Saturday, 4 December, 2021
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हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दूवाद का मतलब क्या है? क्या हिंदुत्व के बारे में न्यायिक व्यवस्थाओं पर पुनर्विचार की जरूरत है

सलमान खुर्शीद की किताब में हिन्दुत्व को आईएस और बोको हराम के साथ तुलना करने पर ‘हिन्दुत्व’ को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है.

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पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की किताब ‘सनराइज ओवर अयोध्या- नेशनहुड इन अवर टाइम्स’ में हिन्दुत्व को आईएस और बोको हरम जैसे आतंकी संगठनों के समकक्ष रखे जाने के साथ ही ‘हिन्दुत्व’ को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. निश्चित ही वास्तविकता से इस बहस का कोई सरोकार नहीं है और ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात सहित छह राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ‘हिन्दुत्व’ को लेकर छेड़े गए इस नई विवाद का मकसद राजनीति और सिर्फ राजनीति है.

हिन्दुत्व को आईएस और बोको हराम जैसे आतंकी संगठनों के समकक्ष रखे जाने से विवाद तो होना था और वह शुरू हो गया. हिन्दुत्व जैसे मुद्दे की संवेदनशील को दरकिनार रखते हुए इस विवाद में बीजेपी, कांग्रेस और शिवसेना सहित कई राजनीतिक दल इसमें कूद पड़े हैं. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी और आरएसएस को निशाना बनाते हुए कहा है कि हम हिन्दू हैं, हमें हिंदुत्व की ज़रूरत नहीं है.

इस विवाद के दौरान और इससे पहले भी हिंदुत्व को लेकर तरह तरह की दलीलें दी गई हैं लेकिन हिन्दुत्व शब्द को लेकर हो रहे तर्क और कुतर्क के बीच कोई भी राजनीतिक दल या इसके नेता इसकी न्यायिक व्याख्या को समझना नहीं चाहता है जबकि किसी भी तरह के सांप्रदायिक टकराव को टालने के लिए इसे समझना जरूरी है.

हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू वाद जैसे शब्दों और इसके उपयोग के बारे मे 1904 से लेकर 1994 के बीच कई न्यायिक व्यवस्थाएं हैं लेकिन अभी भी एक वर्ग समय समय पर हिंदुत्व को जीवन शैली के रूप में परिभाषित करने और इस शब्द के उपयोग के संदर्भ के बारे में संबंध न्यायिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का अनुरोध न्यायालय से कर रहा है. हिन्दुत्व शब्द के प्रति किसी न किसी तरह की अदावत रखने वाले संगठन या लोग चाहते हैं कि चुनाव के दौरान इस शब्द के इस्तेमाल पर ही पाबंदी लगाई जाए लेकिन उसे अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है.

यह सही है कि चुनाव प्रचार के दौरान हिन्दू, हिन्दुत्व या हिन्दूवाद जैसे शब्दों के प्रयोग को जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्ट आचरण के दायरे में लाने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी  व्यवस्था दी है लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ चुनाव प्रचार के दौरान हिन्दू, हिन्दुत्व या हिन्दूवाद जैसे शब्दों के प्रयोग के संदर्भ में कोई फैसला सुनाया गया है.

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अदालत का रुख़ 

महाराष्ट्र में 13 दिसंबर, 1987 को संपन्न विधानसभा चुनाव के दौरान इन शब्दों के इस्तेमाल का मुद्दा चुनाव याचिकाओं में उठाया गया था. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने डॉ. रमेश यशवंत प्रभू बनाम श्री प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और अन्य, बाल ठाकरे बनाम श्री प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और अन्य और श्री सूर्यकांत वेंकटराव महादिक बनाम श्री सरोज संदेश नाइक केसों में 11 दिसंबर 1995 को अपने फैसले में कहा था कि हिंदुत्व या हिन्दूवाद एक जीवन शैली है और हमें यह देखना होगा कि चुनावी भाषणों में इन शब्द का किस संदर्भ में उपयोग किया गया है.

जस्टिस वर्मा की अध्यक्षा वाली इस बेंच ने ‘हिन्दू’, ‘हिन्दुत्व’ और ‘हिन्दू धर्म’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के बारे में अपनी व्यवस्था के संदर्भ में संविधान पीठ के अनेक फैसलों को जिक्र किया था. इनमें अयोध्या विवाद से संबंधित डॉ. एम इस्माइल फारूकी आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य मामले में 1994 में न्यायमूर्ति एस पी भरूचा और न्यायमूर्ति ए एम अहमदी की राय भी शामिल की थी. ये दोनों न्यायाधीश बाद में देश के प्रधान न्यायाधीश बने.

इससे पहले 14 जनवरी, 1966 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पी बी गजेन्द्रगडकर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने अहमदाबाद के स्वामीनारायण मंदिर के संदर्भ में अपने फैसले में हिन्दू धर्म के बारे में विस्तार से चर्चा की थी.

