मुर्शिदाबाद/मालदा/कोलकाता: पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले चरण की गिनती शुरू होने वाली है, और 61 साल के शफीकुल इस्लाम, जो मुर्शिदाबाद के बहारामपुर के बेलडांगा इलाके में एक हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं, दुविधा में हैं.
इस्लाम बताते हैं कि 2011 तक वे सीपीआई(एम) के सदस्य थे, जब राज्य में 34 साल का लेफ्ट शासन खत्म हुआ.
“मैं सीपीआई(एम) के साथ था… मैं करीब 20 साल तक सीटू (पार्टी से जुड़ा विंग ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस) का सेक्रेटरी रहा, यहां तक कि 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी,” वे अपनी दुकान ‘इस्लामपुर हार्डवेयर’ में बैठकर दिप्रिंट को बताते हैं.
करीब 2012 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस जॉइन कर ली और तब से हर चुनाव में उसी को वोट दिया. शफीकुल इस्लाम कहते हैं कि उन्हें धोखा महसूस हुआ जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने पहले विरोध करने के बाद पिछले साल के आखिर में केंद्र के वक्फ (संशोधन) कानून को राज्य में लागू कर दिया.
“हमें यह पसंद नहीं आया. जब केंद्र यह कानून लाया था तब वह हमारे साथ थीं, विरोध कर रही थीं. लेकिन फिर उन्होंने यू-टर्न ले लिया,” वे कहते हैं. “इस बार हम अभी सोच रहे हैं कि किसे वोट दें… अधीर बाबू लंबे समय बाद यहां से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. वह अच्छे आदमी हैं और अपने क्षेत्र के लोगों का ख्याल रखते हैं. फिर हुमायूं कबीर की पार्टी भी है.”
वह कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी की बात कर रहे थे, जो बहारामपुर से पांच बार सांसद रह चुके हैं और 35 साल बाद इस बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं.
दूसरे व्यक्ति जिनका उन्होंने जिक्र किया, वे पूर्व तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर हैं, जिन्होंने पिछले साल अपनी पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी (एजुप) बनाई. इस विधानसभा चुनाव में एजुप ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ गठबंधन किया है और दोनों मिलकर 294 में से 190 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं.

“एजुप नई पार्टी है. हुमायूं साहब पहले तृणमूल में थे. वह यहां बाबरी मस्जिद भी बनवा रहे हैं,” शफीकुल इस्लाम कहते हैं.
कबीर ने पिछले दिसंबर में घोषणा की थी कि उनका ट्रस्ट बेलडांगा में एक मस्जिद बनाएगा, जो उत्तर प्रदेश के अयोध्या में गिराई गई बाबरी मस्जिद की तरह होगी.
मस्जिद की जगह पर तैयारी का काम शुरू हो चुका है और इससे समुदाय में काफी चर्चा है. सिर्फ पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि असम जैसे आसपास के राज्यों से भी मुसलमान हर दिन बड़ी संख्या में यहां आ रहे हैं.

दुविधा
शफीकुल इस्लाम कहते हैं कि ‘दीदी’ यानी ममता बनर्जी द्वारा कबीर को मस्जिद बनाने की घोषणा के बाद तृणमूल से निलंबित करना समुदाय के कई लोगों को अच्छा नहीं लगा.
“अगर दीदी सरकारी पैसे से दीघा में जगन्नाथ मंदिर बनवा सकती हैं, तो ठीक है. लेकिन अगर मुसलमान मस्जिद बनाएं तो समस्या क्यों?” वे पूछते हैं.
यह भावना सिर्फ मुर्शिदाबाद ही नहीं, बल्कि कूचबिहार से मालदा और नदिया, उत्तर 24 परगना से कोलकाता और नंदीग्राम जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी देखने को मिली, जहां दिप्रिंट गया.
हैरानी की बात यह है कि लोग एजुप के बारे में भी जानते हैं, जबकि यह पार्टी सिर्फ तीन महीने पहले दिसंबर 2025 में बनी है.
