बिहार भारत का सबसे गरीब राज्य है, यह कोई नई बात नहीं है. पीढ़ियों से यह कहा जाता रहा है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बिहार बदला नहीं है और बदलाव हमेशा बेहतरी के लिए ही हुआ है. यह दीवारों पर लिखी इबारत कह रही है.
यह बदलाव केवल पटना में सीमित नहीं है, जहां पहला फाइव स्टार होटल खुल गया है, ताज ग्रुप का. इस होटल के साथ सिटी सेंट्रल मॉल भी जुड़ा है. तमाम ब्राण्ड्स की मेजबानी करता इतना बड़ा मॉल पहली बार पटना में खुला है. ‘क्रॉसवर्ड’ चेन ने इसमें किताबों की एक दुकान भी खोली है जिसमें 30 टॉप बेस्ट सेलर किताबें खरीदी जा सकती हैं. इन किताबों में अरुंधती राय की ‘मदर मेरी कम्स टु मी’ बेशक सबसे टॉप पर है. उसी दीवार पर आप पीटर थिएल की ‘ज़ीरो टु वन’ मॉर्गन हाउसेल की ‘द साइकोलॉजी ऑफ मनी’ और ‘द आर्ट ऑफ स्पेंडिंग मनी’, ‘इकीगाई, द जैपनीज़ सीक्रेट टु अ लॉन्ग ऐंड हैप्पी लाइफ’ के अलावा दूसरी किताबों को भी देख सकते हैं.
सेल्सपरसन ने मुझे बताया कि वो हर दिन दो-तीन किताबें बेच रहे हैं और वीकेंड्स में कहीं ज्यादा किताबें बिकती हैं. यहां हमें मालूम है कि इस फैक्ट में कोई बदलाव नहीं आया है कि बिहार की प्रति व्यक्ति ‘जीएसडीपी’ (राज्य का सकल घरेलू उत्पाद) अभी भी 900 डॉलर के नीचे यानी इसके राष्ट्रीय औसत की एक तिहाई के बराबर बनी हुई है, जैसा कि हमेशा से रहा है. फर्क सिर्फ इतना हुआ है कि नीतीश कुमार के 20 साल के राज में राज्य के शहरों, खासकर पटना में ‘एलीट्स’ का एक नया तबका उभरा है. यह ‘इबारत’ यह भी बताती है कि काफी संख्या में लोगों में पैसे को लेकर एक उत्सुकता है—उससे जुड़ी मानसिकता के मामले में भी और उसे खर्च करने के तरीकों के बारे में भी.
शहरीकरण का घोर अभाव कई पीढ़ियों से बिहार के लिए एक अभिशाप बना हुआ है. यह उस राज्य के लिए एक दुखद तथ्य है, जो राज्य कभी दो हज़ार साल पहले इस उप-महादेश के सबसे महान नगरों और साम्राज्यों पर गर्व करता था, लेकिन आज भी इस राज्य की 88 फीसदी आबादी गांवों में रह रही है, लेकिन अब बिहार में भी शहरीकरण हो रहा है. या कहें कि ‘रर्बनाइज़ेशन’ हो रहा है. पटना के सबसे कुलीन रिहायशी इलाके, पाटलिपुत्र कॉलोनी में भी सड़कें ऊबड़-खाबड़, गड्ढों भरी और साल-दर-साल बिछाई गईं अलकतरे की परतों से ऊंची हुई दिखाई देती है.
आप देख सकते हैं कि यहां की सड़कें क्यों किसी चौथी दुनिया की सड़कों की परिभाषा पर क्यों फिट होती हैं. इसकी वजह यह है कि सड़कों के साथ नाले नहीं बनाए गए हैं. बरसात का पानी जमा होकर उन्हें खुरचता रहता है. यही हाल कूड़े के ढेर करते रहते हैं. पटना अगर इस तरह गड्डमड्ड तरीके से विकास कर रहा है और कुलीनों के शहर में तब्दील हो रहा है तब आप सोच सकते हैं राज्य के बाकी हिस्सों का क्या हाल होगा, लेकिन राज्य में शहरीकरण बेशक हो रहा है, भले ही काफी अराजक ढंग से. गांव-दर-गांव आप जो एक गतिविधि होती देख सकते हैं वह है कंस्ट्रक्शन, भवन निर्माण. बिहार जबरदस्त ‘कंस्ट्रक्शन बूम’ की दिशा में बढ़ चुका है.
