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वीरे दी वेडिंग का सीन
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एक फिल्म में एक दूसरे के लिए भद्दे शब्दों, जो फिल्म के विक्रय में एक कारण होते, का इस्तेमाल न करते हुए महिलाओं को बात करते हुए देखना राहत भरा है|

मैंने “वीरे दी वेडिंग” फिल्म से एक बात सीखी है | रूढ़िवादिता थकाऊ, अनावश्यक और संकुचित है और इन्हें कुछ इस तरह से बनाया गया है की महिलाओ को इसमें पूर्णतयः फिट किया जा सकता है|

रूढ़िवादी ऐसे दिखाई देते हैं जैसे बाकियों से ऊपर हैं खासकर तब तक जब तक आप उनके विचारों से पलायन नहीं करते | जैसे ही आप ऐसा करते हैं, तो आपका मजाक बनाया जाता है या आपकी खिचाई की जाती है और आपके उपहास की कहाँ को रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर भी दिखाया जाता है|

महिलाओं के लिए हमेशा से रूढ़िवादी विचारधाराएँ निर्धारित रही हैं । पहले, रूढ़िवादिता  के चलते ‘अच्छी लड़की’ की परिभाषा कुछ इस तरह थी  – एक महिला को एक सती सावित्री जैसा होना होता था, जिसे दूसरों को खुश रखने के लिए अपने जीवन में लाखों बलिदान देने पड़ते थे ।अब यह ‘आदर्श नारीवादी’ की सोच है, जहां हर पल, एक महिला के जीवन की हर रचनात्मक अभिव्यक्ति को उसे प्रकट करने की आज़ादी है जिससे आप उसका विद्रोह भी समझ सकते हैं। इसे आप उन पर हुए उत्पीड़न की एक वजह मान सकते हैं |

महिलायों को हसी मजाक कब करने को मिलेगा?

सक्रिय रूप से राजनीतिक होना और हमारे चारों ओर की संरचनाओं के साथ संलग्न होना महत्वपूर्ण है| हाल के वर्षों में हमने देखा है की अच्छे चलचित्र भी यही करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि, ‘जागरूकता बढ़ाने’ के काम से  हर ‘महिला-केंद्रित’ फिल्म को जोड़ते समय, हम भूल जाते हैं कि महिलाओं का भी आंतरिक जीवन भारयुक्त और जटिल होता है जिसको जानने की आवश्यकता भी है। वीरे दी वेडिंग को केवल इस बात के लिए खारिज कर दिया जाये  क्योंकि इस फिल्म में यह दर्शाया गया है की महिलाएं और उनका जीवन तब ही परदे पर उपयोगी है जब तक वे लोगों को शिक्षित और जागरुक करने के लिए दिखाया जाये।

दुर्भाग्य से, महिलाओं की व्यक्तिगत जिंदगी को हमेशा ‘कमतर कौशल’ के रूप में प्रदर्शित  किया गया है। छुट्टियों पर गए तीन पुरुषों की कहानी (जिंदगी ना मिलेगी दोबारा) को उनकी भावनाओं की एक खोज कहा जा सकता है और सराहा भी जा सकता है। लेकिन यदि महिलाएं ऐसा कार्य करें तो इसे उनकी एक छिछोरी हरकत कहा जायेगा। जब पुरुष शादी के साथ अपने संघर्ष और वे इसे कैसे चलाते हैं, के बारे में बात करते हैं तो इसे अतिसंवेदनशीलता का प्रदर्शन कहा जायेगा। जबकि महिलाएं जब वही कार्य करती हैं तो उन पर सवाल उठाये जाते हैं। साहित्य में भी जब महिलाएं अपने व्यक्तिगत संघर्षों के बारे में लिखती हैं तो उन पर सीधे पागल होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, लेकिन पुरुषों का क्या?

