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स्वामी परिपूर्णानंद । फेसबुक
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कई प्रभावशाली हिंदू संतों ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए टिकट की मांग की है और बीजेपी को टटोलते हुए सन्देश भेज रहे है.

बेंगलुरू: कर्नाटक और तेलंगाना में कई प्रभावशाली हिंदू संत राजनीति में प्रवेश करने के लिए योगी आदित्यनाथ के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं.

दिप्रिंट को पता चला है कि वे 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं और पहले ही बीजेपी को सूचित कर चुके हैं. और पार्टी उन्हें शामिल करने की इच्छुक दिखती है.

‘मदिगा’ कारक

ऐसा एक मामला सेंट्रल कर्नाटक के चित्रदुर्ग ज़िले में श्री शिव शरण मदारा गुरु पीठ के मदारा चेनइया स्वामी का है. राज्य भाजपा इकाई के सूत्र ने कहा कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें 2019 के संसदीय चुनावों में उम्मीदवार के रूप में पेश करने पर विचार कर रहा है.

संत ने आरएसएस और बीजेपी की तरफ कभी भी झुकाव नहीं दिखाया. मई 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चित्रदुर्ग मठ का दौरा किया और आध्यात्मिक नेता के साथ बातचीत भी की थी.

मदारा चेनइया स्वामी दलित मदिगा समुदाय के एक युवा और सम्मानित नेता हैं. मदिगा बेल्लारी, चित्रदुर्ग, शिवमोगा, दावणगेरे और रायचूर, बीजापुर, बेलगावी और बीदर के उत्तरी ज़िलों में फैले लगभग 20 लोकसभा सीटों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

 


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मठ के अनुयायी सुरेश कुमार ने कहा कि “हालांकि स्वामी जी ने खुले तौर पर नहीं कहा कि वह चुनाव लड़ेंगे, लेकिन हम सभी के लिए यह सोचना स्वाभाविक है कि वह सही समय पर उम्मीदवार के रूप में आएंगे.”

मदारा चेनइया स्वामी ने दिप्रिंट को बताया कि अभी तक, कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है. उन्होंने कहा, “जब वे लोग (भाजपा) मुझसे संपर्क करेंगे, तो मैं अपने सभी भक्तों की राय लूंगा और फिर कोई निर्णय लूंगा.”

कर्नाटक भाजपा की रणनीति बहुत ही स्पष्ट है. ऐसी चाल मदिगा समुदाय के बीच पार्टी के वोटों को समेकित करने में मदद करेगा. पार्टी 2008 के विधानसभा चुनावों के दौरान मदिगा समुदाय के दिल में जगह बनाने में सफल हुई थी.

‘लव जिहाद ‘ संत

एक और संत जो राजीनीति में कदम रखने की इच्छा व्यक्त करते है वो है गुरुपुरा के वज्रदेही मठ के साधक राजशेखरन स्वामी. ये मठ तटीय कर्नाटक में मंगलुरु के पास स्थित है. उन्हें लोग ‘लव जिहाद स्वामी’ के नाम से जानते है क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील दक्षिणी कन्नड़ ज़िले में “लव जिहाद” से लड़ने के लिए एक विशेष कार्य बल स्थापित किया है.

संत का दावा है कि इस वर्ष की शुरुआत में विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने उनसे संपर्क किया था.

“मुझे चुनाव लड़ने में दिलचस्पी है.” राजशेखरनंद स्वामी ने दिप्रिंट को बताया कि “विधानसभा चुनावों के दौरान मुझे टिकट देने का प्रस्ताव था लेकिन फिर बीजेपी ने फैसला किया कि वह किसी भी संत को टिकट नहीं देगी. मुझसे इंतज़ार करने के लिए कहा था और अब उन्होंने संसदीय चुनावों के लिए बातचीत शुरू कर दी है. मेरा नाम फिर से प्रस्तावित किया गया है. हमें अब भी अंतिम निर्णय लेना है. ”

यह पूछे जाने पर कि क्या वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेरित है, उन्होंने कहा: “मुझे निश्चित रूप से लगता है कि मैं उनके स्थान तक पहुंच सकता हूं, लेकिन इसके लिए बहुत सारे काम और समर्पण की आवश्यकता होगी जिसके लिए मैं प्रयास करूंगा.”


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तेलंगाना के राजनीतिक पुजारी

तेलंगाना के काकीनाडा ज़िले के श्री पीठम मठ के स्वामी परीपुर्नानंद एक अन्य साधक हैं जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कि प्रशंसा करते है.

“संतों को इस देश के निर्माण में एक अहम भूमिका निभानी चाहिए क्योंकि वे समाज में धार्मिक मूल्यों को लाने के लिए समर्पित होते हैं. स्वामी परीपुर्नानंद कहते है कि “मेरे दृष्टिकोण से धर्म मज़हबी नहीं हैं, यह एक मूल्य है जो समाज को बनाए रखता है. संतों के लिए पहल करने और धर्म को सही तरीके से स्थापित करने का सही समय है”.

धार्मिक नेता के अनुसार, बीजेपी उन्हें टिकट देने के बारे में विचार-विमर्श कर रही है. और बातचीत पार्टी हाई कमांड तक पहुंच चकी है.

हिंदुत्व का विरोध करने वालों के खिलाफ उन्हें कठोर टिप्पणियों के लिए जाना जाता है,उन्होंने यह भी कहा है कि वह उन लोगों से नफ़रत करते हैं जो ‘भारत माता की जय’ कहने के लिए तैयार नहीं हैं. वे उम्मीद कर रहे है कि बीजेपी जल्द ही उन्हें अपने धड़े में शामिल करेगी.

अपने स्तर पर कर्नाटक भाजपा इकाई पार्टी में शामिल होने वाले विशिष्ट संतो पर कुछ नहीं कह रही है. इसके प्रवक्ता वामन आचार्य ने हालांकि कहा कि पार्टी सभी क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए खुली है और इसमें धार्मिक नेता भी शामिल है.

आचार्य ने कहा “हम विशेष रूप से सन्यासियों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं. अगर वे हमारे साथ आते हैं, तो हमें कोई समस्या नहीं होगी. “लेकिन हम उनका विरोध या समर्थन नहीं करते है. राजनीति एक ज़िम्मेदारी है जिसको कोई भी कर सकता है जो सभी धार्मिक ज़िम्मेदारियों से परे है. अगर वे (संत) काम कर सकते हैं, तो हम उनका स्वागत करते हैं क्योंकि हम लोकतंत्र में रहते हैं ”

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