हम पटना से करीब 120 किमी दूर औरंगाबाद जिले में कभी माओवादियों का गढ़ माने गए गोह से गुज़र रहे हैं. यह इलाका सोन नदी के करीब है. जिन सड़कों के किनारे कभी इक्का-दुक्का पक्के मकान दिखते थे वहां अब ज़्यादातर चार-पांच मंज़िले नए पक्के मकान बनते दिख रहे हैं. सबके आगे बनी बालकनी और सजीली छतों पर खड़े लोग नीचे से गुज़रते राजनीतिक जुलूस का नज़ारा लेते दिखे.
इस सबके लिए पैसा कहां से आ रहा है? कुछ पैसा तो बाहर बसे बिहारियों से आ रहा है, कुछ पीएम आवास योजना के तहत आ रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों की आमदनी भी कुछ बढ़ी है, खासकर स्वयंसेवी समूहों से जुड़ी महिलाओं की. अगर आप एक दशक पहले बिहार गए होंगे तो आज आप इसके अंदरूनी इलाकों को नहीं पहचान नहीं पाएंगे. यह मानो दूसरा ही इलाका दिखेगा.
यह अभी भी गरीब है, भीड़भाड़ भरा है और दिल्ली से भी ज्यादा स्मॉगग्रस्त है. इसकी वजह भी है, जिसकी व्याख्या हम आगे करेंगे, लेकिन आज पहली बार कई लोगों के पास इतना अतिरिक्त पैसा है कि वो नया, ज्यादा सुंदर घर बना सकें. मेरी नजरें खुद-ब-खुद इन ऊंचे मकानों की खिड़कियों पर टिक जाती हैं कि वहां नई समृद्धि का ज़ाहिर प्रतीक एयरकंडीशनर है या नहीं. कार से लंबी यात्राओं के दौरान मुझे यह एक चीज़ नहीं दिखी. इससे यह स्पष्ट है कि इस तरह के मकान बनाने के लिए पैसे तो आए हैं, लेकिन विलासिता को अभी थोड़ा इंतज़ार करना ही होगा.
नज़र घुमाते रहिए और दीवारों पर लिखी इबारतें पढ़ते रहिए. 2005 से शुरू हुई अपनी पिछली यात्राओं में मैंने शुरुआत केवल झोपड़ियों के साथ की थी, तब दीवारें नहीं दिखती थीं, केवल पेड़ों पर कुछ साइनबोर्ड लटके नज़र आते थे — इसके बाद 2005 में इंग्लिश मीडियम स्कूलों, 2010 में ब्रांडेड अंडरवियर और यूपीएससी कोचिंग, 2014-15 में ब्रांडेड बेबी डायपर्स तक. शिक्षा आज पूरे भारत के लिए स्थायी आकर्षण है, लेकिन बिहार के क्षितिज पर आज कंस्ट्रक्शन की सामग्री ही बिखरी नज़र आती है. अनुष्का शर्मा और विराट कोहली एक ब्रांड का सरिया बेच रहे हैं—‘फ्लेक्सी स्ट्रान्ग मतलब हमेशा के लिए स्ट्रान्ग’ और इनसे मकान बनने के लिए उस ब्रांड के सीमेंट का इस्तेमाल कीजिए, जिसे जसप्रीत बूमराह मुट्ठी लहराकर यह नारा लगाते हुए बेच रहे हैं कि ‘बिल्ड स्ट्रान्ग’: मजबूती से बनाओ.
देश में बिक रहा हर ब्रांड का सीमेंट, सरिया, पेंट नीतीश कुमार के दो दशकों के शासन के बाद बिहार की दीवारों पर भी बेचा जा रहा है. इसके अलावा भी बहुत कुछ! ‘एअरटेल पे’ बार-बार सामने आकर आपको यह याद दिलाता है कि यह पैसे भेजने वाली अर्थव्यवस्था है. अगर हमने बिहार को स्कूली स्तर की बुनियादी शिक्षा से ब्रांडेड अंडरवियर और यूपीएससी कोचिंग की ओर बढ़ते देखा, तो अब हम दांतों की चिकित्सा में उछाल से रू-ब-रू हैं. कस्बों तक में दांत के शिक्षित डॉक्टरों और स्पेशलिस्टों ने सुसज्जित क्लीनिक खोल दिए हैं और रूट कनाल सर्जरी से लेकर नए दांत लगाने, पूरे मुंह को नया रूप देने और कोस्मेटिक बदलाव करने जैसी सेवाएं दे रहे हैं.

