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Friday, 19 July, 2024
होममत-विमतUPA से लेकर NDA तक, भारत अभी तक नहीं समझ सका कि नक्सलियों की बगावत से कैसे निपटा जाए

UPA से लेकर NDA तक, भारत अभी तक नहीं समझ सका कि नक्सलियों की बगावत से कैसे निपटा जाए

मनमोहन सिंह ने ठीक ही कहा था कि नक्सलवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है लेकिन उनके इस बयान के बाद से हालात में कोई बदलाव नहीं आया है.

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छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों की शांति के बाद माओवादियों की ओर से हमले और हत्याएं फिर शुरू हो गई हैं. बीजापुर ज़ोन में ताजा मुठभेड़ में पुलिस और सीआरपीएफ के कम-से-कम 22 जवानों के मारे जाने की खबर है. एक सप्ताह पहले ही एक हमले में पांच पुलिसवाले मारे गए. हम अभी कुछ नहीं जानते कि माओवादी बगावत में अचानक फिर से तेजी क्यों आ गई है. लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए इसे जो सबसे बड़ा खतरा बताया था, वह कायम है.

जब से इस अलग राज्य का गठन हुआ है, केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सरकार बन चुकी है और राज्य में दो बार कांग्रेस की और तीन बार भाजपा की सरकार बन चुकी है, फिर भी यह समस्या कायम है.

बदलते राजनीतिक परिदृश्य के साथ अलग-अलग मुद्दे उभरते रहे हैं लेकिन इस समस्या से लड़ने में भारत की मूल कमजोरियां जस की तस बनी हुई हैं. इसमें तमाम कारकों का हाथ रहा है— संकल्प की कमी, किसी-न-किसी नक्सल गुट के साथ स्थानीय नेताओं की मिलीभगत, फिरौती देकर शांति कायम करने की कॉर्पोरेट समूहों की प्रवृत्ति और नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले दर्दमंदों का यह आग्रह कि ‘हिंसा की मूल वजहों को समझने की कोशिश करें’.

आज जबकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है, इस वजह से भी केंद्र की एनडीए सरकार की टालमटोल जारी है. एक समय यूपीए की सरकार रमन सिंह की भाजपाई सरकार पर नरमी बरतने के आरोप लगा रही थी, तो आज भाजपा भूपेश बघेल की कांग्रेसी सरकार पर यह आरोप क्यों न लगाए? इसके अलावा, भाजपा अपनी सियासत की वजह से ‘शहरी नक्सल’ के अपने जुमले से चिपक गई है, जबकि असली नक्सल अपना धंधा जारी रखे हुए हैं.

भारत इस राजनीतिक घालमेल की बड़ी कीमत चुका रहा है. लेकिन मोदी सरकार ‘एमएमडीआरए’ एक्ट के तहत खनन को जिस बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाना चाह रही है उसके लिए इस सबको बदलना पड़ेगा.

पी. चिदंबरम जब केंद्रीय गृह मंत्री थे तब यूपीए सरकार ने हथियारबंद नक्सलियों से निपटने की जो कोशिश की थी उसमें जो ऐसा ही घालमेल हुआ था उसके बाद से स्थिति मूलतः बदली नहीं है. उस समय, 1 जून 2013 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित इस स्तंभ में जो कुछ लिखा गया था उसे देखिए कि क्या वह समय की कसौटी पर खरा उतरा या नहीं.

आज इस स्तंभ में मैं उसी सूत्र को लेकर आगे बढ़ रहा हूं. यह तमाम दलों की संवेदनहीनता, अक्षमता और बेरुखी को याद दिलाने के लिए है.


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‘सैनिकों, तुम संघर्ष करो’

बीजापुर ज़ोन के नक्सल पीड़ित आदिवासी इलाके में ताजा मुठभेड़ में कम-से-कम 22 जवानों के मारे जाने की घटना हाल के दिनों में सुरक्षाबलों के लिए कोई सबसे बड़ा सदमा नहीं है. 1947 में आज़ादी के बाद से भारत के सुरक्षाबलों ने बागियों के खिलाफ जो कार्रवाइयां की हैं उनमें एक दिन में उन्हें सबसे ज्यादा 149 जवानों को ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ में और उसके बाद 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा में 76 जवानों को खोना पड़ा.

इस भ्रमित लड़ाई में एक दिन में तीसरा सबसे बड़ा झटका उन्हें 29 जून 2008 को ओड़ीसा में झेलना पड़ा था जब पुलिस नौका पर हमले में 38 जवान मारे गए थे. इस लिहाज से बीजापुर में हुआ हमला सबसे बड़े हमलों में गिना जाएगा. इसी तरह का एक हमला फरवरी 1982 में मणिपुर में इम्फाल और उखरुल के बीच की सड़क पर नांथिलोक में सिख रेजीमेंट के काफिले पर किया गया था.

