Wednesday, 25 May, 2022
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पंजाब में चुनावी मौसम आते ही नौकरियां देने का वादा, लेकिन सियासी दलों के लिए इसे पूरा करना मुश्किल क्यों है

केंद्र के पीरिऑडिक लेबर फोर्स सर्वे 2019-20 के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में बेरोजगारी दर 7.4% थी, जो देशव्यापी आंकड़े 4.8% की तुलना में बहुत ही ज्यादा है.

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पटियाला/संगरूर : पंजाब में संगरूर जिले के रजो माजरा गांव निवासी सतवीर सिंह ने शिक्षा शास्त्र में स्नातक की डिग्री के साथ दो मास्टर डिग्री भी हासिल की हैं और कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा भी कर रखा है. लेकिन उनके पास जिस चीज की कमी है, वो है एक नौकरी.

कांग्रेस ने 2017 के चुनाव के दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में एक प्रमुख अभियान चलाया था, जिसे नाम दिया गया—’हर घर तों इक कैप्टन’, जिसके तहत हर परिवार में एक व्यक्ति को नौकरी देने का वादा किया गया. 32 वर्षीय सतवीर ने बताया कि उसके बाद नौकरी पाने की आस में उन्होंने कई फॉर्म भरे. उन्होंने रोजगार से वंचित लोगों को मिलने वाले ‘बेरोजगारी भत्ते’ के लिए भी पंजीकरण कराया. 2017 में कांग्रेस ने ये दोनों वादे चुनाव जीतने के 100 दिनों के भीतर पूरे करने का दावा किया था. उसने ऐसा किया भी, लेकिन सतवीर का कहना है कि पांच साल के बाद भी उन्हें इसमें से किसी भी योजना का लाभ नहीं मिला है.

सतवीर ने निराशा भरे स्वर में कहा, ‘मैंने सारी शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास कर ली, लेकिन अभी तक कोई नौकरी नहीं मिली है. कहीं भी कुछ शुरू नहीं हो पाया. मेरे ऊपर चार लाख रुपये का कर्ज है और फिलहाल मैं निजी ट्यूशन से होने वाली थोड़ी-बहुत कमाई से घर चला रहा हूं. चार साल पहले सतवीर के पिता ने आत्महत्या कर ली थी और वह अपने छह सदस्यों के परिवार में इकलौते कमाने वाले हैं.

सतवीर कोई अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा. पंजाब सरकार की घर-घर रोजगार वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में (22 जनवरी 2022 तक) नौकरी के लिए पंजीकरण कराने वालों की संख्या जहां 13 लाख से ऊपर थी वहीं उपलब्ध सरकारी नौकरियां 12,946 थी. निजी क्षेत्र में उपलब्ध नौकरियों की संख्या 10,910 है, जबकि पंजीकृत नियोक्ताओं की कुल संख्या 12,041 है.

पिछले कई सालों से पंजाब में बेरोजगारी एक प्रमुख चुनावी मुद्दा है. पार्टी चाहे कोई भी हो, चुनाव अभियान राज्य में रोजगार सृजन के वादे के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहता है.

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माना जाता कि 2017 के विधानसभा चुनावों में हर परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने और बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता (36 महीने तक 2,500 रुपये प्रति माह) देने के दोहरे वादे ने राज्य में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

इससे पांच साल पहले, शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन ने सत्ता में फिर लौटने पर राज्य में 10 लाख रोजगार सृजित करने का वादा किया था और चुनावी जीत हासिल की थी.

अब जबकि पंजाब में 20 फरवरी को फिर चुनाव होने जा रहे हैं, जैसा तय ही माना जा रहा था रोजगार सृजन एक बार फिर प्रमुख चुनावी वादा बनकर उभरा है.

मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने जहां कांग्रेस की सत्ता में वापसी पर हर साल एक लाख नौकरियां देने का वादा किया है, वहीं एसएडी प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने निजी नौकरियों में राज्य के युवाओं को 75 प्रतिशत कोटा तय करने की घोषणा की है. रोजगार सृजन आम आदमी पार्टी के 10 सूत्री एजेंडे का भी केंद्रबिंदु रहा है, जिसे 12 जनवरी को पार्टी संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जारी किया था.