उन्हें “संवेदनशील” कहा जाता है

वीरे दी वेडिंग मूल रूप से नारीवादी नहीं है। यह वर्ग को जागरूक करने वाली नहीं है और यह निश्चित रूप से एक सजीव अनुभव भी नहीं है जिसे आप कहीं जोड़ के देखें हालाँकि तब तक, जब तक कि आप दिल्ली के सबसे आलीशान परिक्षेत्रों में नहीं रहते। कई तरीकों से यह एक पथप्रदर्शक फिल्म नहीं है – यह अक्सर चरम अभिव्यक्ति को हटाने की कोशिश करने के बजाय बढ़ा-चढ़ा कर प्रदर्शित करने की एक कोशिश है। हालांकि, बहुत सारे विवादित हस्तमैथुन दृश्यों सहित, इसमें बहुत कुछ पूर्णतयः वास्तविक है।

बहुत से लोगों ने आरोप लगाया है कि इससे ‘शर्मिंदा’ होने के कारण स्वरा भास्कर की साक्षी ‘गैर-नारीवादी’ बन गईं। यह सैद्धांतिक रूप से महान लगता है, लेकिन बहुत सी महिलाएं वास्तविक रूप से इसे अपने प्रेमियों से छिपाकर करती हैं।

इसे वास्तविकता के रूप में अस्वीकार करने से  हम इस बात को भी ख़ारिज कर रहे हैं की महिला किसी भी एक समय में कई किरदारों को निभा रही होती है। उनकी अभिव्यक्ति से इनकार करना एक बहुत ही अजीब तरह का नारीवाद है।

फिल्म के रूप में वीरे दी वेडिंग की आलोचना करने के लिए बहुत कुछ है: घुमावदार संवाद, संयोग, बेपरवाही के साथ चारों ओर फैला श्रेणीवाद, बेपरवाह, पहली दुनिया की समस्याओं को तीसरी दुनिया के देश से केवल संदर्भित किया गया।

महिलाओं को स्क्रीन पर स्वयं आनंद लेते हुए देखना अच्छा लगता है, बिना उनके खिलाफ हुए अत्याचारों को साजिश के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करके जिससे की विवाद खड़ा हो सकता है

महिलाओं को बिना किसी संकेतक शब्दों, जिनके कारण फिल्म बिकती है, का प्रयोग किए एक दूसरे के साथ बात करना एक राहत की बात है। मजबूर किए बिना गाली-गलौज करने, शराब पीने या धूम्रपान करने के लिए महिलाओं को एक वेश्या-मैडोना डिचोटोमी के साथ केवल मौजूद देखना बहुत ही सुखद है। समलैंगिकता के बहुत ही अनौपचारिक उल्लेख को देखना आश्चर्यजनक था कि वस्तुत: दिखाए बिना जो आमतौर पर अन्य # जागृत करने वाली फिल्मों में इसका अनुसरण किया जाता है।

यह एक दुर्लभ मसाला वाली फिल्म है जो आपको चुटकुले के बारे में भयानक महसूस किए बिना वापस बैठकर हंसने की अनुमति देती है क्योंकि वे (ज्यादातर) सभी लड़ते रहते हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से एहसास नहीं हुआ कि एक निरर्थक फिल्म कितनी मजेदार हो सकती है जब हर कुछ मिनटों के बाद चुटकुले व्यक्तिगत हमले की तरह महसूस नहीं होते हैं। यह दुनिया में सबसे बड़ा, सबसे समावेशी सिनेमा नहीं है – और ऐसा होने का दावा भी नहीं करता है। यह देखना अच्छा लगता है कि महिलाओं को इसके बारे में दोषी महसूस किए बिना मजा आता है।

और मैं भी इसका आनंद लेने के लिए अपराध महसूस करने से इनकार करती हूँ।

हरनिध कौर एक कवियित्री और नारीवादी हैं।

Read in English : Women are just having fun in Veere Di Wedding. And I refuse to feel guilty for enjoying it


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