और यही शफीकुल इस्लाम की दुविधा है.
“इस बार मुर्शिदाबाद में फैसला आसान नहीं है. मैं अपने समुदाय के बुजुर्गों से बात कर रहा हूं. वे भी इसी स्थिति में हैं. डर है कि अधीर बाबू और हुमायूं साहब के चुनाव में होने से मुस्लिम वोट बंट सकते हैं. इससे बीजेपी को फायदा होगा,” वे बताते हैं.
वे कहते हैं कि यह सिर्फ मालदा और मुर्शिदाबाद तक सीमित नहीं रहेगा—जहां क्रमशः 51 प्रतिशत और 66 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी है—बल्कि दूसरे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी ऐसा हो सकता है.
2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2.4 करोड़ से ज्यादा मुसलमान हैं, जो 9 करोड़ की कुल आबादी का 27 प्रतिशत हैं, और 2011 में लेफ्ट सरकार गिरने के बाद से ज्यादातर तृणमूल के समर्थक रहे हैं.
मुर्शिदाबाद के खरग्राम गांव के रहने वाले अमिनाल इस्लाम कहते हैं कि मस्जिद की घोषणा के बाद बने माहौल के कारण कबीर की पार्टी को कुछ मुस्लिम वोट मिलेंगे.
“उनकी (कबीर की) अभी इतनी पकड़ नहीं है कि वह बड़े स्तर पर मुस्लिम वोट ले सकें,” वे अपने परिवार के साथ बेलडांगा मस्जिद स्थल देखने आए थे. “इस बार मुकाबला कड़ा होगा, जहां हर वोट मायने रखेगा. अगर बीजेपी को रोकना है, तो मुस्लिम वोट तृणमूल के साथ एकजुट होने होंगे. यह होगा या नहीं, अभी साफ नहीं है. चुनाव के करीब आते-आते तस्वीर साफ होगी.”
कबीर खुद मुर्शिदाबाद की दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं.
मालदा के रहने वाले गियासुद्दीन मोडल, जिनकी बहारामपुर के कदबेलतला में एक छोटी हार्डवेयर की दुकान है, कहते हैं कि यह कहना मुश्किल है कि बंगाल में कौन सी पार्टी मजबूत स्थिति में है. “लेकिन हम एक बात समझते हैं कि हुमायूं (कबीर) मुस्लिम भावनाओं के साथ खेल रहे हैं.”

साफीकुल कहते हैं कि समुदाय के बुजुर्ग इस पर पहले से चर्चा कर रहे हैं, खासकर राज्य में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) अभियान के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बाद.
उदाहरण के लिए, मुर्शिदाबाद में लगभग 18 लाख मतदाताओं में से 4.55 लाख नाम हटाए गए हैं. मालदा में 27 लाख मतदाताओं में से करीब 2.39 लाख नाम हटाए गए हैं. उत्तर दिनाजपुर में 1.76 लाख नाम हटाए गए हैं.
हालांकि चुनाव आयोग हटाए गए लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं करता, लेकिन मालदा और मुर्शिदाबाद के जिला प्रशासन के अधिकारी कहते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम अल्पसंख्यक समुदाय के हैं.
वहीं, तृणमूल के मुर्शिदाबाद जिला अध्यक्ष और कांडी के विधायक अपूर्बा सरकार मुस्लिम वोटों के बंटने की बात से सहमत नहीं हैं.
“एजुप कोई फैक्टर नहीं है. और कांग्रेस की बंगाल में मौजूदगी अब सिर्फ कुछ इलाकों जैसे मालदा और मुर्शिदाबाद तक सीमित है. वहां भी उसका असर कम हो रहा है,” वे कहते हैं.