मेरी खास पसंद: ‘अपनी पसंद की मुस्कान पाइए’, दाउदपुर में ’32 दांत अस्पताल’, जो नए दांत लगाने की इमप्लांट सर्जरी से लेकर लेजर एंडो-डेंटल सर्जरी तक करने की पेशकश कर रहा है. इसे क्रमशः आजमगढ़ और लखनऊ से पढ़े दांतों के डॉक्टर प्रणव और अलका सिंह चला रहे हैं. एक बार फिर आपको याद दिला दें कि यह अस्पताल कभी नक्सलियों के कब्जे़ में रहे इस इलाके में है जिसमें ‘क्रांतिकारी’ लोग खुलेआम हथियार लेकर घूमा करते थे और फोटो पत्रकारों से बड़ी शान से फोटो खिंचवाया करते थे.
औरंगाबाद ज़ोन और उसके हथियारबंद ‘फाइटरों’ ने स्व. कृष्ण मुरारी किशन की बड़ी छवि गढ़ी थी, जो बिहार के फोटो पत्रकारों के अगुआ थे और जिनके दबंग प्रभाव के नीचे हम युवा रिपोर्टरों ने प्रगति की. बदलाव अब इतना स्पष्ट है कि आप यह समझ सकते हैं कि कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार और थोड़ा सुशासन बुरी तरह से निराश इस क्षेत्र में इन उग्र क्रांतियों के लिए किस तरह घातक संहारकर्ता साबित हुए. औरंगाबाद में ‘तनिष्क’ आभूषणों का शोरूम विफल हुई क्रांति का जितना अच्छा प्रतीक है वैसा प्रतीक आपको और कहीं नहीं मिलेगा. जानी-पहचानी दुकानों और क्लीनिकों की मौजूदगी भी इसी की तसदीक करती है. मेरे लिए पटना में सबसे उल्लेखनीय लगी ‘बार्क एन ब्रश’ ब्रांड की मौजूदगी, जिसके साथ ‘डॉग हॉस्पिटल’ भी जुड़ा है. इसके साथ ही, सबसे ऊपर है डेंटल हॉस्पिटल की मौजूदगी. यह एक संपूर्ण चित्र के रूप में मेरी रिपोर्ट को प्रस्तुत कर देता है.
इसलिए, कोई हैरानी नहीं कि एनडीए जिन मुफ्त लाभों की बरसात कर रहा है उससे भी ज्यादा असरदार यह है कि नीतीश कुमार ने कानून-व्यवस्था को बहाल कर दिया है. क्या आप ‘जंगल राज’ की वापसी चाहते हैं? पटना से करीब 40 किमी दूर मसौढ़ी आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में मामूली भीड़ वाली जनसभा में तीन पन्ने का लिखा हुआ भाषण पढ़ते हुए नीतीश कुमार सिर्फ एक बार अपना सिर तभी उठाते हैं जब वे उक्त सवाल पूछते हैं. जो राज्य सिर्फ लिखा हुआ भाषण पढ़ने वालों के लिए नहीं बल्कि अपने शानदार वक्ताओं के लिए जाना जाता है वहां इस तरह का भाषण सुनते हुए ऊब चुके लोगों में इसी सवाल पर थोड़ी हलचल होती है. सैकड़ों हाथ ऊपर उठते हैं और समवेत स्वर उभरता है—कभी नहीं!
नीतीश आज अपनी एक परछाई जैसी दिखते हैं. उनका स्वास्थ्य कमज़ोर हुआ है. उनसे किसी को मिलने नहीं दिया जाता, और जब राजनीति में उन्हें ऊंचाई पर होना चाहिए था तब लिखे हुए छोटे भाषण के सिवा उनके भरोसे कुछ भी नहीं छोड़ा जा रहा है. हकीकत यह है कि भाजपा के पास कोई विकल्प नहीं है. बिहार में उसके पास एक भी नेता नहीं है जो दस हजार की भीड़ भी जुटा सके.
