित वोक्कालिगा समुदाय के वर्चस्व वाले विधानसभा क्षेत्रों से निकलेगी, जिसका प्रतिनिधित्व शिवकुमार करते हैं. यह पदयात्रा शिवकुमार के लिए काफी मायने रखती है, केवल इसलिए ही नहीं क्योंकि जल संसाधन मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने मेकेदातु परियोजना के लिए पहल की थी, बल्कि इसलिए भी कि कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार संभालने के बाद से यह उनके नेतृत्व में पार्टी का पहला जन आंदोलन है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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