scorecardresearch
Tuesday, 31 March, 2026
होमराजनीतिचुनावी असम में ‘जुबीन के लिए न्याय’ एक भावनात्मक मुद्दा है लेकिन इसका सियासी असर घटता जा रहा है

चुनावी असम में ‘जुबीन के लिए न्याय’ एक भावनात्मक मुद्दा है लेकिन इसका सियासी असर घटता जा रहा है

गायक की मौत पर लोगों का शोक अभी थमा नहीं है. जहां एक ओर राजनीतिक दल उनके लिए न्याय दिलाने का वादा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह मुद्दा अभी तक चुनावी राजनीति में कोई ऐसी निर्णायक दरार पैदा नहीं कर पाया है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सके.

Text Size:

गुवाहाटी/जोरहाट: पिछले हफ्ते जब गौरव गोगोई की नामांकन रैली जोरहाट के जगन्नाथ बरूआ यूनिवर्सिटी के पास से गुजरी, तो कुछ छात्र किनारे खड़े होकर जोर-जोर से बीजेपी के समर्थन में नारे लगा रहे थे, जबकि कांग्रेस के झंडों की भीड़ वहां से गुजर रही थी.

ज्यादा तनाव वाले माहौल में यह टकराव बन सकता था. लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध माने जाने वाले जोरहाट में यह एक लोकतांत्रिक तरीके से हुआ, जहां दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को देखा और कुछ मुस्कुराहट भी दिखी, भले ही उनके विचार अलग थे.

दिलचस्प बात यह है कि असम के मशहूर गायक जुबीन गर्ग, जिनकी पिछले साल सितंबर में हुई मौत आज भी भावनात्मक मुद्दा है, इसी संस्थान के छात्र रह चुके थे. इस तरह यह घटना आने वाले असम विधानसभा चुनाव का एक बड़ा विरोधाभास भी दिखाती है.

उनकी मौत के छह महीने बाद भी “जुबीन के लिए न्याय” की मांग पूरे असम में गूंज रही है. लेकिन यह मुद्दा अभी तक ऐसा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है जो 9 अप्रैल के चुनाव के नतीजों को प्रभावित करे.

संस्थान की छात्रा अर्पिता गोगोई के लिए कॉलेज का यूनिवर्सिटी बनना गर्व की बात है और यह उसकी राजनीतिक सोच को भी प्रभावित करता है. वह कमियों को मानती हैं, लेकिन उम्मीद करती हैं कि “मामा” यानी मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा सरमा उन्हें ठीक करेंगे.

लेकिन वह जुबीन की मौत का दुख नहीं भूल पाई हैं, जिसने पिछले साल पूरे असम को रोक दिया था. सिंगापुर की अदालत ने इसे हादसा बताया, लेकिन राज्य के कई लोग मानते हैं कि इसमें साजिश थी.

52 वर्षीय ज़ुबीन की मृत्यु उस समय हुई, जब वे असमिया समुदाय के कुछ सदस्यों और अन्य लोगों के साथ सिंगापुर के सेंट जॉन आइलैंड की यॉट यात्रा पर थे. सिंगापुर में की गई उनकी ऑटोप्सी रिपोर्ट में उनके रक्त में अल्कोहल का स्तर 333 mg प्रति 100 ml पाया गया, जो शरीर के तालमेल को काफ़ी हद तक बिगाड़ने के लिए पर्याप्त था.

23 सितंबर को गुवाहाटी के बाहरी इलाके में हुए ज़ुबीन के अंतिम संस्कार में लाखों शोक-संतप्त लोग उमड़ पड़े थे. भावनाओं के इस सैलाब ने भारत के बाकी हिस्सों को हैरान कर दिया था, जो असम और इस पूरे क्षेत्र में ज़ुबीन की ज़बरदस्त लोकप्रियता से काफी हद तक अनजान थे.

उनकी मौत के बाद लोगों में गुस्सा था और आयोजन से जुड़े लोगों और मैनेजर पर आरोप लगे. इसके बाद सरकार ने विशेष जांच टीम बनाई, जिसने चार लोगों पर हत्या का आरोप लगाया. आरोप लगाया गया कि उन्होंने उन्हें ज़बरदस्ती शराब पिलाई और पानी में उतरने के लिए मजबूर किया.

A hoarding announcing a marathon in Zubeen's memory in Jorhat, next to a BJP campaign banner | Sourav Roy Barman | ThePrint
जोरहाट में ज़ुबीन की याद में आयोजित मैराथन की घोषणा करता एक होर्डिंग, जिसके बगल में BJP का चुनावी बैनर लगा है | सौरव रॉय बर्मन | दिप्रिंट

राज्य कैबिनेट के एक फ़ैसले के बाद, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 19 मार्च को मौत से जुड़े मामले की सुनवाई के लिए एक फ़ास्ट-ट्रैक सेशंस कोर्ट बनाया. इसका मकसद रोज़ाना सुनवाई करके, न्याय के लिए जनता और परिवार की लगातार मांगों के बीच, मामले की तेज़ी से सुनवाई सुनिश्चित करना है.

पिछले हफ़्ते सरमा ने कहा था कि इस मामले में असम पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि एक साज़िश के तहत ज़ुबीन को शराब पिलाई गई थी. उन्होंने असम पुलिस को जांच की कमान सौंपने के फ़ैसले का बचाव करते हुए यह तर्क भी दिया कि इस मामले के अहम पहलू—जिनमें पैसों के लेन-देन से जुड़े सुराग भी शामिल हैं—भारत से ही जुड़े हुए हैं.

