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Friday, 6 February, 2026
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क्लाउड सर्विसेज पर टैक्स हॉलिडे से किसे फायदा हो रहा है

बजट का यह कदम जितना विदेशी क्लाउड का स्वागत करने के बारे में है, उतना ही हार्ड एसेट्स और भारतीय मालिकाना हक को मज़बूत करने के बारे में भी है.

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने FY 2026-27 से FY 2046-47 तक भारत के डेटा सेंटर्स का इस्तेमाल करके क्लाउड सेवाएं देने वाली विदेशी कंपनियों को टैक्स में छूट देने का ऐलान किया है. इसे उन हाइपरस्केलर कंपनियों के लिए भरोसे के तौर पर देखा जा रहा है, जो परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट के खतरे को लेकर चिंतित थीं. ऊपर से देखें तो यह समझ सही लगती है.

लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो इसके पीछे एक ज्यादा दिलचस्प आर्थिक तस्वीर दिखती है. यह फैसला भारत में पूरे क्लाउड वैल्यू चेन में अतिरिक्त मुनाफे के बंटवारे को बदल देगा. इससे सिर्फ विदेशी टेक दिग्गजों को नहीं, बल्कि घरेलू डेटा सेंटर ऑपरेटर्स, भारतीय रीसेलर्स और—जिस पर कम ध्यान जाता है—क्लाउड सेवाओं के भारतीय और वैश्विक ग्राहकों को भी फायदा होगा.

बजट 2026 की यह छूट पहली नजर में उन सभी विदेशी कंपनियों पर लागू होती है, जो भारत में “निर्दिष्ट डेटा सेंटर से डेटा सेंटर सेवाएं खरीदकर” कमाई करती हैं. यह छूट मार्च 2047 तक मान्य होगी. पहली पढ़ाई में यह AWS (अमेज़न), माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और मेटा जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए राहत की तरह दिखती है. भारत के सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के बाद इन कंपनियों को डर था कि अगर वे भारत में बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर लगाती हैं, तो उन्हें परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट माना जाएगा और उनकी ग्लोबल क्लाउड कमाई पर भारत में टैक्स लग सकता है.

लेकिन यहां एक अहम शर्त है. डेटा सेंटर का मालिक और ऑपरेटर एक भारतीय कंपनी होना चाहिए, जिसे आईटी मंत्रालय की मंजूर स्कीम के तहत नोटिफाइड किया गया हो. साथ ही, भारतीय ग्राहकों को होने वाली कोई भी बिक्री एक भारतीय रीसेलर के जरिए ही होगी. आमतौर पर यह क्लाउड कंपनी की भारतीय सब्सिडियरी या कोई घरेलू पार्टनर होगा. यह इकाई भारत में पूरी तरह टैक्स के दायरे में रहेगी और लागत पर 15 प्रतिशत का सेफ हार्बर मार्जिन लागू होगा.

दूसरे शब्दों में, बजट ने विदेशी क्लाउड आय पर संभावित टैक्स दावे को छोड़कर भारत की जमीन पर पक्के और बड़े निवेश के बदले सौदा किया है. विदेशी कंपनी एक खास आय पर शून्य टैक्स देगी. वहीं भारत यह सुनिश्चित करता है कि डेटा सेंटर का मालिकाना हक, रीसेलर की भूमिका और घरेलू वैल्यू एडिशन भारतीय कंपनियों के साथ जुड़ा रहे, और भारी-भरकम, महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर भारत में ही लगे.

किसे फायदा, और टाइमिंग क्यों अहम है

सबसे बड़ा फायदा, जैसा कि मकसद था, विदेशी हाइपरस्केलर्स को होगा. AWS, माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर, गूगल क्लाउड और मेटा ने अगले पांच साल में भारत में करीब 67.5 अरब डॉलर के डेटा सेंटर और AI से जुड़े निवेश का ऐलान किया है. टैक्स हॉलिडे से भारत में कैपेसिटी इस्तेमाल करने की आफ्टर-टैक्स लागत सिंगापुर, UAE या यूरोप की तुलना में कम हो जाती है. इससे भारत ग्लोबल क्लाउड वर्कलोड्स के लिए कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन जाता है.

