Wednesday, 29 June, 2022
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बिहार NDA में घमासान शुरू, BJP की सांप्रदायिक राजनीति से नीतीश की JD(U) में फैली नाराज़गी

मदरसा धमाके पर शब्दों के बाण, दलितों पर हमले को लेकर बीजेपी की हालिया टिप्पणियां, और तथाकथित जबरन धर्मांतरण, इस बात के संकेत हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है.

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पटना: नीतीश कुमार को 7वीं बार, बिहार मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए सात महीने भी नहीं हुए, और राज्य के सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में, अंदरूनी कलह ज़्यादा मुखर होने लगी है. बड़ी सहयोगी बीजेपी सांप्रदायिक मुद्दे उठा रही है, जिससे नीतीश बहुत असहज हो रहे हैं, जो अपनी सेक्युलर छवि का बहुत ध्यान रखते हैं. जेडी(यू) का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार, पिछले चुनाव में जीत नहीं पाया था.

वरिष्ठ नेता भले ही बीजेपी और जेडी(यू) के बीच दरार की ख़बरों को ख़ारिज करते हों, लेकिन हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), केसरिया पार्टी पर बाण चला रहे हैं. हम और वीआईपी दोनों के, गठबंधन सरकार में चार-चार विधायक हैं.

कई नेताओं का मानना है, कि छोटे सहयोगियों की ओर से, बीजेपी की आलोचना में की जा रहीं बयानबाज़ियों के पीछे, नीतीश कुमार का आशीर्वाद है.

एक जेडी(यू) विधायक ने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, ‘मुख्यमंत्री बीजेपी के सांप्रदायिक राजनीति करने से असहज हैं. भले ही हमें मुसलमान वोट न मिले हों, लेकिन नीतीश कुमार बीजेपी की भगवा सियासत के साथ, जुड़ा हुआ दिखना नहीं चाहेंगे. नीतीश जी ने बार बार कहा है, कि हम सांप्रदायिकता को बर्दाश्त नहीं करेंगे’.

मदरसा धमाका

इसी हफ्ते बिहार के बांका ज़िले में, एक मदरसे के अंदर हुए एक धमाके ने, आग में घी का काम किया है. इन ख़बरों के बीच, कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) धमाके की जांच अपने हाथ में ले सकती है, जिसमें पास की मस्जिद के इमाम की मौत हो गई, और चार अन्य लोग घायल हुए. बांका एसपी अश्वनी गुप्ता ने बृहस्पतिवार को, किसी भी आतंकी संबंध को ख़ारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि वो धमाका, कंटेनर में रखे एक देसी बम की वजह से हुआ था.

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ज़िला प्रशासन ने बताया कि वो एक निजी मदरसा था, और राज्य सरकार का उससे कोई लेना-देना नहीं था.

लेकिन, धमाके के फौरन बाद विधायक हरिभूषण ठाकुर की अगुवाई में, बीजेपी नेताओं के एक वर्ग ने ये कहते हुए, राज्य के सभी मदरसों को बंद मांग उठाई, कि वहां पर ‘आतंकवादी पनप रहे हैं’.

उनकी टिप्पणियों के बाद, राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ज़मां ख़ान ने, बृहस्पतिवार को एक प्रेस कॉनफ्रेंस में ठाकुर की निंदा की.

इसके बाद ठाकुर के बयान की आलोचना करने के लिए, बीजेपी की बिहार इकाई ने एनडीए सहयोगियों ख़ासकर जीतन राम मांझी की ‘हम’ को आड़े हाथों लिया.

ख़ान ने दिप्रिंट से कहा, ‘हरिभूषण ठाकुर भाई समान हैं. लेकिन उन्हें कोई अधिकार नहीं है, कि राज्य में चल रहे हर मदरसे को, आतंकवाद का घर क़रार दें’.

ऐसा लगता है कि राज्य में बीजेपी सहयोगियों की आवाज़, पश्चिम बंगाल चुनावों में बीजेपी की हार के बाद, और मुखर हो गई है.

पूर्व सीएम मांझी, जिनकी पार्टी को नीतीश मंत्रिमंडल में एक अतिरिक्त सीट नहीं दी गई, मदरसा मामले पर बीजेपी के सबसे मुखर आलोचक रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘जब दलित शिक्षा हासिल करते हैं, तो उन्हें नक्सल बता दिया जाता है. जब मुसलमान ख़ुद को शिक्षित करते हैं, तो उन्हें उग्रवादी क़रार दे दिया जाता है’.

