Monday, 27 June, 2022
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तोगड़िया ने किया संघ में दरार का पर्दाफाश, मोदी और शाह को बहुत- बहुत धन्यवाद!

एक परस्पर-विध्वंसी संघर्ष जिसका अब खुलासा हुआ ह. जब भी लोकसभा चुनावों का आयोजन होगा इस प्रकार के विवाद सामने आएंगे.

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मुझे अच्छी तरह से याद है कि आज से करीब 14 या 15 साल पहले प्रवीण तोगड़िया ने पुणे में एक यात्रा निकाली थी. यह एक काफी जोरदार यात्रा थी जिसमें हिंदुत्व की सभी महान हस्तियों को आमंत्रित किया गया था, जिस सड़क पर इस यात्रा का आयोजन किया गया था वह भगवा रंग से रंग गई थी. वहाँ पर लगाए जाने वाले नारों में मुस्लिमों के लिए घृणा भरी हुई थी.

मैंने 2002 में गुजरात चुनाव के दौरान प्रवीण तोगड़िया के भाषणों को सुना था जिसके बाद भारी रक्तपात हुआ था, जिसके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को शर्मिंदा होना पड़ा था. मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया बेहद लोकप्रिय राजनीतिक हस्तियों में से थे, जिन्होंने भारी संख्या में भीड़ को आकर्षित किया था. इस यात्रा में उन्होंने पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ को काफी लताड़ा था और कुछ पाकिस्तानियों को भारत में आमंत्रित करने पर अटल बिहारी बाजपेई पर भी कर्कश टिप्पणी की थी. इन्होंने कश्मीर को सैन्य कार्यवाही से मुक्त कराने की कसम खाई थी और पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत की निंदा की थी. इसी क्रम में इन्होने सोनिया गांधी की विदेशी और ईसाई जड़ों पर रोशनी डालते हुए उन पर भी हमला किया था.

यात्रा में शामिल लोगों ने इनकी काफी सराहना की और उनके द्वारा माइक में कहे गए प्रत्येक घातक शब्द का पूर्णरूप से अनुसरण किया. उनकी भयानक बातों को सुनकर मुझे चार्ली चैपलिन क्लासिक, द ग्रेट डिक्टेटर की याद आ गई, जिसमें इसी प्रकार की घृणास्पद बातों के माध्यम से भीड़ में यहूदियों के खिलाफ नफरत भरी गई थी. उनकी यात्रा का दृश्य बहुत ही भयानक था, मैं मुस्लिम नहीं था फिर भी मुझे लग रहा था कि पूरी भीड़ एक बवंडर बन सकती है.

वाजपेयी लगभग हमेशा ही मोदी से नाराज रहते थे और 2002 के बाद उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी को “राजधर्म” का पालन करने के लिए प्रेरित किया. लेकिन लालकृष्ण आडवाणी के हस्तक्षेप के कारण मोदी को अपने पद से इस्तीफा देने की नौबत से राहत मिल गई. हालांकि, संयुक्त रूप से मोदी और तोगड़िया ने गुजराती जनता को अपने रंग में इतना रंग लिया कि उनके अभियान का सामना करना काफी मुश्किल हो गया.

टीवी चैनलों, विशेष रूप से एनडीटीवी ने उन्मादी भीड़ और मूर्खतापूर्ण हिंसा के बारे में दुनिया को दिखाया। बरखा दत्त और राजदीप सरदेसाई मोदी और उनके सहयोगिओं के निशाने पर आ गए. अभी तक उन्हें माफ नहीं किया गया है. शायद उस समय मोदीजी को एहसास हुआ और उन्होंने फैसला किया कि उनकी राजनीति और प्रचार को बढ़ावा देने के लिए उनके पास विश्वस्त टीवी चैनल होना चाहिए. एक दशक के बाद वह अपने मनमाफ़िक टीवी कर्मियों को प्राप्त करने में सफल रहे.