यहीं से चेन रिएक्शन शुरू होता है. विदेशी क्लाउड कंपनियों का बेहतर आफ्टर-टैक्स रिटर्न सीधे तौर पर भारतीय डेटा सेंटर कैपेसिटी के लिए उनकी भुगतान करने की इच्छा बढ़ा देता है. ऐसे बाजार में, जहां बिजली, कूलिंग और उपयुक्त जमीन की कमी है—और भारत गीगावॉट स्तर का कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बना रहा है—यह भुगतान करने की इच्छा ऊंचे लीज रेट्स और बेहतर कॉन्ट्रैक्ट शर्तों के रूप में दिखती है, जो भारतीय डेटा सेंटर ऑपरेटर्स के साथ तय होती हैं.

ये ऑपरेटर्स भारत के उभरते इंफ्रास्ट्रक्चर दिग्गज हैं—अडानी कनेक्ट (1 GW क्षमता का लक्ष्य), रिलायंस जियो, टाटा ग्रुप के प्लेटफॉर्म्स, एयरटेल का Nxtra (जिसके पास 15 प्रतिशत मार्केट शेयर है), योटा इंफ्रास्ट्रक्चर, CtrlS, सिफी और अन्य. ये मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, विशाखापट्टनम, नोएडा और पुणे में AI-रेडी फैसिलिटीज बनाने की दौड़ में हैं.

टैक्स हॉलिडे का सीधा फायदा इन्हें नहीं मिलता, क्योंकि ये सामान्य कॉरपोरेट टैक्स देती रहेंगी. लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर यह उनके मोलभाव की ताकत और प्राइसिंग पावर को मजबूत करता है, क्योंकि विदेशी ग्राहक “निर्दिष्ट” और नोटिफाइड फैसिलिटीज तक पहुंच के लिए प्रीमियम देने को तैयार होते हैं.

ग्लोबल डेटा सेंटर बाजारों में 2023 से 2025 के बीच लीज रेट्स तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि AI और क्लाउड की मांग बिजली, कूलिंग और हाई-परफॉर्मेंस GPUs की उपलब्धता से आगे निकल गई है. भारत के ऑपरेटर्स, जिन्हें अब यह भरोसा है कि उनके प्रमुख विदेशी ग्राहकों को लंबे समय की टैक्स निश्चितता मिलेगी, इस साहसिक इनकम टैक्स हॉलिडे से पैदा हुए अतिरिक्त मुनाफे का बड़ा हिस्सा ऊंची कैपेसिटी प्राइसिंग के जरिए हासिल कर सकते हैं. यह सब भारत की महत्वाकांक्षी सुपरकंडक्टर मिशन के साथ हो रहा है, जिसमें GPUs के घरेलू निर्माण के लिए 50 प्रतिशत तक की ओपन-एंडेड कैपिटल सब्सिडी की परिकल्पना की गई है.

रीसेलर इकोसिस्टम और क्लाउड ग्राहक

बजट की संरचना यह अनिवार्य करती है कि भारतीय रीसेलर इकाइयां—जैसे AWS इंडिया, माइक्रोसॉफ्ट इंडिया, गूगल क्लाउड इंडिया, टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसी आईटी कंपनियों के क्लाउड डिवीजन, और टेलीकॉम से जुड़े क्लाउड प्रोवाइडर—भारतीय ग्राहकों को बिक्री के लिए इस छूट का दावा करने पर बिक्री का हिस्सा हों.
इस बजट का ही हिस्सा 15 प्रतिशत का सेफ हार्बर नियम है, जो संबंधित पक्षों से लिए गए डेटा सेंटर सर्विस खर्च पर लागू होता है. यह नीति एक लेयर्ड वैल्यू चेन के साथ सहजता दिखाती है और रीसेलरों के मार्जिन की सुरक्षा करती है.

