Friday, 27 May, 2022
होममत-विमतयमन के कमजोर बागी विश्व अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बने और साबित किया कि फौजी ताकत की भी एक सीमा होती है

यमन के कमजोर बागी विश्व अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बने और साबित किया कि फौजी ताकत की भी एक सीमा होती है

ईरान और सऊदी अरब अब बातचीत कर रहे हैं लेकिन जंग के जिन्न को वापस बोतल में बंद करने में शायद बहुत देर हो चुकी है. यमन में सत्ता के दलाल अपने दबदबे के लिए हिंसा पर ही निर्भर हैं.

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वर्ष 1904 अभी शुरू हुआ था, यमन में जाड़े की सर्द धूप में उसकी जमीन पर तब तक दिखा सबसे बड़ा फौजी जमावड़ा धीरे-धीरे आकार ले चुका था. पांच ब्रिगेड यानी कुल करीब 26,000 सैनिक, सभी युद्ध की आधुनिक यूरोपीय शैली में प्रशिक्षित, आधुनिक राइफलों से लैस और तोपों के साथ महमत रज़ा पाशा की कमांड में जमा हो गए थे. उनके लिए 800 जानवरों और 2000 कुलियों से भारी मालगाड़ी भी तैयार थी. उनका सीधा-सा मिशन था- बादशाह सुलतान अहमद (द्वितीय) की सत्ता को चुनौती देने वाले ज़ायदी बागियों को खदेड़कर भगाना था, जिनके पास न ढंग के हथियार थे और न कोई प्रशिक्षण हासिल था.

लेकिन उस फरवरी की एक दोपहर में ही रेगिस्तान ने इस विशाल सेना को लील लिया. याजील टीले के पास चारों तरफ से घिर गई ये सभी ऑटोमन ब्रिगेड नष्ट हो गईं. यमन आए 110,000 तुर्क सैनिकों में से 25,000 हताहतों की संख्या सैनिक थी. वह साम्राज्य प्रथम विश्वयुद्ध में बिखर गया, ज़ायदी बागी कायम रहे.

इस सप्ताह हूती बागियों ने जब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर मिसाइलों और ड्रोनों से हमला कर दिया तब दोनों देशों के फौजी जनरलों को उस विनाशकारी फौजी मुहिम की जरूर याद आई होगी. अमेरिकी ‘थाड’ इंटर्सेप्टर सिस्टम ने हमलावर मिसाइलों को मार गिराया, लेकिन हूती बागी दिखा चुके हैं कि वे एक से ज्यादा बार अपने दुश्मनों के दांत खट्टे कर सकते हैं. अब हूती मिसाइलें तेल उत्पादन से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए ही नहीं बल्कि फारस की खाड़ी और लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों के साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरा बन गई हैं.

सऊदी अरब ने 2015 में जब यमन से युद्ध शुरू किया था तब उसके नेताओं ने सोचा था कि डेढ़ महीने में इस गड़बड़ी को दुरुस्त कर देंगे. अपने से पहले लड़े तुर्कों की तरह वे भी अपनी ताकत के मुगालते में थे. हजारों बमों के हमलों, लाखों नागरिकों की मौत के बावजूद समस्या का हल संभव नहीं दिख रहा है.


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हूती बगावत की शुरुआत

करीब एक हजार वर्षों में ज्यादा समय तक शिया ज़ायदी संप्रदाय के हूती कबीले ने उत्तरी यमन पर राज किया. उनकी इमामत क्षेत्रीय और साम्राज्यवादी दबावों के मुताबिक कमजोर और मजबूत होती रही. तमाम मजहबी मतों की तरह ज़ायदी मत ने भी एक राजनीतिक पहचान को मजबूती दी और ताकतवर बाहरी शक्तियों के दबदबे के बावजूद उत्तरी यमन के कबीलों के गठजोड़ों को एकजुट रहने में मदद की.

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1962 में, आधुनिक शिक्षा पाए फौजी अफसरों की नयी पीढ़ी ने इमामत को उखाड़ फेंका. लंबे समय तक चले गृहयुद्ध के बाद यमन अरब रिपब्लिक का गठन हुआ. इस नये राष्ट्र के जन्म के साथ, दक्षिण में ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ विद्रोह भी सफल हुआ और समाजवादी पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ यमन अस्तित्व में आया. इन दो नये देशों के संबंध शांतिपूर्ण से लेकर सीधी लड़ाई के बीच झूलते रहे. लेकिन ये दोनों देश क्षेत्रीय संरक्षकों से लेकर शीतयुद्ध दौर की प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियों के संरक्षण पर निर्भर रहे.

1980 के दशक से सऊदी अरब ने उत्तरी यमन पर अपना मजहबी प्रभाव बढ़ाना शुरू किया और लंबे समय से राज कर रहे ताकतवर फौजी शासक अली अब्दुल्ला सालेह के साथ अपने संबंधों का फायदा उठाते हुए सरकारी उपदेशक और धर्मगुरु भेजे जो धर्मांतरण करवाते थे. इस पर ज़ायदियों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हुई. हथियारबंद प्रमुख हौथी गुट अंसार अल्लाह ने ईरान की शह पर ज़ायदी मजहबी मुल्क की स्थापना के लिए संघर्ष शुरू कर दिया.

हालांकि 1990 में दोनों यमन एक हो गए लेकिन अमन का दौर छोटा ही रहा. 2004 में, ज़ायदी मौलाना हुसेन बद्रेद्दीन अल-हूती ने सालेह की हुकूमत के खिलाफ बगावत शुरू कर दी. 2010 तक युद्ध के छह दौर चले. इस बीच, दक्षिण यमन में अल-क़ायदा का नाटकीय उभार हो गया.

