Thursday, 29 September, 2022
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संविधान में दिए गए मौलिक कर्तव्यों के प्रति नागरिकों को कौन करेगा जागरूक

याचिकाकर्ता चाहता है कि केंद्र और राज्य सरकारों को मौलिक कर्तव्यों के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 51ए का पालन करने के लिए उचित कानून बनाने का निर्देश दिया जाए.

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हम अकसर सुनते हैं कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क से संसद तक आवाज बुलंद की जा रही हैं. इन अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार न्यायपालिका में याचिकाएं दायर होती हैं. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अनेक व्यवस्थाओं के माध्यम से मौलिक अधिकारों के दायरे का विस्तार भी हो चुका है. लेकिन संविधान में ही प्रदत्त नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के अनुपालन के बारे में शायद ही कभी किसी राजनीतिक दल, संगठन या समूहों ने आवाज उठाई हो. मौलिक अधिकारों की तरह ही संविधान में प्रदत्त मौलिक कर्तव्य भी महत्वपूर्ण और इनमें संतुलन कायम करने की आवश्यकता है.

यह सही है कि देश में आपातकाल लागू होने से पहले संविधान में मौलिक कर्तव्यों के बारे में साफ-साफ कोई प्रावधान नहीं था. लेकिन आपातकाल के दौरान 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से इसके भाग 4-ए में मूल कर्तव्य शीर्षक से इसमें अनुच्छेद 51-ए शामिल किया गया था. इस अनुच्छेद के माध्यम से नागरिकों के 11 कर्तव्यों को रेखांकित किया गया है.

संविधान में मूल कर्तव्यों को शामिल करने का उद्देश्य नागरिकों को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के साथ ही उनकी जिम्मेदारियों से भी अवगत कराना था लेकिन अभी भी यह कहना मुश्किल है कि मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने में कितनी सफलता मिली है.

मूल कर्तव्यों के अध्याय के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें. इन कर्तव्यों में भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना और इसे अक्षुण्ण बनाएं रखना, देश की रक्षा करना और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना भी शामिल है.

इसी तरह, मौलिक कर्तव्यों में धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित या भेदभाव से परे देश के सभी लोगों के बीच समरसता और समान भाईचारे की भावना का सृजन करना भी शामिल है.

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साथ ही मौलिक कर्तव्यों में पर्यावरण की रक्षा करना और उनका संवर्धन भी इसमें शामिल है. इसके दायरे में नदियां, झीलें और वन्य जीव आते हैं. इसके अलावा सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित करना और हिंसा से इसे बचाना भी मूल कर्तव्यों में शामिल है. इन मौलिक कर्तव्यों के बावजूद आज भी विभिन्न मुद्दों पर होने वाले आंदोलन में सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाना आम बात है.

मौलिक कर्तव्यों की स्थिति का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि संविधान के अनुच्छेद 51-ए में दिए गए मौलिक दायित्वों को लागू कराने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने Durga Dutt v. Union of India and Others शीर्षक से सूचीबद्ध इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने के साथ ही अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल से इसमें सहयोग करने का अनुरोध किया है. इस याचिका पर अब चार अप्रैल को आगे सुनवाई होगी.

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एम एम सुंदरेश की बेंच केंद्र से यह जानना चाहती है कि क्या Hon’Ble Shri Ranganath Mishra vs Union Of India And Ors केस में 31 जुलाई, 2003 को सुनाए गए फैसले के आलोक में इस दिशा में कोई कदम उठाया गया है.

अदालत ने 21 फरवरी को इस मामले में अपने आदेश में कहा कि याचिका में अनेक मुद्दे उठाए गए हैं जो चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से चुनी गई राजनीतिक व्यवस्था के दायरे में आते हैं.

यह याचिका दायर करने वाले दुर्गा दत्त का कहना है कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की आड़ में विरोध प्रदर्शन एक नया गैर कानूनी तरीका शुरू हो गया है जिसमे अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए सरकार को बाध्य करने के इरादे से सड़कों और रेल मार्गो को अवरुद्ध किया जा रहा है.