क्लाउड सेवाओं के भारतीय और वैश्विक उपभोक्ता—स्टार्टअप, एसएमई, बड़ी कंपनियां और SaaS कंपनियां—भी इस टैक्स हॉलिडे से पैदा होने वाली प्रतिस्पर्धा से फायदा पाएंगे. जैसे-जैसे हाइपरस्केलरों के बीच मुकाबला बढ़ेगा और क्षमता का विस्तार होगा, अतिरिक्त मुनाफे का कुछ हिस्सा अधिक प्रतिस्पर्धी क्लाउड प्राइसिंग के रूप में ग्राहकों तक पहुंचेगा. इससे डिजिटल अपनाने की बाधाएं कम होंगी और उन व्यवसायों के मार्जिन बेहतर होंगे जो भारत में होस्ट की गई इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हैं.

इस नीति को कैसे पेश किया गया है, इसकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था भी अहम है.

“2047 तक विदेशी क्लाउड प्रोवाइडरों के लिए टैक्स हॉलिडे” की घोषणा एक जरूरी सुधार की तरह पढ़ी जाती है.
लेकिन अगर इसे विपक्ष “अडानी, रिलायंस और टाटा जैसे डेटा सेंटर समूहों के लिए 20 साल का टैक्स हॉलिडे” कहकर पेश करता, तो ज्यादा कड़ी जांच होती.

सीधे लाभ को विदेशी कंपनी के जरिये देकर, और साथ ही भारतीय स्वामित्व को पक्का करके, सरकार ने वैश्विक खुलेपन की कहानी के भीतर एक बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोत्साहन बहुत सलीके से पैक कर दिया है.

यह एक राजनीतिक कौशल है.

लेकिन साफ कहना जरूरी है कि बजट का यह कदम विदेशी क्लाउड को आमंत्रित करने जितना ही भारतीय स्वामित्व और ठोस संपत्तियों को देश में टिकाने के बारे में भी है.

लंबी अवधि की निश्चितता क्यों जरूरी थी

इसके पीछे एक मजबूत नीति तर्क भी है, और सच कहें तो इतनी बड़ी और साहसिक आयकर छूट पूरी तरह जायज है. डेटा सेंटर क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई की भौतिक रीढ़ हैं. जैसे-जैसे वर्कलोड भारी होते जाते हैं, राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर होस्टिंग क्षमता होना डिजिटल संप्रभुता का सवाल बन जाता है. भारत पहले ही डेटा लोकलाइजेशन नियमों और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट के जरिए इस दिशा में कदम बढ़ा चुका है.

बजट का यह टैक्स हॉलिडे उसी नियामकीय दिशा का वित्तीय पूरक है. यह विदेशी क्लाउड कंपनियों से कहता है, “कंप्यूट और वर्कलोड भारत लाओ. हम टैक्स सिस्टम का इस्तेमाल करके तुम्हें अचानक फंसाएंगे नहीं.”
लेकिन भारतीय स्वामित्व और घरेलू मध्यस्थों की भूमिका पर कोई समझौता नहीं होगा.

इस नजरिए से देखें तो यह कदम कोई छुपी हुई रियायत नहीं है, बल्कि एक सोच-समझकर दी गई, जरूरी रियायत है. भारत विवादित टैक्स दावों को छोड़ता है, बदले में अरबों डॉलर के ऐसे ठोस निवेश को प्रोत्साहित करता है जो एक बार देश में आ जाए तो वापस नहीं जाता. एक ऐसे देश के लिए यह वाजिब है जो खुद को ग्लोबल क्लाउड हब और एआई क्षमता का केंद्र बनाना चाहता है.

इस नीति में कई विजेता हैं. विदेशी हाइपरस्केलरों को टैक्स की निश्चितता मिलती है. भारतीय डेटा सेंटर ऑपरेटरों को बेहतर कीमत तय करने की ताकत और ज्यादा वॉल्यूम मिलता है. भारतीय रीसेलरों को नियंत्रित मार्जिन और बाजार का विस्तार मिलता है. और क्लाउड ग्राहकों को भारत में आधारित, सस्ती और ज्यादा प्रतिस्पर्धी सेवाओं तक पहुंच मिलती है. यह एक ऐसी नीति है जो पूरे वैल्यू चेन में प्रोत्साहनों को जोड़ती है, साथ ही घरेलू स्वामित्व और कर योग्य मुनाफे को भी सुरक्षित रखती है.

पैकेजिंग बहुत शातिर है. इकोनॉमिक्स भी सही है.

के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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