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Friday, 14 June, 2024
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‘यह एक लंबी लड़ाई है’, ‘बंदी सिंह’ की रिहाई को PMO से ठुकराए जाने पर SGPC ने जताया अफसोस

सिख निकाय ने अकाल तख्त पैनल के प्रति सरकार के ‘नकारात्मक रवैये’ पर अफसोस दुख जताया, जो 1980-1990 के दशक में उग्रवाद के दौरान जेल में बंद और दशकों से बंद ‘बंदी सिंह’ की रिहाई की मांग कर रहा है.

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चंडीगढ़: अपने मतदाताओं की संख्या में गिरावट के बीच, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) — भारत में सिखों की सर्वोच्च संस्था — ने कहा कि वह ‘बंदी सिंहों’ की रिहाई की अपनी मांग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान आकर्षित करने में विफल रही है, लेकिन उसने फैसला किया वह अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाते रहेंगे.

‘बंदी सिंह’ पूर्व सिख चरमपंथी हैं जो पिछले 30 साल से अधिक समय से देश भर की अलग-अलग जेलों में बंद हैं. एसजीपीसी के नेतृत्व में उनकी रिहाई की मांग एक दशक पहले शुरू हुई थी.

29 मार्च को एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कैदियों की रिहाई के लिए सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त द्वारा पिछले साल दिसंबर में गठित पांच सदस्यीय समिति को कई कोशिशों के बावजूद भी पीएमओ से प्रतिक्रिया नहीं मिली है. धामी ने पिछले महीने अपनी बजट बैठक में एसजीपीसी जनरल हाउस द्वारा पारित दस प्रस्तावों में से एक के रूप में मांग दोहराई.

समिति के प्रति “नकारात्मक रवैये” को ध्यान में रखते हुए एसजीपीसी के प्रस्ताव में कहा गया कि सरकार अकाल तख्त की सर्वोच्चता और गरिमा को मान्यता देने के बारे में गंभीर नहीं थी.

धामी ने कहा कि जनरल हाउस ने सरकार से अकाल तख्त का सम्मान करने और समिति के माध्यम से आपसी बातचीत शुरू करने के लिए कहने का संकल्प लिया ताकि सिख समुदाय को संघर्ष का सहारा न लेना पड़े.

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पिछले कुछ साल में ‘बंदी सिंह’ की रिहाई का मुद्दा न केवल कट्टरपंथी सिखों बल्कि पंजाब में सिख आबादी के एक बड़े वर्ग के बीच एक भावनात्मक विषय के रूप में उभरा है.

शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने लगातार इस मांग का समर्थन किया है. आगामी लोकसभा चुनावों में गठबंधन के बारे में भाजपा के साथ उसकी बातचीत टूटने के बाद, इस चुनाव में शिअद के अभियान में यह मुद्दा संभवतः केंद्र में रहेगा.

यह मामला संभवतः इस साल के अंत में होने वाले एसजीपीसी चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण रैली बिंदुओं में से एक होगा. एसजीपीसी, जो कभी 190 सदस्यीय निकाय थी, ने हरियाणा में एक अलग गुरुद्वारा समिति के कारण 11 सदस्यों को खो दिया है और पंजाब में पर्याप्त मतदाता जुटाने के लिए संघर्ष कर रही है. एसजीपीसी चुनावों में वोट देने के योग्य ‘केशधारी’ सिखों (जिन्होंने अपने बाल नहीं कटवाए हैं) की संख्या पिछले 13 वर्षों में नाटकीय रूप से कम हो गई है.

2011 में एसजीपीसी के पिछले चुनावों के दौरान, ‘केशधारी’ मतदाताओं की संख्या 52 लाख थी, जबकि इस साल यह संख्या घटकर 27.5 लाख हो गई है, जो चुनाव प्रक्रिया में सिखों के बीच निराशा को दर्शाता है.

दिसंबर 2022 में, एसजीपीसी ने नौ ‘बंदी सिंहों’ की रिहाई के लिए दुनिया भर में हस्ताक्षर अभियान शुरू किया था. धामी के अनुसार, पिछले साल दिसंबर में भारत के राष्ट्रपति को भेजे गए एसजीपीसी के मांग पत्र पर “10 लाख से अधिक लोगों” ने हस्ताक्षर किए थे.