2011 में, जब पूरे पश्चिम एशिया में ‘अरब स्प्रिंग’ नामक आंदोलन उठ खड़ा हुआ तो भारी विरोध ने सालेह को गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. खाड़ी सहयोग काउंसिल ने समझौता करवाया और आबदू रब्बू मंसूर हादी राष्ट्रपति बने. लेकिन शायद आश्चर्यजनक रूप से यह समझौता कायम न रहा.

स्थायी अराजकता

अपनी दक्षिणी सीमा पर अराजकता के कारण सऊदी अरब ने इस उम्मीद में दखल दिया कि इस झटके के कारण हूती बातचीत के लिए तैयार हो जाएंगे. उसके शुरुआती हवाई हमले हुतियों को साना से खदेड़ने के मकसद से किए गए, जिसे उन्होंने अपने पुराने दुश्मन सालेह से मेल करके कब्जे में ले लिया था. इस दखल ने टूटे हुए यमन केपी मलहम लगाने की जगह करीब आधा दर्जन युद्धरत जागीरों को पैदा कर दिया.

हूतियों ने उत्तरी यमन पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है और अपनी आधी-अधूरी हुकूमत को ईरान के मजहबी हुकूमत की तर्ज पर ढाला है. बेहद गतिशील छोटे फौजी गुटों के बूते चलने वाली उनकी बगावत का लक्ष्य सऊदी अरब के पारंपरिक दबदबे को नाकाम करना है, उनका ज़ोर खुद जीत हासिल करने पर नहीं बल्कि उसे जीत से वंचित करने पर है. इस बीच ईरान हूतियों को फौजी साजोसामान के साथ-साथ ड्रोन और मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों के कल-पुर्जे दे रहा है, जो सऊदी अरब के साथ उसकी भू-राजनीतिक होड़ का हिस्सा है.

लाल सागर के पास हुदयदह में हूती सीमा के पास तारीक़ सालेह अपना छोटा-सा राज्य चलाते हैं. वे पूर्व राष्ट्रपति के भतीजे हैं जिन्हें उनके दुश्मन से दोस्त और फिर दुश्मन बने हौथियों ने अंततः मार डाला था.

तइज़ शहर के पास हुतियों का मुक़ाबला ‘मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े इस्लाह की ताकत से है. यूएई समर्थित सदर्न ट्रांजीशनल काउंसिल ने दक्षिण में बंदरगाह शहर अदन के साथ ही सोकोतरा द्वीप पर कब्जा कर रखा है; अदन के उत्तर में लाझ में नव कट्टरपंथी जमात ‘जायंट्स ब्रिगेड’ ने यूएई के समर्थन से सत्ता हथिया ली है.

हदरामवत सूबा यूएई समर्थित हदरमी इलीट फोर्सेस के बीच बंटा हुआ है जिनका नियंत्रण कोस्ट और इस्लाह पर है. ओमान और सऊदी अरब यमन की पूर्वी सीमा पर अल-महरा पर स्थानीय कबीलों की मदद से सत्ता हड़पने की कोशिश में लगे हैं, जबकि पूर्व राष्ट्रपति हादी की सेना ने मरीब और शबवा के तेल कुओं पर कब्जा बनाए रखा है.

इस गिनती में अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट के तमाम लड़ाकू गुटों को शामिल नहीं किया गया है, जिनका अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्जा है, जो क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के फौजी अड्डे का काम भी कर सकते हैं.


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समस्या, जिसका कोई हल नहीं 

ईरान और सऊदी अरब अब बातचीत कर रहे हैं लेकिन जंग के जिन्न को वापस बोतल में बंद करने में शायद बहुत देर हो चुकी है. ये दोनों देश अपने-अपने भाड़े के दस्तों को वापस बुलाने को राजी नहीं दिखते, क्योंकि उन्हें लगता है कि एक बड़े भू-राजनीतिक मुक़ाबले में उन्हें कहीं ज्यादा न गंवाना पड़ जाए जबकि इस मुक़ाबले में दोनों के वजूद दांव पर लगे हैं. इसके अलावा, यमन के अंदर जातीय तथा धार्मिक सत्ता के दलालों के लिए हिंसा ही संसाधन और वर्चस्व हासिल करने का जरिया है.

अफसोस की बात यह है कि दुनिया को ऐसे कई और संकट का सामना करना पड़ रहा है. अफगानिस्तान, मोज़ांबिक, नाइजीरिया, सीरिया, म्यांमार, और मेक्सिको तक में राज्यसत्ता ध्वस्त हो गई है. राज्यसत्ता की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था टूट चुकी है. इन संकटों का निपटारा करने के न तो साधन हैं और न इच्छाशक्ति है. यह तब है जब इसके कारण अगले 9/11 कांड का खतरा आसन्न दिखता है. यमन का उदाहरण बताता है कि संकट जब उफान पर हो तब युद्ध करने का फैसला उसे हल नहीं करता. बल्कि इससे संकट और गहरा ही हो जाता है.

रोम के खिलाफ डैलमेशियन बगावत का नेतृत्व करने वाले बाटो को जिस साम्राज्यवादी सत्ता ने कैद किया था उससे उन्होंने कहा था, ‘इसके लिए तुम रोम वाले जिम्मेदार हो; क्योंकि तुमने अपने लोगों की रक्षा के लिए कुत्तों या गड़ेरियों को नहीं बल्कि भेड़ियों को भेजा.’ दुनिया की महाशक्ति को तब भी इस पर गौर करना चाहिए था और आज भी करना चाहिए, लेकिन शायद वह नहीं करती है.

यहां व्यक्त विचार निजी हैं.

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