सरकार कहते हैं कि मुस्लिम वोटों में थोड़ी कमी आ सकती है क्योंकि कुछ नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं. “लेकिन इससे कुल आंकड़ों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा… मुस्लिम वोट एकजुट हैं और हमारे साथ ही रहेंगे,” वे दावा करते हैं.
ध्रुवीकरण ज्यादा है
पश्चिम बंगाल के अलग-अलग जिलों में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण बढ़ गया है, खासकर उन इलाकों में जहां दोनों समुदायों की अच्छी-खासी आबादी है. राजनीतिक विश्लेषकों और तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस जैसे दलों के नेताओं का कहना है कि इसका असर इस बार चुनाव के नतीजों पर भी पड़ेगा.
उत्तर बंगाल के कूचबिहार जिले के मेखलीगंज कस्बे में रहने वाले 48 साल के अमित कुमार सिंघा, जो एक छोटी अखबार एजेंसी चलाते हैं, कहते हैं कि पिछले डेढ़ साल में उनके इलाके जमालदाहा में 2-3 छोटे साम्प्रदायिक तनाव के मामले हुए हैं.
“जमालदाहा में हिंदू-मुस्लिम आबादी का अनुपात 70:30 है. यहां के मौजूदा विधायक तृणमूल से हैं. लेकिन अगर आज आप मुझसे पूछें, तो मैं कहूंगा कि यहां के लोग अब बीजेपी की तरफ ज्यादा झुक रहे हैं. उन्हें लगता है कि आज के हालात में एक हिंदू पार्टी बेहतर विकल्प होगी,” सिंघा दिप्रिंट को बताते हैं.
कूचबिहार जिले में और मालदा, मुर्शिदाबाद और नंदीग्राम के हिंदू बहुल इलाकों में अभी भी सड़कों और बाजारों में छोटे-छोटे केसरिया झंडे लगे दिखते हैं, जो पिछले महीने राम नवमी के मौके पर लगाए गए थे.

राम नवमी की शोभायात्राएं पूरे राज्य में बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं. पिछले महीने बंगाल के शहरों और गांवों में हजारों छोटी रैलियां निकाली गईं, जिनमें ज्यादातर युवा शामिल थे.
इन जुलूसों के दौरान मुर्शिदाबाद में कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएं भी हुईं. 27 मार्च को जंगीपुर के रघुनाथगंज में एक जुलूस के दौरान झड़प हो गई. इसमें 20 से ज्यादा लोग घायल हुए और करीब 31 लोगों को गिरफ्तार किया गया.
मालदा दक्षिण से कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी कहते हैं कि अगर 2021 की तरह ध्रुवीकरण हुआ, तो जिले में कांग्रेस के लिए स्थिति मुश्किल हो जाएगी, जहां पार्टी की अभी भी कुछ मौजूदगी है.
खान ध्रुवीकरण के लिए तृणमूल और कांग्रेस दोनों की “तुष्टिकरण नीति” को जिम्मेदार ठहराते हैं.
“अगर ध्रुवीकरण बढ़ता है, तो कांग्रेस के वोट प्रभावित होंगे, जैसे 2021 में हुए थे, जब NRC और CAA के विरोध के कारण ऐसा हुआ था. मैं सुजापुर सीट से 1.3 लाख से ज्यादा वोटों से हार गया था, जबकि यह सीट चौधरी परिवार का गढ़ मानी जाती है,” वे कहते हैं.
खान ने 2024 का लोकसभा चुनाव 1 लाख से ज्यादा वोटों से जीता था.
मालदा के सुजापुर विधानसभा क्षेत्र में इस महीने की शुरुआत में लोगों के नाम बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट से हटाए जाने के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ. 1 अप्रैल को गुस्साई भीड़ ने वोटर लिस्ट के एसआईआर काम में लगे 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया था. इस मामले की जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी कर रही है.
5 अप्रैल को कूचबिहार में बीजेपी के चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तृणमूल पर आरोप लगाया कि वह “घुसपैठियों” को बचाने के लिए एसआईआर का विरोध कर रही है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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