चित्रण: सोहम सेन/दिप्रिंट
Text Size:

नई दिल्ली: कर्नाटक के नवनियुक्त मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई, वंशवादी राजनीति को लोकतंत्र का ‘सबसे बड़ा दुश्मन’ बताने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में वंशवादी नेताओं की लंबी सूची में शामिल एक नया नाम हैं.

बसवराज के पिता एस.आर. बोम्मई, 1988-89 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे थे, जिससे अब यह एच.डी. देवेगौड़ा और एच.डी. कुमारास्वामी के बाद कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाली पिता-पुत्र की दूसरी जोड़ी बन गई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वंशवादी राजनीति पर हमला करते हुए कहते रहे हैं कि यह लोकतंत्र में तानाशाही के एक नए रूप को जन्म देता है और अक्षमता के साथ देश पर बोझ बढ़ाता है.

लेकिन राजनीतिक उत्तराधिकारियों के प्रति उनकी यह नापसंद भी वंशवादियों के भाजपा या उनके अपने मंत्रियों की टीम में शामिल होने में आड़े नहीं आई. उनके अपने मंत्रिमंडल में शामिल कई प्रमुख चेहरे राजनीतिक परिवारों से आते हैं—जिनमें पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, अनुराग ठाकुर, निर्मला सीतारमण, किरण रिजिजू और ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल हैं.

जब भी पार्टी के भीतर वंशवादियों को बढ़ाने और उन्हें विपक्षी खेमों से आयात करने की बात आई तो भाजपा ने एक व्यावहारिक दृष्टिकोण ही अपनाया है. पिछले महीने, भाजपा ने प्रमुख कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद का पार्टी में स्वागत किया.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ऐन पहले सीएम ममता बनर्जी के पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी और उनके पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिशिर अधिकारी को भी भाजपा में जगह दी गई. शुभेंदु अधिकारी राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता बने हैं.

हालांकि, भाजपा नेता इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी पार्टी कहती कुछ है और करती कुछ और है.

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा, ‘इस पर ध्यान देना जरूरी है कि किसी पार्टी में कमान कौन संभाल रहा है. अमित शाह जी अध्यक्ष हुआ करते थे. अब अमित शाह जी के बेटे नहीं जेपी नड्डा जी हैं. आपकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण आपको कोई पद नहीं मिलता है. अनुराग ठाकुर का ही उदाहरण ले लीजिए जिन्होंने अपनी राह खुद बनाई है. उनके पिता अब मुख्यमंत्री नहीं हैं. लेकिन अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने जगह बनाई है.’

आरपी सिंह ने कहा, ‘जहां तक राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा की बात है, तो उनके पास सत्ता की ताकत मां, पिता और दादी की वजह से है. बोम्मई अपनी राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण वहां नहीं हैं. उनकी क्षमताएं देखकर उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर चुना गया है. अंततः तो राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता ही निर्णायक फैक्टर होती है.


यह भी पढ़ें: मैच जीतने पर 10 सेकेंड तक सब भूल गई थीं सिंधू, बोलीं- फिर खुद को संभाला और जश्न मनाते हुए चिल्लाई


वंशवाद पर बहस

2014 में लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के तत्कालीन उम्मीदवार मोदी ने राहुल गांधी को ‘शहजादा’ और तत्कालीन यूपीए सरकार को ‘दिल्ली सल्तनत’ करार देते हुए गांधी परिवार पर ताना मारा था.

मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने अभियान के दौरान समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की जोड़ी का जिक्र करते हुए भी कहा था, ‘जहां मां और बेटे की सरकारों ने देश को तबाह कर दिया, वहीं उत्तर प्रदेश को पिता-पुत्र की सरकार ने बर्बाद कर दिया.’