मैं कई वर्षों से कहता रहा हूं कि बिहार की राजनीति रेलवे स्टेशन पर खड़ी रंग-बिरंगी डिब्बों वाली उस ट्रेन के समान है जिसका कोई इंजन नहीं नजर आता. फिर, एक समय एक इंजन आता है, जिसका नाम नीतीश कुमार है. इसी रूप में वे 20 वर्षों से भाजपा, लालू-कांग्रेस के साथ मिलकर या खुद अपने बूते सत्ता में रहे हैं, सिवा उन कुछ महीनों के जिनमें वे रणनीतिक चाल के तहत सत्ता से बाहर रहे और जीतन राम मांझी (अब एनडीए के साथ) को अपने दलित प्रतिनिधि के रूप में सत्ता सौंप दी. वे भाजपा के अपरिहार्य इंजन हैं, जिसकी भाजपा को अभी भी ज़रूरत है. भाजपा बेशक मुख्य पार्टी हो, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज्यादा नीतीश के नाम पर वोट मांग रही है.
अगर कंस्ट्रक्शन बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए इंजन की भूमिका निभा रहा है, तो इसकी उलटी तस्वीर इसकी नदियों के किनारे देखी जा सकती है, खासकर गंगा की कई सहायक तथा अराजक नदियों के किनारे. बिहार में कई नदियां बहती हैं और उसका इतिहास बताता है कि वह सूखा और बाढ़ का चक्र झेलता रहा है. बाढ़ नेपाल की तलहटियों से विशाल मात्र में रेत लाता रहा है और नदियां जब सूखती हैं तब स्थानीय ठेकेदार, नेता, ठग, माफिया, सब-के-सब रेत के इस भंडार पर टूट पड़ते हैं. नदियों के साथ लगे राज्य के हाइवे पर रेत ढोते खुले ट्रकों की कतार लगी होती है, जो रेत उड़ाते चलते रहते हैं और बिहार के ग्रामीण क्षेत्र को देश के सबसे प्रदूषित इलाकों में शुमार करते रहते हैं. यह तब है जबकि राज्य में कोई उद्योग नहीं है.

जिलों के अधिकारियों का कहना है कि नीलामी का दिखावा तो होता ही है और यह वास्तव में दिखावा ही होता है. बाकी, करीब 99 प्रतिशत की चोरी रेत माफिया करता रहता है और नीतीश सरकार की कानून-व्यवस्था मशीनरी इसमें दखल देने से बचती रहती है. जाहिर है, अपना नाम न बताते हुए एक हताश अधिकारी ने हमसे कहा, “ये माफिया इतने ताकतवर हैं और वे इतना पैसा बनाते हैं कि ये किसी को डरा या खरीद सकते हैं. वे रेत को कोलकाता, दिल्ली, और दक्षिणी राज्यों तक ले जाते हैं क्योंकि पूरे देश में कंस्ट्रक्शन उछाल पर है और रेत की कमी है’’. इसके चलते बिहार की हवा बरबाद हो चुकी है, राजस्व की हानि हुई है, और नदियों के तल खोखले हो रहे हैं. इन ‘रेत हाइवे’ पर कभी रात में चलने की कोशिश कीजिए, आप दूसरी बार इन पर उतरने की हिम्मत नहीं करेंगे.
कानून-व्यवस्था अगर नीतीश/एनडीए की सबसे बड़ी उपलब्धि है, तो रोजगार के अवसर न बढ़ाना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है. बिहार में राष्ट्रीय और प्रादेशिक हाइवे हैं, यहां तक कि गांवों में सड़कें तेज गति से बनाई गई हैं, लेकिन उद्योग नदारद हैं. कागज़ पर तो लगता है कि कृषि ने यहां की ‘जीएसडीपी’ में बड़ा योगदान दिया है. बस इतना है कि हम काफी निचले आधार की बात कर रहे हैं.
बेरोजगारी एनडीए के गले से लटके पत्थर के समान है और चुनौती देने वाले सभी तत्वों को इसमें एक अवसर नज़र आता है. बेरोजगारी के दो नतीजे हैं. पहला यह कि इससे गांव सामान्य कष्ट में हैं, लेकिन दूसरा कष्ट यह है कि नीची आय वाले रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन हो रहा है. सबसे ताज़ा अनुमान है कि बिहार की 7.2 फीसदी आबादी रोजगार के लिए बाहर चली गई है. इसका अर्थ यह होगा कि एक करोड़ पुरुष लोग बाहर चले गए हैं. इनमें से सात-आठ लाख लोग गुजरात के सूरत में ‘लो-टेक’ वाली गुलजार मैनुफैक्चरिंग केंद्र में काम कर रहे हैं. बिहार के करीब 52 फीसदी परिवारों को बाहर से पैसे आते हैं. इसका औसत आकार मात्र 35 हज़ार रुपये सालाना है. यह बताता है कि इन रोजगारों से कितनी कम आय होती है. इसका नतीजा यह है कि परिवार बंटे रहते हैं, पत्नियां बच्चों को अकेले ही पालती रहती हैं.