पिछले महीने, अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह ने कहा था कि मोदी को कतर में मौत की सज़ा पाए आठ भारतीय कैदियों के लिए जो करुणा दिखाई, वही करुणा उन्हें लंबे समय से जेलों में बंद सिख कैदियों के लिए भी बढ़ानी चाहिए.


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‘यह एक लंबी लड़ाई है’

‘बंदी सिंहों’ का आंदोलन 2013 में शुरू हुआ जब 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौरान जेल में बंद सिख चरमपंथियों को रिहा करने की मांग को एसजीपीसी जैसे संगठनों में एक मंच मिला.

पिछले कुछ साल में 119 ऐसे कैदियों की प्रारंभिक सूची घटकर दो दर्जन रह गई है. इनमें से कुछ ने अपनी सज़ा पूरी कर ली, जबकि विरोध प्रदर्शनों के कारण अन्य कैदियों को रिहा कर दिया गया.

इस बीच, नौ ‘बंदी सिंहों’ की रिहाई की मांग को लेकर सिख संगठनों के एक समूह कौमी इंसाफ मोर्चा का धरना प्रदर्शन पिछले साल जनवरी से पंजाब-चंडीगढ़ सीमा पर मोहाली में जारी है.

हालांकि, बीते कुछ महीनों में धरना-प्रदर्शन में बहुत अधिक गतिविधि नहीं देखी गई है, लेकिन पिछले साल फरवरी में प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प हो गई थी जब उन्हें चंडीगढ़ तक मार्च करने से रोका गया था.

यह विरोध प्रदर्शन तब भी सुर्खियों में रहा जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने एसजीपीसी अध्यक्ष धामी के वाहन पर उस समय हमला कर दिया जब वह एक सभा को संबोधित करने के बाद विरोध स्थल से बाहर निकल रहे थे.

एक को छोड़कर सभी नौ कैदी पहले ही 25-32 साल जेल में बिता चुके हैं. नौ में से सात को पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में दोषी ठहराया गया था. सात में से दो मौत की कतार में थे.

31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ में आत्मघाती हमलावर दिलावर सिंह बब्बर ने बेअंत सिंह और 16 अन्य लोगों की हत्या कर दी थी. 2007 में सीबीआई की एक अदालत ने जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह राजोआना को हत्या में उनकी भूमिका के लिए मौत की सज़ा सुनाई.

पांच अन्य – गुरुमीत सिंह, लखविंदर सिंह लाखा, शमशेर सिंह, परमजीत सिंह भियोरा और जगतार सिंह तारा को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई.

जबकि निचली अदालत ने हवारा की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया, राजोआना की मौत की सज़ा को कम करने के लिए एक दया याचिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है.

जनवरी में कौमी इंसाफ मोर्चा ने पंजाब में एक दर्जन से अधिक टोल प्लाजा के बाहर सभा आयोजित करके अपने धरने के एक साल पूरे होने पर अधिकारियों को यात्रियों से कोई टोल नहीं वसूलने के लिए मजबूर किया.

मोर्चा के नेताओं में से एक, अधिवक्ता अमर सिंह चहल ने दिप्रिंट को बताया, “बंदी सिंहों की रिहाई के बारे में अदालतों में कोई मुद्दा लंबित नहीं है…उन्हें रिहा करने का फैसला सरकार को लेना है और जब तक ऐसा नहीं होता, विरोध जारी रहेगा. यह एक लंबी लड़ाई है.”

पिछले हफ्ते पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मोहाली-पंजाब सीमा पर कौमी इंसाफ मोर्चा द्वारा अवरुद्ध सड़कों को खाली नहीं करवाने के लिए पंजाब सरकार को फटकार लगाई थी.

सड़क सुरक्षा गैर-सरकारी संगठन, अराइव सेफ द्वारा दायर जनहित याचिका की फिर से शुरू हुई सुनवाई के दौरान, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार को कई मौके दिए गए, लेकिन वह नाकाबंदी हटाने में विफल रही.

खंडपीठ ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध को वैधता दिलाने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब का इस्तेमाल किया, इसलिए सरकार के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई न करने का कोई कारण नहीं है.

अराइव सेफ ने पिछले साल हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें सड़क पर नाकाबंदी को हटाने की मांग की गई थी क्योंकि इससे यात्रियों को असुविधा हो रही थी, इसके अलावा यह एक फ्लैश प्वाइंट था जो कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकता था.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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