मोदी और उनकी पार्टी के सहयोगियों ने वंशवादी संस्कृति को बढ़ावा देने को लेकर विपक्षी दलों के खिलाफ हमलावर रुख अपना रखा है, जबकि प्रमुख राजनीतिक परिवारों के सदस्य भाजपा में शामिल हो रहे हैं और आगे भी बढ़ रहे हैं.

दिप्रिंट ने 2019 में जानकारी दी थी कि भाजपा के लगभग 11 प्रतिशत सांसदों- 45 सदस्य की पृष्ठभूमि वंशवाद की राजनीति से जुड़ी है.

2019 के महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में तो मानों भाजपा और कांग्रेस के बीच इसकी होड़ ही लगी थी कि कौन कितने राजनीतिक वंशजों को मैदान में उतारेगा. भाजपा ने महाराष्ट्र और हरियाणा में राजनीतिक परिवारों से जुड़े 29 लोगों को मैदान में उतारा जिनमें 17 ने जीत हासिल की. इस मामले में कांग्रेस का आंकड़ा 36 में से 21 का था.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने कहा, ‘भाजपा में दुष्यंत, पंकज सिंह, अनुराग ठाकुर, पूनम महाजन, जयंत सिन्हा, प्रवेश वर्मा आदि के बाद भी राजनीतिक वंशजों की जैसे कमी पड़ गई हो तो वह अन्य दलों से भी वंशवादियों को ला रहे हैं. अब उनके पास बोम्मई के रूप में एक और वंशवादी कर्नाटक का मुख्यमंत्री है.’

उन्होंने कहा, ‘पार्टी के अपने और दूसरी पार्टियों से आयातित वंशवादियों को मिलाकर भाजपा के पास कांग्रेस की तुलना में अधिक राजनीतिक वशंज हैं. उन्हें कांग्रेस के खिलाफ वंशवादी राजनीति के इस पुराने हथकंडे का इस्तेमाल करना बंद कर देना चाहिए. यह एक पाखंड और उबाऊ बन चुका है.’


यह भी पढ़ें: ऑस्ट्रेलिया को 1-0 से हराकर पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंची भारतीय महिला हॉकी टीम


क्या कोई अंतर है?

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा ने बताया कि अगर पिछली तीन लोकसभाओं की स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो करीब 30 प्रतिशत सांसद राजनीतिक परिवारों से आते हैं.

वर्मा ने कहा, ‘भाजपा और सीपीएम जैसी कैडर-आधारित पार्टियों में वंशवाद का प्रतिनिधित्व थोड़ा कम तो है लेकिन फिर भी इन पार्टियों में ऐसे नेताओं की संख्या अच्छी-खासी है जिनका संबंध राजनीतिक परिवारों से है.’

उन्होंने कहा, ‘जहां तक ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे राजनीतिक वंशजों को शामिल करने या कर्नाटक में मुख्यमंत्री के रूप में बी. बोम्मई को आगे बढ़ाने का सवाल है, राजनीतिक वंशवाद पर हमला करने की भाजपा और मोदी की राजनीति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है. भाजपा तब तक राजनीतिक वंशजों को शामिल करती रहेगी जब तक वह ऐसे नेताओं को अपने साथ लाकर उनका फायदा उठा सकती है. साथ ही वे वंशवादी संस्कृति के लिए राहुल गांधी और क्षेत्रीय दलों पर हमले भी करते रहेंगे.’

हालांकि, वर्मा ने वंशवाद की अहमियत के संदर्भ में भाजपा और विपक्षी दलों के बीच अंतर की ओर भी इशारा किया.

उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल स्वभाव से वंशवादी हैं यानी पार्टी संगठन एक ही परिवार की तरफ से चलाया जाता है. उदाहरण के तौर पर समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस या द्रमुक के मामले में पार्टी अध्यक्ष (या मुख्य नेता) और इसके अलावा नामित मुख्यमंत्री तक एक ही परिवार से आते हैं.’

