Sunday, 3 July, 2022
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तेलंगाना में चुनावी हार और BJP के खतरे से सावधान KCR मोदी पर साध रहे हैं निशाना

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हाल ही के चुनावों में टीआरएस को मिली हार और लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन के बाद केसीआर खतरा महसूस कर रहे हैं.

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हैदराबाद: तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव चिंतित हैं. बीजेपी उनके राज्य में धीरे-धीरे मजबूत हो रही है. वहीं, पिछले दो सालों में उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को स्थानीय चुनावों और उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संख्या बल के हिसाब से तेलंगाना में बीजेपी अब भी टीआरएस से बहुत दूर है. लेकिन, बीजेपी की धीमे ही सही लगातार बढ़ रही ताकत, केसीआर को यह एहसास कराने के लिए काफी है कि बीजेपी को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

शायद यही वजह है कि केसीआर पिछले कुछ हफ्तों से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी पर इस तरह से हमलावर हैं. उन्होंने नवंबर 2021 के बाद से ही बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. पहली बार खुले तौर पर उनका विरोध तब सामने आया, जब वह बीजेपी नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के खिलाफ धान खरीद के मुद्दे पर सड़कों पर उतरे थे.

इसके बाद से वह बीजेपी पर लगातार आक्रामक हैं. उन्होंने बीजेपी पर धर्म की राजनीति करके देश को तोड़ने से लेकर मोदी सरकार पर देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने का आरोप लगाया है. वह लगातार केन्द्र सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं.

हाल ही में उन्होंने केन्द्रीय बजट को लेकर प्रधानमंत्री को ‘अदूरदर्शी’ बताया और कहा कि बीजेपी को ‘सत्ता से हटाकर बंगाल की खाड़ी में डुबो देना चाहिए.’

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इस बीच, पीएम मोदी ने गुरुवार को केसीआर को फोन करके जन्मदिन की बधाई दी. यह एक अप्रत्याशित घटना थी और सुर्खियों में आ गई.

वरिष्ठ राजनीतिक विशेषज्ञ प्रोफेसर नागेश्वर राव कहते हैं, ‘केसीआर को समझ में आ गया है कि तेलंगाना में बीजेपी देर-सवेर मुख्य विपक्षी पार्टी बन सकती है. अगर वह अभी इसे (बीजेपी) नहीं रोकते हैं, तो आनेवाले समय में उनके लिए दिक्कतें बढ़ सकती हैं. इसलिए, वह इतने आक्रामक हो रहे हैं.’


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सिलसिलेवार हमला

केसीआर से मिल पाना कभी पार्टी के सदस्यों के लिए भी मुश्किल था. बदले हालात में, अब वह लगातार मीडियाकर्मियों और लोगों से मिल रहे हैं. वह सिर्फ़ मोदी और बीजेपी पर ही हमलावर हैं. चर्चा है कि पिछली बार की तरह राज्य में ‘समय से पूर्व’ चुनाव हो सकते हैं. साल 2018 में केसीआर के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश के बाद, विधानसभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया गया था.

केसीआर ने मोदी सरकार की ओर से पेश किए गए बजट की आलोचना करते हुए उसे ‘गोलमाल’ बताया और सरकार पर ‘किसान विरोधी और गरीब विरोधी’ होने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘बजट को गोलमाल बजट कहा जा सकता है. इसमें कोई तथ्य नहीं है. कृषि क्षेत्र को जो कुछ दिया गया है वह एक बड़ा शून्य हैं. बजट में हथकरघा उद्योग को देने के लिए कुछ नहीं है. बजट से कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों में निराशा हुई है.’

उन्होंने कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बजट में आयकर स्लैब में बदलाव नहीं किया गया है. केंद्र सरकार ने कर्मचारियों और कारोबारियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. बजट से यह साफ तौर पर पता चलता है कि केंद्र ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की अनदेखी की है.

उन्होंने मोदी के ‘वेशभूषा बदलने’ की आलोचना करते हुए कहा कि पीएम ‘चुनाव के लिए अपनी पोशाक’ बदलते हैं. ‘विकास का गुजरात मॉडल’ का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने उसे ‘ऊपर शेरवानी, अंदर परेशानी’ कहा. केसीआर अपने मजाकिया अंदाज के लिए भी जाने जाते हैं.

इसके साथ ही, उन्होंने मोदी सरकार पर कोविड संकट से निपटने में विफल रहने का भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ‘इस सरकार के कुप्रबंधन की वजह से पवित्र गंगा नदी में लोगों की लाश तैरते दिखे.’

एक अन्य प्रेस वार्ता में उन्होंने संविधान को फिर से लिखने पर जोर देते हुए कहा कि यही एकमात्र तरीका है जिससे समवर्ती सूची के नाम पर राज्य सरकार से शक्तियां छीनने से केन्द्र सरकार को रोका जा सकता है.

बजट के कुछ दिनों बाद ही हैदराबाद में पीएम मोदी के पहुंचने पर केसीआर ने उनके साथ किसी भी कार्यक्रम में मंच साझा नहीं किया. टीआरएस नेताओं ने दिप्रिंट को इसकी वजह बताया कि मुख्यमंत्री राव को ‘बुखार’ हो गया था. 5 फरवरी को पीएम मोदी के तेलंगाना के शमशाबाद में पहुंचने पर टीआरएस नेताओं ने सोशल मीडिया कैंपेन में पीएम मोदी पर फंड जारी करने और प्रोजेक्ट देने को लेकर तेलंगाना के खिलाफ भेदभाव करने का आरोप लगाया. मोदी 11वीं शताब्दी के भक्ति संत श्री रामानुजाचार्य की प्रतिमा का अनावरण करने के लिए शहर में थे.