इस संविधान पीठ ने स्वामीनारायण मंदिर से संबंधित शास्त्री यज्ञपुरुषादजी और अन्य बनाम मूलदास ब्रूदर्दास  मुलदास ब्रदर दास वैश्य और अन्य केस में सुनाए गए फैसले में कहा था कि इस चर्चा से यही संकेत मिलता है कि शब्द ‘हिन्दू’ ‘हिन्दुत्व’ और ‘हिन्दूवाद’ का कोई निश्चित अर्थ नहीं निकाला जा सकता है साथ ही भारतीय संस्कृति और विरासत को अलग रखते हुए इसके अर्थ को सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता. इसमें यह भी संकेत दिया गया था कि ‘हिन्दुत्व’ का संबंध इस उपमहाद्वीप के लोगों की जीवन शैली से अधिक संबंधित है.

संविधान पीठ ने यह भी कहा था कि जब हम हिन्दू धर्म के बारे में सोचते हैं तो हम हिन्दू धर्म को परिभाषित या पर्याप्त रूप से इसकी व्याख्या करना असंभव नहीं मगर बहुत मुश्किल पाते हैं. दूसरे धर्मों की तरह हिन्दू धर्म किसी देवदूत का दावा नहीं करता, यह किसी एक ईश्वर की पूजा नहीं करता, किसी धर्म सिद्धांत को नहीं अपनाया, यह किसी के भी दर्शन की अवधारणा में विश्वास नहीं करता, यह किसी भी अन्य संप्रदाय का पालन नहीं करता, वास्तव में ऐसा नहीं लगता कि यह किसी भी धर्म के संकीर्ण  पारंपरिक सिद्धांतों को मानता है. मोटे तौर पर इसे जीवन की शैली से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के इस तरह के फैसलों के मद्देनजर कहा था कि इसमें संदेह नहीं है कि हिन्दू धर्म या हिन्दुत्व शब्दों को भारत की संस्कृति से इतर सिर्फ हिन्दू धार्मिक रीतियां तक सीमित करना या ऐसा समझना जरूरी नहीं है.

कोर्ट का स्पष्ट मत रहा है कि जब तक भाषण में इन शब्दों के प्रयोग का मतलब इसके विपरीत नजर नहीं आए, ये शब्द भारतीय जनता की जीवन शैली का ही संकेत देते हैं और इन शब्दों के प्रयोग का मतलब हिन्दू धर्म को अपनी आस्था के रूप में मानने वाले व्यक्तियों तक सीमित रखना नहीं है.


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अयोध्या विवाद से संबंधित डॉ इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ याचिका पर 1994 में न्यायमूर्ति एस पी भरूचा ने अपनी और न्यायमूर्ति ए एम अहमदी की ओर से अलग राय में कहा था, ‘हिन्दू धर्म एक सहिष्णु विश्वास है. यही सहिष्णुता है जिसने इस धरती पर इस्लाम, ईसाई धर्म, पारसी धर्म, यहूदी धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म को इस धरती पर फलने फूलने के अवसर दिए.’

अयोध्या मामले में भी इन न्यायाधीशों ने अपनी राय में कहा था कि सामान्यतया, हिन्दुत्व को जीवन शैली या सोचने के तरीके के रूप में लिया जाता है और इसे धार्मिक हिन्दू कट्टरवाद के समकक्ष नहीं रखा जा सकता और न ही ऐसा समझा जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इन सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए इन अभिव्यक्तियों का इस्तेमाल इनके सही मायने नहीं बदल सकता है. किसी भी भाषण में इन शब्दों का उपयोग करके किसी भी तरह की शरारत करने के प्रयास पर अंकुश लगाना होगा. न्यायिक फैसलों में ‘हिन्दूवाद’ की उदारता और सहिष्णुता की विशेषता को मान्यता के बावजूद चुनावों में अनुचित राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है.

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार दोहराया है कि राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता को बचाए रखने और इसे बढ़ावा देने के लिए किसी भी तरह के कट्टरपंथ से सख्ती से निपटने की आवश्यकता है.

कोर्ट का स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह मानकर आगे बढ़ना कानूनन ग़लत होगा कि भाषणों में हिंदुत्व या हिन्दूवाद का किसी भी प्रकार से उल्लेख स्वत: ही हिन्दू धर्म पर आधारित भाषण है जो दूसरे धर्मों के खिलाफ है या फिर हिंदुत्व या हिन्दू धर्म शब्दों का उपयोग हिन्दू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वालों के प्रति बैर दर्शाता है.

न्यायिक व्यवस्थाओं के बावजूद किसी न किसी रूप में ‘हिन्दुत्व’ शब्द को विवाद का केन्द्र बिन्दु बनाने का प्रयास किया जा रहा है. सलमान खुर्शीद की पुस्तक में हिंदुत्व को आईएस और बोको हराम के समकक्ष रखने का प्रयास भी इसी की कड़ी लगता है.

वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते हुए ‘हिन्दुत्व’ शब्द और इसके इस्तेमाल को लेकर शंकाओं और लगातार इसे विवाद का केंद्र बनाने के प्रयास पर निकट समय में अंकुश लगने की संभावना नहीं है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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