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कर्नाटक के मुख्यमंत्री शपथ लेने से पूर्व मंजुनाथ स्वामी पहुंचे | पीटीआई
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वोक्कालिगा मठों की परंपरागत यात्रा के अलावा मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कर्नाटक के अन्य प्रमुख लिंगायत समुदाय से जुड़े मठों का भी दौरा किया।

बेंगलुरू: ग्यारह मंदिर, चार लिंगायत और वोक्कालिगा मठ, एक चर्च और एक मस्जिद। कष्टदायक चुनाव सत्र के बाद गुरुवार को विश्वास मत का सामना करने वाले कर्नाटक के मुख्यमंत्री और जेडी (एस) प्रमुख एच.डी. कुमारस्वामी चार दिन पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित होने के बाद से एक बाद एक भगवान के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।

गौड़ा परिवार को एक धार्मिक परिवार माना जाता है जो पूरे दक्षिण भारत में पूजा का आयोजन करता है, लेकिन उनके परिचित भी इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि कुमारस्वामी के बड़े भाई एच.डी. रेवन्ना ने उन्हें कई सारे धार्मिक स्थलों की यात्रा करवाई है।

इस यात्रा में सुत्तूर और सिद्दागंगा के लिंगायत मठों के अलावा परंपरागत मठ से लेकर आदिचंचनगिरी का वोक्कालिगा मठ भी शामिल था। 111 वर्षीय शिवकुमार स्वामीजी की अध्यक्षता वाले सिद्दागंगा को सबसे अधिक शक्तिशाली लिंगायत मठों में से एक माना जाता है।

बुधवार को शपथ ग्रहण समारोह से पहले कुमारस्वामी और उनकी पत्नी अनीता ने रामनगरम और मैसूरु में चामुंडेश्वरी मंदिरों की यात्रा की, साथ ही मुख्यमंत्री ने श्रिंगेरी के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों और कर्नाटक के धर्मस्थल और तमिलनाडु के श्रीरंगम में भी पूजा की। उन्होंने बेंगलुरु में अवर लेडी ऑफ लॉर्ड्स चर्च और रामनगरम में मंकबात-ए-हजरत पीरां शाह वाली मस्जिद की भी यात्रा की।

कुमारस्वामी द्वारा यात्रा किए गये 11 मंदिरों में से पांच उनके जन्मस्थान, होलेनरसीपुरा में थे, जहाँ उन्होंने पंचभूतों या पंच तत्वों की पूजा की। यह पूजा उनके भाई रेवन्ना द्वारा करवाई गई थी जिनका कहना था कि इस पूजा से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि मुख्यमंत्री कार्यालय में उनका प्रदर्शन अच्छा होगा।

नक्षत्रों और मतदाताओं को खुश करने का एक दांव

आशीर्वाद मांगने की उनकी इच्छा थी, लेकिन कुमारस्वामी की लिंगायत मठों की यात्रा समुदाय के सदस्यों को रिझाने का प्रयास भी थी। पिछले प्रशासन द्वारा लिंगायत समुदाय को एक अलग धर्म का टैग देने की सिफारिश की गई थी, जिससे वे आहत थे, इसी वजह से वे उन्हें रिझाना चाहते थे।

कुमारस्वामी की सरकार में गठबंधन सहयोगी कांग्रेस ने अल्पसंख्यक टैग के मुद्दे पर लिंगायत से भारी प्रतिक्रिया का सामना किया था। कई लोगों ने इसे हिंदुओं को विभाजित करने के लिए एक दांव के रूप में भी देखा और चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने भी इस मुद्दे पर जोर दिया था, जिसकी वजह से पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या एवं कांग्रेस के खिलाफ लिंगायत वोटों का एकीकरण हो गया था। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि इसी वजह से 12 मई के चुनाव में पार्टी को आसान बहुमत नहीं मिल सका और 224 के सदन में से उनके 78 विधायक ही जीत हासिल कर पाए (अब तक 222 सीटों के लिए चुनाव आयोजित किए गए हैं, शेष दो सीटों के लिए चुनाव 28 मई और 11 जून को होंगे)।

गठबंधन सरकार के मुखिया के रूप में कुमारस्वामी के लिए सिर्फ लिंगायत मतदाताओं का मन जीतने का ही बड़ा काम नहीं है, बल्कि समुदाय के साथ-साथ बड़े पैमाने पर कांग्रेस से निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी रिझाना है, ताकि वे अपनी सरकार को गिरने से बचा सकें और संभावित विद्रोह को रोक सकें। चुनाव में जेडी (एस) ने सिर्फ 37 सीटें जीती हैं।

यह पूछे जाने पर कि वह लिंगायत मुद्दे द्वारा फैलै अविश्वास को कैसे संभालेंगे, कुमारस्वामी ने कहा, “मैं सभी तरह की चर्चाओं के लिए तैयार हूं। जिनके पास कोई मुद्दा है, यह विधान सुधा उनके लिए खुली है और हम बैठकर चर्चा कर सकते हैं कि इसे कैसे हल किया जाए।”

Read in English : Kumaraswamy’s religious dash ahead of trust vote: 11 temples, 4 mutts, a church & a mosque


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