इस बार जो उम्मीदवार खड़ा हुआ है जिसे सबसे उजागर ‘बाहरी’ कहा जा रहा है, उसने प्रवास के इस चलन को, जिसे यहां ‘पलायन’ कहा जाता है, अपने विमर्श का केंद्रीय बिंदु बनाया. प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी वादा कर रही है कि वह इस चलन को उलट देगी. वे जनसभाएं नहीं करते, लगातार रोड-शो करते हैं. हम इनकी कार में घंटों यात्रा करते रहे. हर कुछ किलोमीटर पर वे किसी गांव में रुक जाते और वही संदेश दोहराते हैं: रोजगार बढ़ाने, पलायन को उलटने के वादे.
वे कहते हैं : “मोदी जी कहते हैं कि वे आपको मुफ्त में डाटा दे रहे हैं ताकि आप रील बनाकर जीवन चलाने लायक कमाई कर सकते हैं”. किशोर मखौल उड़ाते हुए कहते हैं: “हम मोदी जी से इतना ही कहते हैं कि हमें आपका डाटा नहीं चाहिए. हमें हमारे बेटा वापस भिजवा दीजिए.” उनका मानना है कि प्रवासी मजदूर उनके सबसे अच्छे प्रचारकर्ता हैं और वे अपने परिवारों को उन्हें वोट देने के लिए राजी करवा लेंगे.
चुनाव प्रचार के अंत में बनी ‘हवा’ के विपरीत इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि उन्होंने भाजपा/एनडीए के पक्ष में अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग दिया है, या वे गुप्त रूप से उनकी मदद कर रहे हैं. वे मंच से प्रायः पांच मिनट का भाषण देते हैं और उसमें भाजपा/एनडीए पर ही निशाना साधते हैं. किसी विचारधारा से मुक्त उनके जैसे बाहरी के लिए, राजनीति के रंग में रंगे और जातियों के आधार पर ध्रुवीकृत बिहार में कोई संभावना है? उनका कहना है कि उनके लिए गुंजाइश है. वे कहते हैं, हर दिन सोशल मीडिया, खासकर यूट्यूब और फेसबूक पर वे जो पोस्ट करते हैं उसे 30 करोड़ बार देखा जाता है और काफी गंभीरता से. इस बात की कोई भी जांच कर सकता है. क्या यह वोटों में तब्दील हो पाएगा? उनका यह जवाब अब मशहूर हो चुका है कि “या अर्श पर या फर्श पर”. वे कहते हैं कि जैसे भी हो, वे बिहार की राजनीति में टिके रहने के लिए आए हैं.
रोजगार के लिए हताशा एक और कारण से बढ़ी है जो बिहार के लिए बहुत अजूबा नहीं है, लेकिन कहीं ज्यादा मुखर है. साक्षरता दर अब यहां 75 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है, स्कूलों में दाखिले लगभग सार्वभौमिक हो चुके हैं, लेकिन दसवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ने की दर भी काफी ऊंची है. इस वजह से ऐसे कई साक्षर लोग हैं जो किसी रोजगार के योग्य नहीं हैं. ऐसे भी कई हैं जो स्कूल से पास करके सेना, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस और राज्य पुलिस में नौकरी खोज रहे हैं. ग्रामीण बिहार की दीवारों पर सबसे प्रमुख इबारत उन अकादमियों के बारे में है जो इन नौकरियों के लिए शारीरिक प्रशिक्षण देती हैं. ऐसी कई अकादमी पुराने रिटायर्ड पुलिसकर्मी चला रहे हैं. इनमें से एक है ‘आरपीए’ (राकेश फिजिकल अकादमी) स्पोर्ट्स.