टीआरएस के चार राज्यसभा सांसदों ने 10 फरवरी को राज्यसभा के सभापति और भारत के उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू को एक नोटिस जारी किया. इसमें पीएम मोदी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की मांग की गई है. टीआरएस सांसद प्रधानमंत्री के उस बयान से नाराज हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2014 को ‘हड़बड़ी’ में पास किया गया था.


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चुनाव में बीजेपी से हार

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हाल ही के चुनावों में टीआरएस को मिली हार और लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन के बाद केसीआर खतरा महसूस कर रहे हैं.

लोकसभा चुनाव 2019 में निजामाबाद सीट टीआरएस के हाथ से निकलने के बाद पार्टी की चिंता बढ़ गई. यहां से केसीआर की बेटी कविता चुनाव लड़ रही थी. उन्हें बीजेपी के डी अरविंद ने हराया है. पांच साल पहले हुए चुनाव में इसी सीट से कविता ने 1.67 लाख के बड़े अंतर से चुनाव में जीत दर्ज की थी.

प्रोफेसर राव बताते हैं, ‘जब 2014 में केसीआर सत्ता में आये, तब कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी थी. चुनाव में तेलुगु देशम पार्टी के साथ गठबंधन में होने के बावजूद, बीजेपी सिर्फ़ पांच सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई. केसीआर के पहले शासनकाल में बीजेपी का कोई खास प्रभाव नहीं था.’ वह कहते हैं कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, वह सिर्फ़ एक सीट ही जीत पाई और पार्टी को पिछली बार जीती गई चार सीटें भी गंवानी पड़ी. साल 2016 में ग्रेटर हैदराबाद म्यूनिशिपल कॉरपोरेशन (जीएचएमसी) के चुनावों में भी बीजेपी की स्थिति बेहद कमजोर थी. वहीं, टीआएस 99 सीटें जीतने में कामयाब रही. वह कहते हैं, ‘ऐसे में केसीआर ने मोदी पर कभी निशाना नहीं साधा.’

साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में राजनीतिक समीकरण बदल गए. राजनीतिक मामलों के एक जानकार ने कहा, ‘2018 के विधानसभा चुनाव में सात फीसदी वोट के साथ एक सीट जीतने वाली बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में 20 फीसदी वोट पाने में कामयाब रही.’

यहां तक कि बीजेपी ने कविता को हराया और टीआरएस के गढ़ रहे उत्तरी तेलंगाना में भी जीत दर्ज करने मे कामयाब रही. उन्होंने कहा, ‘तब भी (2019 में), केसीआर को शायद इस बात का अहसास नहीं था कि बीजेपी उनके राज्य में मजबूत हो रही है. उन्हें लगा होगा कि बीजेपी को राष्ट्रीय मुद्दों और फरवरी में पुलवामा हमले के असर की वजह वोट मिल रहे हैं.’

राव कहते हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद से टीआरएस लगातार बीजेपी से हार रही है, जिसके बाद केसीआर ने खतरों को महसूस किया है.

नवंबर 2020 में टीआरएस को पहली बार धक्का तब लगा जब उसे डुबक्का उपचुनाव में बीजेपी से शिकस्त मिली. इसी साल जीएचएमसी चुनाव में भी बीजेपी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. साल 2016 चुनाव के मुकाबले उसे इस बार दस गुनी ज़्यादा सीटें मिली हैं. वहीं, सतारूढ़ टीआरएस सिर्फ़ 55 सीटें ही जीत पाने में कामयाब रही.

प्रोफेसर राव ने कहा ने कहा कि पिछले साल हुजूराबाद उप-चुनाव में बीजेपी से हारने के बाद, टीआरएस को एक और बड़ा झटका लगा. इस चुनाव में केसीआर और टीआरएस ने चुनाव जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी.

उन्होंने कहा, ‘जीएचएमसी चुनाव में बीजेपी की जीत ने इस मान्यता को खत्म कर दिया कि पार्टी सिर्फ़ लोकसभा चुनावों में ही जीतती है या पुलवामा हमले की असर की वजह से जीती थी.’

राजनीतिक विश्लेषक पलवाई राघवेन्द्र रेड्डी ने दिप्रिंट से कहा, ‘हो सकता है कि केसीआर को लगा हो कि बीजेपी तेलंगाना में तेजी से मजबूत हो रही है. चुनावों में टीआरएस को मिल रही हार से टीआरएस और केसीआर के समर्थकों में पक्के तौर पर यह संदेश जाएगा कि पार्टी बीजेपी से मुकाबले के लिए तैयार नहीं है. देर-सवेर उन्हें बीजेपी से मोर्चा लेना ही था.’

आनेवाले संकट को देखते हुए, तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने मोदी सरकार से मोर्चा लेने के लिए गैर-बीजेपी फ्रंन्ट बनाने की बात फिर से शुरू कर दी है.

पिछले हफ्ते जलगांव में एक मीटिंग में केसीआर ने केन्द्र सरकार की ओर से उर्जा क्षेत्र में किए गए बदलावों की आलोचना करते हुए कहा, ‘अगर आप मुझे आशीर्वाद दें तो मैं दिल्ली जाने के लिए तैयार हूं और किले पर धावा बोलने को तैयार हूं. नरेन्द्र मोदी सावधान रहें.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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