बहरहाल, इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन, चंडीगढ़ से जुड़े पंजाब के पॉलिटिकल इकोनॉमिस्ट डॉ. प्रमोद कुमार का कहना है कि राज्य के सियासी दल चुनाव जीतने के लिए नौकरियों का वादा तो कर सकते हैं, लेकिन रोजगार सृजन कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है जिसे पूरा करना सरकार के लिए आसान काम हो, ‘खासकर तब जब इसने हर चीज का निजीकरण कर दिया है.’
डॉ. कुमार का कहना है. ‘वे भले ही बड़े-बड़े वादे करते रहें लेकिन ज्यादा कुछ कर नहीं पाएंगे.’

राष्ट्रीय स्तर पर 4.8% के मुकाबले पंजाब में बेरोजगारी दर 7.4% है

पंजाब की बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है.

पिछले वर्ष जुलाई में जारी केंद्र के पीरिऑडिक लेबर फोर्स सर्वे 2019-20 के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में बेरोजगारी दर 7.4 प्रतिशत थी जबकि राष्ट्रीय आंकड़ा 4.8 प्रतिशत है.

2018-19 के पीरिऑडिक सर्वे के बाद से राज्य में बेरोजगारी दर में कोई बदलाव नहीं आया है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी दर 5.8% से घटकर 2019-20 में 4.8% हो गई. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में जब देश में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी उस समय पंजाब की बेरोजगारी दर 7.8 प्रतिशत थी.

पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे लखविंदर सिंह के मुताबिक, खेतों में मशीनी उपकरणों का उपयोग बढ़ना, औद्योगीकरण की धीमी रफ्तार और सरकारी नौकरियों की कमी राज्य में उच्च बेरोजगारी दर के प्रमुख कारण हैं.

पटियाला के शंकरपुर गांव के निवासियों का आरोप है कि फार्म भरने के बावजूद न तो उन्हें रोजगार मिला और न ही बेरोजगारी भत्ता | फोटो: शुभांगी मिश्रा/ दिप्रिंट

उन्होंने कहा, ‘एक के बाद एक सरकारें रोजगार सृजन में नाकाम रही हैं क्योंकि उनका जोर उच्च स्तर के राजकोषीय घाटे को स्थिर करने पर रहा है. पंजाब का सकल अचल पूंजी निर्माण देश के 30 राज्यों में सबसे कम है.

उन्होंने कहा, ‘सरकार का राजस्व सृजन बहुत कम है. जब आपके पास उत्पादन बढ़ाने की क्षमता ही नहीं है तो आप रोजगार कैसे उत्पन्न करेंगे? जब तक सरकार ठीक से निवेश नहीं करेगी, रोजगार की दर कम ही रहेगी.’

लखविंदर सिंह ने कहा कि विडंबना तो यह है कि पिछले कुछ समय से सरकार ‘राजस्व की कमी के कारण’ सरकारी क्षेत्र की नौकरियों में कटौती कर रही है.

डॉ. प्रमोद कुमार के मुताबिक, ‘नेहरूवादी ढांचे के तहत पंजाब को एक कृषि राज्य के रूप में विकसित किया गया था न कि एक औद्योगिक राज्य के रूप में.’ उन्होंने दावा किया कि चूंकि यहां की भूमि उपजाऊ है, औद्योगीकरण के लिए भूमि की दरें भी महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तुलना में काफी अधिक हैं.

रियल एस्टेट साइट 99एकड़ डॉट कॉम के मुताबिक, पंजाब में औद्योगिक उद्देश्यों के लिए जमीन की कीमत औसतन 3,000 रुपये प्रति वर्ग फुट से अधिक है. महाराष्ट्र में ऐसी जमीन 495 रुपये प्रति वर्ग फुट से कम दम पर मिल सकती है, वहीं मध्य प्रदेश के लिए यह आंकड़ा 350 रुपये प्रति वर्ग फुट है.

डॉ. कुमार ने कहा कि जमीन की ऊंची दरें (जिसका नतीजा कोई उद्योग लगाने की लागत ज्यादा हो सकता है) कई उद्योग मालिकों को यहां से दूर रहने को बाध्य करती हैं, जिससे पंजाब में रोजगार के मौके कम ही बढ़ते हैं.

अमृतसर के पापड़ उद्योग का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कई छोटी इकाइयां हैं, जो ठीक से विकसित होतीं तो राज्य से रोजगार के मौके बढ़ा सकती थी और यहां तक कि राज्य से निर्यात बढ़ाने में भी मददगार हो सकती थीं. लेकिन सरकारें इन्हें बढ़ावा देने या मजदूरों के कौशल विकास को प्रोत्साहित करने में नाकाम रही हैं.