ऐसा लगता है कि यह याचिका नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी के विरोध के दौरान शाहीन बाग, तीन कृषि कानून वापस लेने की मांग पर किसानों का अनिश्चितकालीन धरने के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर आवागमन ठप होने और नौकरी के लिए परीक्षाएं रद्द होने विरोध में बेरोजगारों के धरना प्रदर्शन जैसे आंदोलन के दौरान सड़क और रेल मार्गो को अवरुद्ध किए जाने की बढ़ती घटनाओं की पृष्ठभूमि पर आधारित है.

याचिकाकर्ता चाहता है कि केंद्र और राज्य सरकारों को मौलिक कर्तव्यों के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 51ए का पालन करने के लिए उचित कानून बनाने का निर्देश दिया जाए.


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आयोग और मौलिक कर्तव्य

इसके अलावा, याचिका में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित करने का भी अनुरोध किया गया है जो इस संबंध में तैयार कानूनी रूपरेखा की समीक्षा करें.

देश के पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने 18 मार्च, 1998 को तत्कालीन चीफ जस्टिस को एक पत्र लिखकर नागरिकों को मौलिक कर्तव्यों के प्रति शिक्षित करने के सरकार के दायित्व की ओर ध्यान आकर्षित किया था ताकि मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के बीच उचित संतुलन बनाया जा सके. पत्र में कहा गया था कि मौलिक कर्तव्यों के बारे में शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है. सुप्रीम कोर्ट ने चार मई, 1998 को इसे याचिका के रूप में लिया था.

तत्कालीन चीफ जस्टिस वी एन खरे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका में उठाए गए बिंदुओं पर विचार करके अपना फैसला सुनाया था. इस फैसले में कोर्ट ने सरकार से अपेक्षा की थी कि वह नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के कार्यान्वयन के बारे में जस्टिस जे एस वर्मा समिति की सिफारिशें पर पूरी गंभीरता से विचार करेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य का भी उल्लेख किया था कि सरकार इन सिफारिशों का संज्ञान लेगी. इसी आधार पर कोर्ट ने सरकार को मौलिक कर्तव्यों के बारे मे जस्टिस जे एस वर्मा समिति की रिपोर्ट में 1999 में की गई सिफारिशों पर अमल के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया था.

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 में नागरिकों को उनके मौलिक कर्तव्यों के प्रति शिक्षित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी. जस्टिस वर्मा समिति ने कुछ मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के बारे मे अपनी रिपोर्ट में मौजूदा कानूनों के कई प्रावधानों का उल्लेख किया था.

इनमे राष्ट्रीय सम्मान का अपमान रोकथाम कानून, 1971, नागरिक अधिकार रोकथाम कानून, 1955, भाषा, वर्ण, जन्म स्थान, धर्म आदि के आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच कटुता पैदा के लिए दंड के बारे में आपराधिक कानूनों के प्रावधान, गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून, 1967, जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951, वन्यजीव संरक्षण कानून, 1972 और वन संरक्षण कानून, 1980 जैसे कानूनों का उल्लेख किया गया था.

जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट को संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने भी अपने परामर्श पत्र में इसे शामिल किया था. देश के एक अन्य पूर्व चीफ जस्टिल एम एन वेंकटचलैया की अध्यक्षता में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान इस आयोग ने भी 2002 में पेश अपनी रिपोर्ट में मौलिक कर्तव्यों पर शीघ्र अमल करने की सिफारिश की थी.

मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आए दिन होने वाले धरना प्रदर्शनों के दौरान रेल और सड़क यातायात अवरुद्ध करने वाले राजनीतिक और गैर राजनीतिक, सामाजिक संगठनों के साथ प्रत्येक नागरिक को संविधान में प्रदत्त मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना बहुत जरूरी है ताकि किसी भी स्थिति में देश की सार्वजनिक संपत्ति किसी भी तरह की हिंसा या आगजनी का शिकार ना हो.

इसलिए जरूरी है कि नागरिकों को उनके मौलिक कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक बनाया जाए. इस काम में गैर सरकारी संगठन अहम भूमिका निभा सकते हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि गैर सरकारी संगठन नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करते समय उन्हें मौलिक कर्तव्यों के बारे में भी शिक्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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