हालांकि, असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने सिंगापुर के फ़ैसले को “मानना ​​मुश्किल” बताया. उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि आपसी तालमेल के बावजूद दोनों जांच के नतीजों में इतना फ़र्क क्यों है, और कहा कि इसका फ़ायदा आख़िरकार आरोपी को ही मिल सकता है. पिछले हफ़्ते दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में गौरव ने कहा कि “अगर कांग्रेस जीतती है, तो पहली कैबिनेट मीटिंग के एजेंडे में ज़ुबीन को इंसाफ़ दिलाना भी शामिल होगा.”

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भी कहा कि सत्ता में आने पर 100 दिन में न्याय दिलाया जाएगा.

Souvenirs and pictures being sold outside the site of Zubeen's memorial | Sourav Roy Barman | ThePrint
ज़ुबीन के स्मारक स्थल के बाहर बिक रहे स्मृति-चिह्न और तस्वीरें | सौरव रॉय बर्मन | दिप्रिंट

‘जिंदगी चलती रहती है’

कमरकुची में, जहां जुबीन का अंतिम संस्कार हुआ था, वह जगह अब एक तरह का स्मारक बन गई है, जहां लोग हर समय आते हैं. सरकार ने इसे स्थायी स्मारक बनाने की योजना बनाई है, लेकिन इसमें ज्यादा प्रगति नहीं हुई है, जिसे कई लोग अस्वीकार्य मानते हैं.

अनुपम डेका ने कहा कि हाल की बारिश में यह जगह पानी से भर गई थी, जबकि लोग वहां दीप और मोमबत्तियां जलाते हैं और पूजा भी करते हैं. जुबीन के परिवार ने भी नाराजगी जताई है.

उन्होंने कहा, “सरकार कुछ ही महीनों में फ्लाईओवर बना सकती है, लेकिन न जाने क्यों वह इस जगह को विकसित नहीं कर पाई. इससे कई लोगों का यह विश्वास और भी गहरा हो गया है कि जब तक यह सरकार सत्ता में है, ज़ुबीन को न्याय नहीं मिलेगा.”

फिर भी उनका मानना है कि यह मुद्दा चुनाव पर ज्यादा असर नहीं डालेगा.

Zubeen Garg's memorial site | Sourav Roy Barman | ThePrint
ज़ुबीन गर्ग का स्मारक स्थल | सौरव रॉय बर्मन | दिप्रिंट

कुछ ही कदम दूर, बोंगाईगांव के एक सरकारी कर्मचारी, असित कुमार काकोटी, उस स्मारक पर जमा हुए सैकड़ों लोगों में से एक थे. अपनी बेटी की मदद से फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग करते हुए, उन्होंने सभी पार्टियों के नेताओं से अपील की कि वे इस मामले को प्राथमिकता दें.

“हो सकता है कि इसका चुनावों पर कुछ असर पड़े, लेकिन बीजेपी फिर भी सबसे आगे चल रही है. फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाना एक अच्छा कदम है. बीजेपी पूरे असम में हर जगह मौजूद है और उसने कुछ काम भी किया है. भ्रष्टाचार भी है, लेकिन कम से कम वे काम तो कर रहे हैं,” उन्होंने कहा. उनकी बातों में एक व्यापक स्वीकारोक्ति झलक रही थी कि पार्टी के सत्ता में बने रहने की संभावना ज़्यादा है.

भले ही ज़ुबीन का राजनीतिक महत्व अब कम हो गया हो, लेकिन पूरे असम में उनकी मौजूदगी आज भी बहुत बड़ी है. उनकी तस्वीरें टैक्सियों और ऑटो-रिक्शा पर सजी रहती हैं. भित्तिचित्रों और दीवारों पर बनी कलाकृतियों के ज़रिए उन्हें याद किया जाता है. उनके फ़ैन क्लब उनकी याद में कई कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिनमें मैराथन भी शामिल हैं. इसी महीने की शुरुआत में, असम में पौधों की एक नई प्रजाति की खोज हुई, जिसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया—Osbeckia zubeengargiana.

ईद के मौके पर, स्मारक पर कई मुस्लिम परिवारों की मौजूदगी—जैसे कि नगांव के राजमिस्त्री शाहजहां अली का परिवार—ने ज़ुबीन की सर्वधर्म समभाव वाली अपील को और भी ज़्यादा उजागर किया. उनकी यह भावना शायद उनकी उस मशहूर पंक्ति में सबसे बेहतरीन ढंग से व्यक्त होती है: “मोर कोनो जाति नै, मोर कोनो धर्म नै, मोर कोनो भगवान नै. मोइ मुक्तो, मोइ कंचनजंगा (मेरी कोई जाति नहीं, मेरा कोई धर्म नहीं, मेरा कोई भगवान नहीं. मैं आज़ाद हूं, मैं कंचनजंगा हूं).”

Visitors at Zubeen's cremation site | Sourav Roy Barman | ThePrint
ज़ुबीन का अंतिम संस्कार स्थल | सौरव रॉय बर्मन | दिप्रिंट

लेकिन, पोलिंग बूथ पर व्यावहारिक बातें भावनाओं पर भारी पड़ने की संभावना है.

“ज़िंदगी चलती रहती है. लोग आगे बढ़ जाते हैं और ज़्यादातर उन मुद्दों में व्यस्त रहते हैं जो उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर डालते हैं. ज़ुबीन दा हमेशा हमारे दिलों पर राज करेंगे, लेकिन सच तो यह है कि अब वह हमारे बीच नहीं रहे,” होजाई के एक प्राइवेट स्कूल टीचर अमित नाथ ने कहा, जो एक कड़वी राजनीतिक सच्चाई बयान कर रहे थे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट की तरह है ट्रांस अमेंडमेंट बिल: यह हिंसक परिवार में रहने के लिए मजबूर करता है


 

share & View comments