वीआईपी प्रमुख और मंत्री मुकेश साहनी ने, जो पूर्ण-कालिक एमएलसी सीट न दिए जाने से रोष में हैं, बीजेपी पर व्यंग किया. उन्होंने कहा, ‘अब समय है कि बयानबाज़ियां बंद की जाएं, और सुनिश्चित किया जाए कि सरकार, लोगों के कल्याण के लिए काम करे. 19 लाख नौकरियों का वादा, याद रखा जाना चाहिए’.


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बीजेपी बनाम जेडी(यू)

शब्दों की इस लड़ाई में आई तेज़ी से, एनडीए ख़ेमे में घबराहट फैल गई है, और पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने, सहयोगी दलों से अपील की है, कि एक दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयानबाज़ियां न करें.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘मतभेदों पर एक आंतरिक मंच पर चर्चा होनी चाहिए. ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयानबाज़ियों की बजाय, एनडीए साझीदारों को फिलहाल, कोविड-प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने का काम करना चाहिए’.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा, कि बिहार में नीतीश कुमार सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. लालू यादव के बड़े बेटे और आरजेडी नेता तेज प्रताप की, मांझी के साथ मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने कहा, ‘अगर कोई ज़बर्दस्ती किसी से मिलता है, तो इसका कोई मतलब नहीं है’.

लेकिन, मदरसा धमाके पर तकरार अकेला संकेत नहीं है, कि सत्तारूढ़ गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है. पिछले कुछ हफ्तों में भी, बीजेपी नेताओं ने नीतीश सरकार की आलोचना की है, और दलितों पर हुए हमलों, और तथाकथित धर्मांतरण की घटनाओं पर बयान जारी किए हैं.

4 जून को बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने शासन को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि दलितों तथा अति-पिछड़े वर्गों (ईबीसीज़) को, मुसलमानों की ओर से सताया जा रहा है, और पूरे राज्य में ऐसी घटनाओं की संख्या में इज़ाफा हुआ है. उन्होंने ये भी कहा कि सरकार को, इन घटनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए, और दलितों तथा ईबीसीज़ को संरक्षण देना चाहिए.

उसी दिन, बिहार के खान और भूविज्ञान मंत्री जनक राम ने, दलित कन्याओं के तथाकथित जबरन धर्मांतरण को लेकर, जमुई ज़िले के अधिकारियों को एक पत्र लिखा. 6 जून को, उन्होंने गोपालगंज ज़िले के अधिकारियों को पत्र लिखकर आरोप लगाया, कि एक दलित लड़की को अग़वा करके, उसकी एक मुसलमान से शादी कर दी गई है. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘मैंने पत्र लिखे हैं और उम्मीद है कि ज़िला प्रशासन कार्रवाई करेगा’.

नीति आयोग रिपोर्ट

नीति आयोग के संधारणीय विकास लक्ष्य (एसडीजी) सूचकांक 2020-21 ने भी, जिसमें बिहार का प्रदर्शन सबसे ख़राब आंका गया है, राज्य के नेताओं के बीच नाराज़गी पैदा की है.

रिपोर्ट की आलोचना करते हुए, वरिष्ठ जेडीयू नेता उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश सरकार के कामकाज का बचाव किया, और बिहार के लिए विशेष दर्जा दिए जाने की मांग की. इस मांग को मोदी सरकार को शर्मिंदा करने की, एक चाल के तौर पर भी देखा जा रहा है, चूंकि वो कभी किसी राज्य को, विशेष दर्जा देने के पक्ष में नहीं रही है, और 14वें वित्त आयोग ने इस श्रेणी को ख़त्म कर दिया है.

एक बीजेपी सांसद ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘बीजेपी नेता कहते हैं कि नीतीश सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. लेकिन क़रीब 15 साल तक नीतीश के साथ सत्ता में रहने के बाद, पार्टी को लगता है कि अब उसे, अपने सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए, उसमें विस्तार करना चाहिए. कुल मतदाताओं में 16 प्रतिशत दलित हैं, और 29 प्रतिशत ईबीसी हैं. अगर पार्टी को बिहार में एक बड़ी ताक़त बनकर उभरना है, तो उसे इन वर्गों में सेंध लगानी होगी’.


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