नई दिल्ली: असम गण परिषद यानी AGP, जो असम के विदेशी विरोधी आंदोलन से पैदा हुई पार्टी है और BJP के नेतृत्व वाले NDA की पुरानी सहयोगी है, सोमवार दोपहर 1.30 बजे तक 8 सीटों पर आगे थी, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन राज्य में फिर से सत्ता बनाए रखने की ओर बढ़ रहा था. AGP ने 126 विधानसभा सीटों में से 26 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी, जब वह NDA का हिस्सा थी, AGP ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 9 सीटें जीती थीं.
इस साल पार्टी ने मुस्लिम समुदाय के 13 उम्मीदवार भी मैदान में उतारे हैं और BJP तथा बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट यानी BPF के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है.
चुनाव आयोग की मतगणना के अनुसार, 1.30 बजे तक AGP के अध्यक्ष और राज्य मंत्री अतुल बोरा बोखाखाट सीट से 28,000 से ज्यादा वोटों से आगे थे. AGP के कार्यकारी अध्यक्ष और असम कैबिनेट में मंत्री केशब महंता, जो कालियाबोर से दोबारा उम्मीदवार थे, वे 16,000 से ज्यादा वोटों से आगे थे.
दीप्तिमयी चौधरी और पृथ्वीराज रवा, जिन्हें बोंगाईगांव और तेजपुर से दोबारा टिकट मिला था, वे क्रमशः 21,000 वोट और 1,000 वोटों से आगे थे.
प्रदीप हजारिका, जिनकी सीट परिसीमन के कारण अमगुरी से बदलकर शिवसागर कर दी गई थी, वे तीसरे स्थान पर पीछे चल रहे थे. राइजर दल के अखिल गोगोई पहले स्थान पर थे, उनके बाद BJP उम्मीदवार दूसरे स्थान पर थे.
करीम उद्दीन बरभुइया, जिन्होंने AIUDF से हटकर चुनाव से पहले AGP जॉइन की थी, वे सोनाई सीट से कांग्रेस उम्मीदवार से 16,000 से ज्यादा वोटों से पीछे चल रहे थे.
AGP का इतिहास
AGP लंबे समय से असमिया पहचान की रक्षा, क्षेत्रीयता, मूल निवासियों के अधिकारों और जमीन के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर देती रही है.
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी AASU के नेताओं ने, जिन्होंने असम में अवैध प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन चलाया था, 1985 में ऐतिहासिक असम समझौते के बाद AGP बनाई थी. इस समझौते ने आंदोलन खत्म किया था, जिसे AASU और ऑल असम गण संग्राम परिषद यानी AAGSP के तहत नागरिक संगठनों ने समर्थन दिया था. 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आंदोलन के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया था और इसी से यह समझौता हुआ था.
सरबानंद सोनोवाल, जो अब केंद्रीय मंत्री हैं, ने अपना राजनीतिक सफर AASU के छात्र नेता के रूप में शुरू किया था. फरवरी 2011 में उन्होंने AGP से इस्तीफा दिया, BJP में शामिल हुए और पांच साल बाद राज्य के मुख्यमंत्री बने.
समय के साथ कई AGP नेता BJP में शामिल हो गए, जिससे पार्टी कमजोर होती गई. जैसे-जैसे BJP की पकड़ और स्वीकार्यता बढ़ी, AGP का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया. अब अवैध प्रवासियों के खिलाफ अभियान में BJP सबसे आगे है.
AGP ने राज्य को दो मुख्यमंत्री दिए हैं. पहले हैं प्रफुल्ल कुमार महंता, जो 1985 में सिर्फ 33 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने और 1996 में फिर से इस पद पर आए. लेकिन इसके बाद पार्टी का ग्राफ गिरता चला गया.
1980 के दशक में AGP सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी ULFA नाम के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन को खुली छूट देने के आरोप भी लगे. बाद में 1990 में केंद्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया, क्योंकि कानून व्यवस्था बिगड़ गई थी और सरकार ULFA की बढ़ती हिंसा को रोक नहीं पा रही थी.
2001 में AGP ने विधानसभा चुनाव में BJP के साथ गठबंधन किया, लेकिन सिर्फ 20 सीटें जीत पाई. उस समय BJP जूनियर सहयोगी थी. 2006 में AGP की सीटें थोड़ी बढ़कर 24 हुईं, लेकिन 2011 में फिर घटकर सिर्फ 10 रह गईं.
2016 में AGP ने 14 सीटें जीतीं, लेकिन 2019 में वह BJP से नागरिकता संशोधन विधेयक यानी CAA (अब कानून) के मुद्दे पर अलग हो गई. हालांकि यह अलगाव ज्यादा समय नहीं चला और तीन महीने बाद दोनों पार्टियां फिर साथ आ गईं और 2021 के विधानसभा चुनाव में साथ लड़ीं.
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