Saturday, 25 June, 2022
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चंद्रबाबू नायडू: एक ऐसे चतुर राजनितिज्ञ हैं, जिन्होंने अपने ससुर तक को बेदखल करने में संकोच नहीं किया

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अपने कैरियर के दौरान, नायडू को जो भी ज्यादा फायेदमंद लगा, उसके लिए उन्होने दल बदल लिया, जिससे उनके विरोधी उन्हें ‘अवसरवादी’ की उपाधी देने लगे.

विजयवाड़ा: चन्द्रबाबू नायडू द्वारा संचालित टीडीपी का एनडीए को छोड़ देना बडी हैरत की बात हो सकती है. परन्तु जिन्होनें उनको एनडीए-1 में देखा था, उनके लिए बिल्कुल नहीं. जब ‘गोधरा दंगों’ पर उन्होने न केवल एनडीए का साथ छोड़ा था, बल्कि उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘मुस्लिम विरोधी’ मान कर उनके आंध्र प्रदेश प्रवेश करने पर गिरफ्तार करने की धमकी भी दी थी.

अपनी नवीनतम कार्यवाही में नायडू ने मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए से समर्थन वापिस ले लिया, जबकि उनके विरोधी, उन पर आंध्र प्रदेश की जनता को ‘धेखा देने व लूटने’ का इल्जाम लगा रहे हैं. परन्तु अगले चुनावों में केवल एक साल का समय बाकी होते हुए, नायडू ने अपना ‘गोल पोस्ट’ फिर से बदलने का सही मौका ढूँढ लिया है. यह सब उन्होनें मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के स्पेशल स्टेटस का दर्जा देने से इन्कार का आरोप लगाते हुए किया.

अपने कैरियर में, नायडू ने हमेशा अपने फायदे के लिए दल बदला, चाहे इसलिए उन्हें अपने ससुर व गुरू, एन. टी. रामा राव के खिलाफ भी जाना पड़ा.

नायडू तीसरे मोर्चे के संयोजक भी थे, जिसने 1996 में केन्द्र में सरकार बनाई और बाद में, 1999 में जिसने वफादारी बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए के लिए बदल ली. नायडू को हमेशा इस बात के लिए जाना जाता है कि वह अपने आप को ऐसे गठबन्धन में जोड़ते हैं जो उन्हें अधिकतम ताकत दे. इसी से उनके विरोधी उन्हें ‘अवसरवादी’ कहने लगे.

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भावनात्मक पत्तों का खेल

नायडू के इस नाटकीय प्रस्थान से उन्हें आगामी चुनावों में वोट इकट्ठे करने के लिए, एक भावनात्मक मुद्दा ढूढँने में मदद मिलने की आशा है. आंध्रा के सीएम ने राज्य विधानसभा में शुक्रवार को ऐलान किया, ‘हमने एनडीए छोड़ दी है. यह फैसला मैनें किसी स्वार्थ कारणों से नहीं किया, परन्तु आंध्र प्रदेश के हित के लिए किया है’.

उन्होनें कहा, ‘पिछले चार सालों में, मैने हर संभव कोशिश की, 29 बार दिल्ली गया, बहुत बार बात की. यह केन्द्र का आखिरी बजट था और इसमे आंध्र प्रदेश का कोई जिक्र नहीं था इसलिए हमें कैबिनेट से अपने मन्त्री निकालने पड़े’.
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के पति व नायडू के सलाहकार पराकला प्रभाकर ने कहा कि जिस तरह आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ है, उसमें कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए ने अन्याय किया था, इसलिए ‘टीडीपी’, ‘एनडीए’ में शामिल हुई थी. उन्होनें कहा, ‘बीजेपी ने इसे रद्द करने का वचन दिया था और हमें ‘स्पेशल केटेगरी स्टेटस देने की बात कही थी. हमने चार साल तक इंतजार किया है’.