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वास्तव में एक दशक पहले, सन 1992 में जब अयोध्या की बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था तब भी भीड़ में ऐसा ही हड़कंप मचा था. लेकिन उस समय गनीमत यह रही थी कि वहाँ पर कोई भी मीडियाकर्मी नहीं था, जो कारसेवकों द्वारा तलवार, त्रिशूल अथवा औजार का प्रदर्शन तथा उनके द्वारा चलाए जा रहे अभियान को दिखलाता. भगवा रंग के दल द्वारा मस्जिद के ऊपरी भाग पर चढ़ने और उसे अपवित्र करने (जिसे बाद में बीबीसी पर देखा गया था) का परिणाम बहुत ही घातक हो सकता था. उन चित्रों का सजीव प्रसारण करने से देश भर में गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो सकती थी. यह ऑडियो-विज़ुअल मीडिया की शक्ति है. वास्तव में, जब ऐसी हालत में सोशल मीडिया शामिल हो जाती है तो वह स्वयं सामूहिक विनाश करने वाले हथियार की तरह कार्य करती है.

लेकिन जैसा कि राजनीति, कॉर्पोरेट या माफिया जैसे सभी संगठनों में होता है कि शक्ति, लालच, व्यक्तिगत ईर्ष्या और महत्वाकांक्षाओं की इच्छा अनैतिक या क्रूरतापूर्ण दायरे का निर्माण करती हैं. जैसा कि फिल्म ‘मैक्केनास गोल्ड’ की तरह, जिसमें एक गिरोह ‘सोने के पहाड़’ को जीतने के एक “सामान्य अभियान” पर आता है और उसके सदस्य एक दूसरे की ही हत्या कर देते हैं. या, एक आलोचक के रूप में मारियो पुज़ो की रचना ‘गॉडफादर’ के अनुसार, “यह अपराध या माफिया की कहानी नहीं है बल्कि सत्ता का संघर्ष है”. ऐसी कठोर प्रतियोगिता में हिंसा छिपी होती है.

प्रवीण तोगड़िया ने पिछले हफ्ते एक प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया था कि उन्हें डर था कि पुलिस उनसे मुठभेड़ करते समय उन्हें मार न डाले. अपनी आँखों में आँसू लिए हुए और डरते हुए उन्होंने मोदी जी की ओर भी इशारा किया. कुछ दिन पहले ही वे एक बार फिर से मोदीजी द्वारा समर्थित उम्मीदवार को हराकर विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे. और इसलिए इनके लोग उन्हें मारने का षड्यंत्र रचके बदला ले रहे थे.

ऐसा नहीं है कि तोगड़िया के आरोपों के कारण विहिप या संघ परिवार विद्रोह की ओर बढ़ेगा. तोगड़िया का मोदी शासन पर यह तीक्ष्ण प्रहार संघ परिवार के भीतर बढ़ते तनाव का प्रतिबिंब है. लेकिन हमें इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि तोगड़िया के पास पटेल लॉबी में बड़े और वफादार अनुयायी हैं. हार्दिक पटेल का यथासमय पर उनसे मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

दिसंबर में गुजरात चुनाव अभियान के दौरान, पत्रकारों के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि आरएसएस और वीएचपी में एक बड़ा वर्ग या तो मोदी का विरोध कर रहा था या पार्टी के खिलाफ सक्रिय रूप से काम कर रहा था. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और उनके कामकाज के बारे में उनकी अभिमानी शैली की ओर काफी विरोध-भाव था। गुजरात में भाजपा की “सारधाण जीत” केवल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी के कारण नहीं हुई थी. यह भाजपा के भीतर व्यापक मोहभंग के कारण था, न केवल विमुद्रीकरण और जीएसटी के कारण बल्कि मोदी-शाह के समग्र निरंकुश शासन के कारण भी था.

आपसी टकराव खुलेतौर पर अब बाहर आ रहा है. दोनों गुटों ने सरसंघचालक मोहन भागवत से संपर्क करके इस पर हस्तक्षेप करने के लिए कहा था. भागवत ने तोगड़िया को मोदी के साथ अपने मतभेदों को सार्वजनिक न करने की सलाह दी थी. लेकिन तोगड़िया ने अनुशासन तोड़ दिया था.

जब भी लोकसभा चुनावों का आयोजन होगा, तो आंतरिक संघर्ष और ज्यादा बढ़ जाएगा. छवि को सुदृढ़ करने के लिए जनमत सर्वेक्षण किये जा रहे हैं कि मोदी फैक्टर वास्तव में जोर पकड़ेगा और वह लोकसभा में 350 सीटों पर जीत हासिल कर पाएंगे, यह एक बड़ा भ्रम भी साबित हो सकता है और भ्रम हमेशा अभिशाप बन जाते हैं.

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