साथ ही कहा, ‘जहां तक भारतीय लोकतंत्र पर राजनीतिक वंशवाद के प्रभाव की बात है तो राजनीतिक पार्टियों की तरफ से राजनीतिक परिवारों से जुड़े लोगों को जितनी ज्यादा तवज्जो दी जाती रहेगी, आम लोगों के लिए चुनावी राजनीति में प्रवेश करना उतना ही अधिक कठिन हो जाएगा क्योंकि राजनीतिक परिवारों के पास ऐसे सभी संसाधनों तक पहुंच आसान होती है जो उन्हें फायदे की स्थिति में रखते हैं.


यह भी पढ़ें: झारखंड SIT ने ‘सेडेटिव’ को माना जिम्मेदार, धनबाद के जज की मौत के पीछे ‘कोई साजिश नहीं’ होने का दावा


भाजपा में वंशवाद

दिप्रिंट ने यहां 25 ऐसे प्रमुख नामों को चुना है जो भाजपा में वंशवाद की एक लंबी सूची का हिस्सा हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री

सिंधिया दिवंगत पूर्व कांग्रेस नेता और केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया के पुत्र और जनसंघ/जनता पार्टी/भाजपा की कद्दावर नेता रहीं दिवंगत विजयाराजे सिंधिया के पोते हैं. वह केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हैं. उन्होंने पिछले साल मार्च में कांग्रेस के खिलाफ बगावत की और मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार को गिराकर 22 कांग्रेस विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए.

अनुराग ठाकुर, केंद्रीय मंत्री

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण, युवा मामले और खेल मंत्री हैं, वह हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र हैं.

पीयूष गोयल, केंद्रीय मंत्री

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, उपभोक्ता मामले और खाद्य और सार्वजनिक वितरण और कपड़ा मंत्री गोयल भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय वेद प्रकाश गोयल के पुत्र हैं.

धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय मंत्री

केंद्रीय शिक्षा मंत्री और कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री प्रधान एक भाजपा नेता देबेंद्र प्रधान के पुत्र हैं, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री के तौर पर काम किया था.

किरण रिजिजू, केंद्रीय मंत्री

उन्हें हाल ही में विधि एवं न्याय मंत्री बनाया गया है और वह रिनचिन खारू के पुत्र हैं, जो अरुणाचल प्रदेश के पहले प्रोटेम स्पीकर थे.

निर्मला सीतारमण, केंद्रीय मंत्री

उनके पति परकला प्रभाकर कांग्रेस के साथ थे और कांग्रेस के टिकट पर आंध्र प्रदेश के नरसापुर से विधानसभा चुनाव लड़कर जीतने में असफल रहे थे.

पेमा खांडू, मुख्यमंत्री

वह अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के पुत्र हैं.

शुभेंदु अधिकारी, पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता विपक्ष

वह पूर्व मंत्री और सांसद शिशिर अधिकारी के पुत्र हैं.

देवेंद्र फडणवीस, नेता विपक्ष, महाराष्ट्र विधानसभा

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री गंगाधरपंत फडणवीस के बेटे हैं, जो महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य थे. देवेंद्र की मौसी शोबा फडणवीस राज्य मंत्री थीं.

विवेक ठाकुर, सांसद

वह पांच बार के सांसद और जाने-माने चिकित्सक सी.पी. ठाकुर के पुत्र हैं, जो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहे थे.

नीरज शेखर, सांसद

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज समाजवादी पार्टी के राज्य सभा सांसद थे, लेकिन पाला बदलकर भाजपा में चले गए और फिर से उच्च सदन के सदस्य बन गए. वह जुलाई 2019 में भाजपा में शामिल हुए थे.

नबाम रेबिया, सांसद

अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस की तरफ से पूर्व अध्यक्ष रहे हैं और इनके भाई नबाम तुकी मुख्यमंत्री पद पर थे. रेबिया जून 2020 में भाजपा के टिकट पर राज्य सभा के लिए चुने गए.

प्रवेश वर्मा, सांसद

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं.

दुष्यंत सिंह, सांसद

वह राजस्थान के झालावाड़-बारां से लोकसभा सदस्य हैं और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र हैं.