हालांकि, अचरज की बात तो यह है कि राज्य में बेरोजगारी दर पिछले कई वर्षों में कम नहीं हुई है लेकिन राज्य सरकार के आंकड़ें बताते हैं कि बेरोजगारी भत्ता मांगने वालों की संख्या में काफी गिरावट आई है.

राज्य सरकार की एक वेबसाइट पर उपलब्ध वित्तीय वर्ष 2019-20 के वार्षिक प्रशासनिक आंकड़े बताते हैं कि उस वर्ष राज्य में केवल 42 लोगों ने बेरोजगारी भत्ते के लिए पंजीकरण कराया. रिपोर्ट में बताया गया है कि बेरोजगारी भत्ते के तौर पर 53,550 रुपये की राशि वितरित की गई है.

वित्तीय वर्ष 2018-19 में पंजीकरण कराने वाले 97 लोगों के लिए इस भत्ते की भुगतान राशि 1,13,025 रुपये थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2017-18 में कुल 3,37,275 रुपये का बेरोजगारी भत्ता 212 लोगों को वितरित किया गया.


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विरोध भी जताया जा रहा

पंजाब में रोजगार की बुरी स्थिति और इसके कारण लोगों में असंतोष को देखते हुए इस साल चुनावों से पहले पिछले एक साल के दौरान राज्य भर में विरोध प्रदर्शन होना कोई अचरज की बात नहीं रही है.

एक तरफ जहां पंजाब के किसान 2020 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की तरफ लाए गए तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनरत थे, वहीं राज्य भर के श्रमिक संगठन नौकरियों, रोजगार के अवसरों को नियमित करने या बेहतर वेतन की मांग को लेकर हड़ताल पर चले गए थे.

संगरूर जिले में एक बेरोजगार युवक अगस्त में नौकरी की मांग को लेकर एक अस्पताल में पानी की टंकी पर चढ़ गया था.
वहीं, एक अन्य घटनाक्रम में ज्वाइंट फोर्स ऑफ अनइंप्लायड के तहत तमाम यूनियनों ने सरकारी नौकरी की मांग को लेकर 31 दिसंबर 2020 को राज्य के शिक्षा मंत्री विजय इंदर सिंगला के आवास के सामने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी थी. वहीं, जब परगट सिंह को शिक्षा मंत्री बनाया गया तो इसी तरह का विरोध-प्रदर्शन उनके आवास पर किया गया.

पंजाब के राजो माजरा गांव के निवासी रोजगार की कमी की शिकायत करते हैं | फोटो: शुभांगी मिश्रा/ दिप्रिंट

राज्य भर के जिलों से बेरोजगारों के इसी तरह के विरोध प्रदर्शन की सूचनाएं भी आती रही हैं.

पंजाब के धुरी में क्रांतिकारी पिंड मजदूर यूनियन के कार्यकर्ता बलजीत सिंह ने दावा किया, ‘रोजगार नहीं होने के कारण हमारे युवा सड़क पर हैं. रोजगार की कमी ने संगरूर और बरनाला जिलों में नशे की समस्या को और बढ़ाया है.’

बलजीत ने आगे कहा, ‘पार्टियां वोट हासिल करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती हैं, लेकिन रोजगार सृजन पर ध्यान नहीं देती है. मैंने संगरूर जिले के 70 गांवों में काम किया है और मुझे अभी तक कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसे कांग्रेस सरकार की योजना ‘हर घर तों इक कैप्टन’ के तहत फॉर्म पर हस्ताक्षर करने के बाद रोजगार मिला हो.’

पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में तकनीकी शिक्षा और औद्योगिक प्रशिक्षण मंत्री के तौर पर कार्यरत थे थे, जिसमें रोजगार सृजन विभाग भी शामिल था.

अब जबकि मुख्यमंत्री आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के मद्देनजर एक बार फिर राज्य में रोजगार के मौके बढ़ाने का वादा दोहरा रहे हैं, राज्य भर में सतवीर सिंह जैसे न जाने कितने युवाओं को अभी भी नौकरी मिलने या फिर बेरोजगारी भत्ता पाने का इंतजार है.
पटियाला के गांव शंकरपुर निवासी गुरमीत सिंह इन्हीं में एक हैं, जिनका कहना है कि वह कई बार इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदन कर चुके हैं. गुरमीत ने बताया, ‘मैंने रोजगार और बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए फॉर्म भरे. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. मेरे गांव में किसी को भी भत्ता नहीं मिला है, हालांकि हममें से कई लोगों ने इसके लिए संबंधित फॉर्म भरे थे.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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