हर सुबह सैकड़ों लड़के-लड़कियां ‘फिजिकल्स’ की परीक्षा पास करने के लिए यहां दौड़ने का अभ्यास करने पहुंच जाती हैं. मसौढ़ी और दूसरी जगहों में मुझे वह दिखा जो मैंने पहले नहीं देखा था. कंक्रीट से बने क्रिकेट पिच और नेट. इन्हें सबसे पहले मैंने दो दशक पहले पाकिस्तानी पंजाब के सभी गांवों में देखा था. क्रिकेट की असली पिच तैयार करना इतना कठिन है कि कंक्रीट की पिच एक अच्छा विकल्प लगती है और क्या पता, इससे फास्ट बॉलिंग की संस्कृति मजबूत हो, जैसा कि पाकिस्तानी क्रिकेट के अच्छे वक्त में हुआ था, लेकिन हमारे पंजाब की तरह बिहार भी युवाओं में बढ़ती नशाखोरी को झेल रहा है. गांव-दर-गांव लोग ‘उजला’ के बढ़ते उपभोग की बात कर रहे हैं. यह उजला पंजाब के ‘चिट्टा’ का ही एक नाम है. यह पंजाब में लोकप्रिय कच्चे हेरोइन जैसा है. मसौढ़ी के एक ठेकेदार ओ.पी. शर्मा जैसे कई लोग हैं जो यह कहने का साहस करते हैं कि यह जोशोखरोश से शराबबंदी लागू करने का ही नतीजा है.
अगर आप 2003 में बिहार की दीवारों पर लिखी इबारतों को याद करें तो पाएंगे कि हम बातें करते थे कि सूरज ढलते ही पूरा राज्य किस तरह अंधेरे में घिर जाता था क्योंकि वहां, खासकर गांवों में बिजली नहीं पहुंची थी. वह तस्वीर नाटकीय रूप से बदल गई है और यह स्टोरी आप रात में गांवों से गुजरते हुए पढ़ सकते हैं. हर घर की बाहरी दीवारों पर बिजली के मीटर की हरी बत्ती टिमटिमाती नज़र आएगी. चुनाव में कोई भी जीते, नीतीश के राज में पूरे बिहार को बिजली तो मिल गई है.

हमेशा के तरह भाजपा/एनडीए के होर्डिंग और पोस्टर विपक्ष को संख्या की होड़ में 50 के मुकाबले एक के अनुपात में तो पछाड़ ही रहे हैं. उनका ज़्यादातर संदेश मुफ्त दी जाने वाली सुविधाओं के वादे को लेकर होता है. पटना में भाजपा मुख्यालय के बाहर लगे अंतहीन होर्डिंग महिलाओं को दिए गए 10,000 रुपये, मुफ्त बिजली और शिक्षा लोन आदि के वादों की फेहरिस्त प्रस्तुत कर रहे हैं. बिहार में हमने उम्मीदों से भरे मतदाताओं को पहली बार देखा. बीते तमाम वर्षों में मोदी और नीतीश रेवड़ियों का मजाक उड़ाते रहे, लेकिन अब वे नाटकीय रूप से बदल गए हैं. ज़ाहिर है, उन्होंने तय कर लिया कि फिर से जीतने और दो दशकों की सरकार विरोधी भावना की काट के लिए उन्हें उम्मीदों से भरे मतदाता के दिल को जीतना है तो लेन-देन के बटन को दबाना ही होगा. बिहार की दीवार पर यही इबारत लिखी हुई है. यह सबसे नैतिकतापूर्ण भले ही न हो.

और एक कहानी भी आप हिन्दी प्रदेश बिहार में पाएंगे. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तमाम संदेशों, ‘घुसपैठियों’ की तमाम बातों के बावजूद लगता है कि बिहार पर इनका असर नहीं पड़ा है. यहां कोई सांप्रदायिक भावना आप नहीं पाएंगे. और सामाजिक रूढ़िवादिता? एक स्तर पर बिहार में आप इसे भूल सकते हैं. गांवों की अधिकतर महिलाएं अपना सिर ढकने की जहमत नहीं उठातीं, आपकी आँखों में देखकर बात करेंगी.
दाउदनगर आइए. भीड़भाड़ वाले इस ठेठ बिहारी शहर के बीच से गुजरती सड़क के किनारे एस्बेस्टस शीटों के नीचे आपको बिरयानी की दुकानें मिलेंगी. ‘बिरयानी अड्डा’, ‘चिकन मस्ती’ आपको ‘नये स्वाद वाला फ्रेश भोजन पेश करता दिख जाएगा. इन दुकानों के मालिकों के नाम भी साइनबोर्ड पर दिख जाएंगे : गुलाम साबिर, और राज कुमार भगत. यह ऐसा कुछ है जो बिहार को सबसे अलग खड़ा करता है.

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