नई दिल्ली: प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (जेएसपी) ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से बिहार में नए सिरे से चुनाव कराने की मांग वाली अपनी याचिका वापस ले ली. अदालत ने इस याचिका पर पार्टी को कड़ी फटकार लगाई थी.
याचिका में बिहार विधानसभा चुनाव को रद्द घोषित करने की मांग की गई थी. आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन सरकार ने चुनाव से पहले राज्य में कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा कर मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (एमसीसी) का उल्लंघन किया. इसके साथ ही चुनाव आयोग (ईसीआई) को राज्य में नए, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी.
पार्टी की ओर से दलील देते हुए सीनियर एडवोकेट सी.यू. सिंह ने कहा कि देश के सबसे कर्ज़ में डूबे राज्यों में से एक में 15,600 करोड़ रुपये बांटना “लेवल प्लेइंग फील्ड को पूरी तरह बिगाड़ देता है.”
उन्होंने कहा कि पूरे राज्य में एमसीसी का उल्लंघन हुआ और निष्पक्ष मुकाबला खत्म हो गया.
मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करने के संकेत दिए. बेंच ने कहा कि यह “सभी चुनावों को प्रभावित करने वाली एक संयुक्त चुनाव याचिका” जैसी लगती है और ऐसे आरोपों को चुनाव याचिका में साबित करना होता है.
बेंच ने टिप्पणी की, “आपकी पार्टी को चुनाव में कितने वोट मिले? अगर लोग आपको खारिज कर देते हैं, तो आप लोकप्रियता के लिए न्यायिक मंचों का इस्तेमाल करते हैं.”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वह मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज़) के बड़े मुद्दे पर विचार कर रहा है, लेकिन बिहार की इस योजना से जुड़े सवालों पर तभी विचार करेगा जब कोई “जनहित में काम करने वाला व्यक्ति” इसे चुनौती दे, न कि वह राजनीतिक पार्टी जो अभी-अभी चुनाव हार चुकी हो. कोर्ट ने यह भी पूछा कि पार्टी सीधे पटना हाई कोर्ट क्यों नहीं गई.
इसके बाद जेएसपी ने याचिका वापस लेने का फैसला किया और उसे हाई कोर्ट जाने की छूट दी गई.
‘भ्रष्ट आचरण’
29 दिसंबर को दायर याचिका में जन सुराज पार्टी ने आरोप लगाया था कि बिहार की तत्कालीन सरकार ने नए लाभार्थियों को 10,000 रुपये देने का लाभ बढ़ाकर “मतदाताओं को अपने पक्ष में लुभाने और प्रभावित करने के लिए भ्रष्ट आचरण अपनाया.”
पार्टी का आरोप था कि मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने के बाद, चुनाव प्रक्रिया के दौरान नए लाभार्थियों को जोड़ा गया. उसने कहा कि चुनाव आयोग “इन भ्रष्ट तरीकों पर रोक लगाने में पूरी तरह नाकाम रहा”. पार्टी ने कहा कि इससे चुनाव प्रभावित हुआ क्योंकि अन्य उम्मीदवारों और पार्टियों को समान अवसर नहीं मिला.
पार्टी ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 243 में से 242 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया कि सरकार ने बिहार चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के लिए “मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना” नाम की राज्यव्यापी योजना शुरू की और हर परिवार की एक महिला को 10,000 रुपये देने का फैसला किया.
इस योजना के तहत “जीविका” स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को लाभ मिलना था. जो महिलाएं शुरुआती रकम से अच्छा रोजगार पा लेंगी, उन्हें आगे 2 लाख रुपये और देने का वादा किया गया था.
याचिका के अनुसार, एमसीसी की घोषणा से ठीक पहले राज्य में करीब 11 लाख जीविका स्वयं सहायता समूह थे और लगभग एक करोड़ महिलाएं उनकी सदस्य थीं.
याचिका में कहा गया कि अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना के तहत कुल 1.56 करोड़ लाभार्थियों को भुगतान किया गया.
पार्टी का कहना था कि इससे साफ है कि एमसीसी या चुनाव प्रक्रिया के दौरान नए लाभार्थी जोड़े गए और चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद, जब एमसीसी लागू था, तब उन्हें पैसे दिए गए.
याचिका में कहा गया, “यह अपने आप में दिखाता है कि सत्तारूढ़ सरकार ने मतदाताओं को अनुचित रूप से लुभाने और प्रभावित करने के लिए भ्रष्ट आचरण अपनाया.”
इसलिए पार्टी ने मांग की कि योजना के तहत नए लाभार्थियों को जोड़ना और एमसीसी के दौरान उन्हें भुगतान करना अवैध, असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के सामने समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 112 (केंद्रीय बजट), अनुच्छेद 202 (राज्य बजट) और अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की शक्तियां) के खिलाफ घोषित किया जाए.
पोलिंग बूथ एजेंट के रूप में जीविका दीदियां
याचिका में कहा गया कि योजना के तहत कई जीविका दीदियों को नकद लाभ मिलने के बाद, मतदान की तारीखों पर चुनाव आयोग (ईसीआई) ने उन्हें पोलिंग बूथों पर तैनात किया.
याचिका के मुताबिक, यह तैनाती “स्वाभाविक, निष्पक्ष और उचित नहीं कही जा सकती.”
इसमें आरोप लगाया गया, “सिर्फ यह कदम ही किसी भी आम आदमी की अंतरात्मा को झकझोर सकता है, क्योंकि ऐसी स्वयंसेवक महिलाएं, जिन्हें हाल ही में किसी योजना का लाभ मिला हो, ज़ाहिर तौर पर सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में झुकी हुई हो सकती हैं, जिससे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होती है और उसे निष्पक्ष बनाना मुश्किल हो जाता है.”
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि चुनाव की पूर्व संध्या पर यह योजना कैबिनेट के फैसले से लाई गई, इसके लिए कोई विधायी मंजूरी नहीं ली गई. पार्टी को यह जानकारी भी मिली कि इस योजना का बजट बिहार के कंटिन्जेंसी फंड से निकाला गया.
याचिका में कहा गया, “इसलिए यह योजना नियमित बजटीय आवंटन का हिस्सा नहीं थी, बल्कि राज्य के कंटिन्जेंसी फंड से ली गई, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 267 का उल्लंघन है.”
अनुच्छेद 267 राज्यों को कंटिन्जेंसी फंड बनाने की अनुमति देता है, जिससे राज्यपाल “विधानसभा की मंजूरी मिलने तक अप्रत्याशित खर्चों को पूरा करने के लिए” अग्रिम भुगतान कर सकते हैं.
याचिका में आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना के असर को समझने में नाकाम रहा, जिसका प्रभाव, याचिका के अनुसार, बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन पर पड़ा.
चुनाव को रद्द घोषित करने की मांग के अलावा, याचिका में यह भी मांग की गई कि चुनाव आयोग राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले योजनाओं को लागू करने के लिए एक तय समय-सीमा निर्धारित करे, जो बेहतर होगा अगर छह महीने की हो.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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