इन आंकड़ों को पूरे परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने की जरूरत है. बगावत के खिलाफ अभियानों में भारत के सुरक्षाबल एक मुकाबले या एक ऑपरेशन में शायद ही इतनी बड़ी संख्या में अपने जवानों को गंवाते हैं. यहां तक कि करगिल युद्ध में भी एक दिन में इतनी जान नहीं गंवानी पड़ी थी, चाहे तोलोलिंग और टाइगर हिल पर रात में किए गए हमलों में ही क्यों न हुए हों.

अब बात शासन तंत्र की ओर से कार्रवाई की आती है. 2010 में चिंतलनर हत्याकांड पर यूपीए सरकार ने क्या कार्रवाई की? सुरक्षाबल अभी संभल भी नहीं पाए थे कि रक्तरंजित दिलों ने साजिश की और मूल कारणों की दुहाई देनी शुरू कर दी थी. इसी तरह, एक के बाद एक सेनाध्यक्ष और वायु सेना की ओर से बयान आए कि सेना का इस्तेमाल नक्सलों से मुकाबले में नहीं किया जा सकता.

अब नौ साल हो रहें है, यूपीए और उसके विभिन्न घटक, प्रधानमंत्री से लेकर सोनिया गांधी के करीबी माने जाने वालों और उनकी ओर से बोलने वालों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद (एनएसी) के सदस्यों तक या उसके तमाम गृह मंत्रियों तक (मैं जानबूझकर बहुवचन में बात कर रहा हूं क्योंकि इस मंत्रालय को चलाने वाले शिवराज पाटिल, चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे तक सभी अलग-अलग सुर में बोलते रहे) सभी परस्पर विरोधी मकसदों से बयान देते रहे.

अपने 10 साल के कार्यकाल में यूपीए माओवादियों के मसले पर एकमत न हो सका. प्रधानमंत्री समेत उसके कुछ बड़े नेता माओवादियों को गंभीर खतरा बताते रहे या उन्हें खून के प्यासे, जबरन वसूली करने वाले डकैतों का गिरोह बताकर खारिज करते रहे. दूसरा खेमा उन्हें अच्छी मंशा वाले, रास्ता भटके लोगों का समूह मानता रहा जो शोषक उद्योगों द्वारा पीड़ित आदिवासियों के लिए लड़ रहे हैं.

कांग्रेस का नेतृत्व इस विचार पर बिना कोई सवाल उठाए उसे स्वीकार करता रहा. उसने मध्यमार्गी माओवादियों और उनके हमदर्दों को सत्तातंत्र में एनएसी और योजना आयोग में आने की छूट दी, उनका स्वागत किया.

आपको याद होगा कि मलकानगिरि के अपहृत कलक्टर विनील कृष्ण को मुक्त कराने के लिए जिन आठ माओवादियों को जेल से रिहा किया गया था उनमें चोटी के माओवादी अक्कीराजू हारागोपाल उर्फ रामकृष्ण की पत्नी ए. पद्मा भी थी. वह एनएसी के सदस्य हर्ष मंदर के अनाथालय ‘अमन वेदिका’ का कामकाज संभालती थी. (देखें 24 फरवरी 2011 के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख ‘ऐट एनएसी मेंबर्स एनजीओ दे वेट फॉर पद्मा, वाइफ ऑफ टॉप माओइस्ट’).

हममें से कई लोग- तब मैं जिस अखबार का संपादक था, वह भी बिनायक सेन से सहानुभूति रखते थे क्योंकि उन्हें देशद्रोह के एक पुराने कानून के तहत आरोपित करके अपराधी ठहराया गया था. वे एक मृदुभाषी, मिलनसार और गंभीर शिशु चिकित्सक हैं. लेकिन क्या उन्हें योजना आयोग की एक प्रमुख कमिटी (स्वास्थ्य पर संचालन कमिटी, जिसे 12वीं पंचवर्षीय योजना का मसौदा तैयार करना था) में शामिल करना जरूरी था? वे भलेमानुस हैं, बच्चों के डॉक्टर हैं लेकिन वे माओवाद के समर्थक हैं, जिन्हें दोषी ठहराया जा चुका है. उन्हें इस तरह के संगठन में शामिल करके हम सुरक्षाबलों, पुलिस, खुफिया एजेंसियों और देश की जनता को क्या संदेश दे रहे हैं? शायद हिन्दी के एक नारे को तोड़मरोड़कर हम इस तरह पेश कर रहे हैं— ‘सैनिकों तुम संघर्ष करो, हमें पता नहीं हम किसके साथ हैं ’.

और अंतत: आप माओवादियों को क्या संदेश दे रहे हैं? पुलिस के बड़े गश्ती दलों, यहां तक कि कांग्रेस पार्टी के पूरे प्रादेशिक नेतृत्व (विद्याचरण शुक्ल समेत कई नेताओं पर हमला करके उन्हें मार डालने) का सफाया करके वे आपको बताते रहते हैं कि आपकी उलझे हुए दिमाग की वे कितनी समझ रखते हैं.