पूनम महाजन, सांसद

वह मुंबई उत्तर मध्य से लोकसभा सांसद हैं और दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रमोद महाजन की बेटी हैं.

जयंत सिन्हा, सांसद

वह लोकसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के पुत्र हैं.

वरुण गांधी, सांसद

वह पीलीभीत से लोकसभा सदस्य हैं और साथ ही भाजपा सांसद मेनका गांधी के पुत्र हैं.

हीना गावित, सांसद

हीना गावित नंदुरबार निर्वाचन क्षेत्र से सांसद हैं. वह भाजपा और उसी क्षेत्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पूर्व विधायक विजयकुमार गावित की बेटी हैं.

सनी देओल, सांसद

उनके पिता धर्मेंद्र राजस्थान से भाजपा के सांसद रहे हैं.

रीता बहुगुणा जोशी, सांसद

वह उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं.

दीया कुमारी, सांसद

उनकी दादी महारानी गायत्री देवी सांसद रही थीं.

संगीता सिंह देव, सांसद

उनके पति, कनक वर्धन सिंह देव ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार में कैबिनेट मंत्री थे.

बी.वाई. राघवेंद्र, सांसद

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के पुत्र हैं.

प्रीतम मुंडे, सांसद

पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे की बेटी हैं.

पंकज सिंह, विधायक

पंकज सिंह उत्तर प्रदेश के नोएडा से विधायक हैं और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र हैं.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: मुलायम से मिले लालू, कहा- आज देश को पूंजीवाद, कम्युनलिज्म की नहीं, समाजवाद की जरूरत है


 

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

क्यों न्यूज़ मीडिया संकट में है और कैसे आप इसे संभाल सकते हैं

आप ये इसलिए पढ़ रहे हैं क्योंकि आप अच्छी, समझदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की कद्र करते हैं. इस विश्वास के लिए हमारा शुक्रिया.

आप ये भी जानते हैं कि न्यूज़ मीडिया के सामने एक अभूतपूर्व संकट आ खड़ा हुआ है. आप मीडिया में भारी सैलेरी कट और छटनी की खबरों से भी वाकिफ होंगे. मीडिया के चरमराने के पीछे कई कारण हैं. पर एक बड़ा कारण ये है कि अच्छे पाठक बढ़िया पत्रकारिता की ठीक कीमत नहीं समझ रहे हैं.

हमारे न्यूज़ रूम में योग्य रिपोर्टरों की कमी नहीं है. देश की एक सबसे अच्छी एडिटिंग और फैक्ट चैकिंग टीम हमारे पास है, साथ ही नामचीन न्यूज़ फोटोग्राफर और वीडियो पत्रकारों की टीम है. हमारी कोशिश है कि हम भारत के सबसे उम्दा न्यूज़ प्लेटफॉर्म बनाएं. हम इस कोशिश में पुरज़ोर लगे हैं.

दिप्रिंट अच्छे पत्रकारों में विश्वास करता है. उनकी मेहनत का सही वेतन देता है. और आपने देखा होगा कि हम अपने पत्रकारों को कहानी तक पहुंचाने में जितना बन पड़े खर्च करने से नहीं हिचकते. इस सब पर बड़ा खर्च आता है. हमारे लिए इस अच्छी क्वॉलिटी की पत्रकारिता को जारी रखने का एक ही ज़रिया है– आप जैसे प्रबुद्ध पाठक इसे पढ़ने के लिए थोड़ा सा दिल खोलें और मामूली सा बटुआ भी.

अगर आपको लगता है कि एक निष्पक्ष, स्वतंत्र, साहसी और सवाल पूछती पत्रकारिता के लिए हम आपके सहयोग के हकदार हैं तो नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें. आपका प्यार दिप्रिंट के भविष्य को तय करेगा.

शेखर गुप्ता

संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ

अभी सब्सक्राइब करें

VIEW COMMENTS