हमें 18 वायदे दिखाए गये ….. यह आखिरी बजट था, पर अभी भी ‘पुर्नगठन अधिनियम’ में सम्मिलित कुछ भी, संतोषजनक रूप से लागू नहीं किया गया. इसलिए हमने गठबन्धन से बाहर निकलने का फैसला किया. क्या इसे आप अवसरवाद कहेंगें?’ उन्होनें पूछा. फिर भी, नायडू के आलोचक उनके मोदी के विरूद्ध स्टैंड बदलने की ओर इशारा करते हैं.

राजनीतिक विश्लेषक अमर देवुलापल्ली के अनुसार, ‘उन्होनें पिछले चार सालों तक बीजेपी को बर्दाशत क्यों किया ? उन्हें मालूम था कि वे आंध्र प्रदेश को ‘स्पेशल केटेगरी दर्जा नहीं देंगे.

जगन एक बड़ा कारण

विश्लेषकों का कहना है कि इस समय नायडु के ‘एनडीए’ से बाहर निकलने का बड़ा कारण, आंध्र प्रदेश में विपक्ष के नेता व ‘वाईएसआर कांग्रेस’ अध्यक्ष वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी की ‘पदयात्रा’ को मिला बड़ा रिस्पांस हो सकता है, जिसने मुख्यमंत्री को बेचैन कर दिया है.

इसलिए जब जगन ने शुक्रवार को अपना ‘अविश्वास प्रस्ताव’ (नो कोन्फीडैंस मोशन) आंध्र के ‘स्पेशल स्टेट्स’ मुद्दे पर ‘एनडीए’ सरकार के खिलाफ, लोकसभा स्पीकर को भेजा, तो नायडू ने स्वंयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए तेजी दिखाते हुए, ‘यूनियन कैबिनेट’ से अपने मंत्री निकाल लिए और साथ ही एनडीए को छोड़ दिया. इसके साथ ही बड़ी सूझ व नाटकीय ढंग से अपना ‘अविश्वास प्रस्ताव’ भेज दिया.

जगन ने सोशल मीडिया का सहारा लेते हुए कहा, ‘चाहे राजनीतिक दबाव के कारण ही, ‘टीडीपी’ को फिर से केन्द्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखने के लिए फिर से ‘वाईएसआरसीपी’ के दिखाए रास्ते का पीछा करना पड़ा.

एक सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होनें कहा, ‘स्पेशल केटेगरी स्टेटस के लिए जनता के समर्थन से ‘वाईएसआरसीपी’ की चार साल की लगातार लड़ाई व संघर्ष के बाद आखिरकार देश के साथ, चन्द्रबाबू नायडू की ‘टीडीपी’ भी जाग गई है’.

अनुभव का संग्राम

आम आदमी के लिए, नायडू को अभी भी एक दूरदर्शी नेता की तरह देखा जा सकता है. एक ऐसा व्यक्ति, जिसकी दुनिया भर के व्यापारी व निर्देशक प्रशंसा करते हैं. नायडू ने उनकी ‘स्पेशल स्टे्टस’ की मांग के मनोभाव को उत्तर देने के लिए अपने आप को तैयार किया है. इस कल्पना को चुनावों में खींच लाना बहुत फायदेमंद सिद्ध हो सकता है.

‘नायडू एक चतुर खिलाड़ी हैं. वह कांग्रेस से सभी 175 चुनाव क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने की बात, जगन के अवसरों को काटने के लिए कर सकते हैं’ देवलपल्ली ने कहा. वह नायडू के कैरियर के दूसरे नमूने की तरफ भी इशारा करते हैं कि उन्होनें हर बार राष्ट्रीय दल के साथ गठजोड़ से आंध्रा में जीत हासिल की, नहीं तो नहीं.

2004 व 2014 के बीच के सालों में, जब नायडू ने अपने बल पर चुनाव लड़ा, वह विपक्ष में बैठे. इसी कारण, पूर्व में कड़वे शब्दों के इस्तेमाल के बावजूद भी नायडू ने पुरानी असहमती खत्म करके 2014 में सहज ही मोदी के साथ गठजोड़ कर लिया. देवलपल्ली ने आगे कहा कि, ‘इसीलिए उन्हें पहले दर्जे का अवसरवादी नेता कहा जाता है’.

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