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वर्दी का रंग

आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करते हुए हमारी सरकारें हमेशा भ्रम की शिकार हुई दिखती हैं. इसका एक उदाहरण यह है कि वी.पी. सिंह ने कश्मीर में सिर उठा रही बगावत को दबाने के लिए एक ओर तो जगमोहन को वहां राज्यपाल बनाकर भेजा, दूसरी ओर बागियों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए जॉर्ज फर्नांडीस को कश्मीर मामलों का मंत्री बना दिया. दोनों के मकसद एक-दूसरे के विपरीत थे, आपस में टकराते थे और सेना से लेकर अलगाववादियों तक हर किसी को भ्रमित करते थे. इस तरह के दिग्भ्रमित रुख की कीमत हम आज भी भुगत रहे हैं. यूपीए के दस साल में हमें यही मिला. लेकिन नक्सल मोर्चे पर अभी भी कुछ बदला नहीं है, सिवा इसके कि रायपुर और दिल्ली में राज कर रही पार्टियां उलट गई हैं.

अफसोस की बात यह है कि दोष केवल राजनीतिक नेताओं का नहीं है. हर बार सेना का अध्यक्ष जब यह कहता है कि वह अपनी सेना को माओवादियों से लड़ने के लिए नहीं भेजेगा क्योंकि उसकी फौज अपने ही देश के लोगों से लड़ती नहीं दिखना चाहती, तब आपका दिल-दिमाग गुस्से से परेशान हो जाएगा.

अपने देश के लोग?

तो कश्मीरी क्या हैं, जिनसे आप बड़े फख्र से लड़ते रहे हैं, जिन्हें पराजित करना चाहते हैं जबकि उन्हें आपने भारत के इतिहास में सबसे विशाल और ताकतवर फौजी कमान बनाया? इतना विशाल कि उत्तरी आर्मी कमांडर के पास दो और तीन सितारा वाले 50 से ज्यादा जनरल रिपोर्ट करने आते हैं. और आप मानते हैं कि कश्मीरी मुख्य भारत के भारतीयों की तरह आपके देश के नहीं हैं? क्या कश्मीरी अलगावादी यही बात नहीं कह रहे?

और, नागाओं, मणिपुर तथा उत्तर-पूर्व के जनजातीय बागियों के बारे में क्या ख्याल है, जिनसे एक तरह से स्थायी तौर पर लड़ने के लिए आपने दिमापुर में बगावत विरोधी पूरा एक कोर ही बना रखा है?

क्या आप यह मानते हैं कि वे उतने भारतीय नहीं हैं जीतने दंडकारण्य के आदिवासी हैं? ऐसा है तो क्या उत्तर-पूर्व के अलगाववादी यही बात नहीं कह रहे हैं?

पूर्व-मध्य भारत में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के इतने जवानों की मौत के प्रति इस तरह की उदासीनता की आखिर क्या व्याख्या हो सकती है? क्या हम भारत के सुरक्षा जवानों की जिंदगी का मोल उसकी वर्दी के रंग के मुताबिक अलग-अलग आंकते हैं?

हमारे पूर्व प्रधानमंत्री ने जिसे हमारी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था उससे लड़ते हुए सीआरपीएफ के जो जवान शहीद होते हैं उनके शवों के पीछे टीवी वालों के कितने ओबी वैन चलते हैं? उनके परिवारों के यहां कितने मंत्री शोक प्रकट करने जाते हैं? जाहिर है, नेता वहीं जाते हैं जहां ओबी वैन जाते हैं.

मैंने रिपोर्टर के रूप में देश और इसके बाहर भी कई युद्धों और लड़ाइयों की रिपोर्टिंग की है, जिनमें श्रीलंका प्रमुख है, जहां मैं तब था जब आईपीकेएफ तैनात थी. मैं प्रायः कहता रहा हूं कि किसी भी भारतीय सैनिक का शव देखकर मुझे रिपोर्टर वाली तटस्थता बनाए रखने में बहुत संघर्ष करना पड़ा है. आज, चार दशक बाद भी मुझे वह दृश्य एक दुःस्वप्न की तरह लगता है जब 7 जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार की रात बीतने के बाद सेना के ट्रक स्वर्ण मंदिर से निकल रहे थे और उनमें दोनों तरफ शहीद हुए जवानों के शव स्ट्रेचर पर तीन-तीन की कतार में रखे थे.

एक ट्रक में दाहिनी तरफ ऊपर के स्ट्रेचर पर पड़े मुश्किल से 20 साल के उस लड़के के चेहरे पर पसीने की ताजा बूंदें चमक रही थीं जिससे साफ था कि वह अभी-अभी शहीद हुआ था. उसके बदन पर जैतूनी हरे रंग की वर्दी न होकर खाकी रंग की वर्दी होती तो क्या फर्क पड़ जाता? इन दिनों मीन-मेख निकालने की जो द्वेषपूर्ण प्रवृत्ति हावी हो गई है उसकी जगह क्या आप वर्णांध हो जाना पसंद नहीं करेंगे?

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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1 टिप्पणी

  1. India only knows how to promote Maoist terrorism like they did in Nepal by sheltering, aiding and abetting Nepal’s Maoist terrorists in the Indian capital spanning a whole decade, 1996-2005 as part of its belligerent and sadistic policy towards its landlocked neighbor. As you sow, so you reap.

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